जान खतरे में है और जहान भी… हिन्दुत्व की राजनीति और हिंदुत्व का राजकाज धोखा और फरेब है

Modi in Gamchha

Life is in danger and the world too … The politics of Hindutva and the rule of Hindutva is deception and deceit

आज शाम हमारे बड़े भाई और लेखक कस्तूरी लाल तागरा का फोन आया।

हाल चाल जानने के बाद लम्बी बातकही हुई।

आज सुबह प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कांफ्रेंस की (Prime Minister has video conference with Chief Ministers)। खबरों से कोई अंदाजा नहीं लग रहा कि लॉक डाउन खोलकर ज़िंदगी और जहां को पटरी पर लाने के लिए उन्होंने क्या रास्ता निकाला।

लॉक डाउन कामयाब है, इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है।

लॉक डाउन की वजह से संक्रमण भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में थर्ड स्टेज पर देश भर में नहीं फैला, सच है।

लेकिन महाराष्ट्र और मुंबई, गुजरात, दिल्ली, मध्यप्रदेश के इंदौर और अन्यत्र, उत्तर प्रदेश के आगरा और कानपुर से जो खबरें आ रही हैं, वे वहां थर्ड स्टेज की ओर इशारा कर रहे हैं।

34 दिनों के लॉक डाउन के बाद यह स्थिति है।

लॉक डाउन हटा तो क्या होगा?

लॉक डाउन 3 मई के बाद भी नहीं हटाया जा सका तो क्या होगा? (Will the lock down be opened after May 3?)

इन सवालों से हम जितना उलझे हुए हैं, उससे कम उलझे प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री नहीं है।

मौजूदा हालात में किसी के लिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है।

अरविंद केजरीवाल, बीजू पटनायक और अशोक गहलोत जैसे गैर भाजपा मुख्यमंत्री लॉक डाउन बढ़ाने की बात कर रहे हैं।

राजनीति और विचारधारा अब अप्रासंगिक हो गयी है।

खतरे में है जान और जहां भी।

वायरस इन्फेक्शन का यह पहला दौर है, हम अभी उसका मुकाबला कर रहे हैं।

दूसरा दौर भी आएगा, उसका मुकाबला भी करना है।

खतरे में जान है और जहां भी।

यह सत्ता और राजनीति की बात नहीं है।

जान और जहां की सलामती की दोनों समस्या राजनीति की नहीं, अर्थ व्यवस्था का संकट है।

इस मुक्त बाजार अर्थ व्यवस्था की इस विश्व व्यवस्था में धर्म और संस्कृति की बात बकवास है।

तागरा जी सरस्वती शिशु मंदिर के विद्यार्थी रहे हैं 60 के दशक में। तब भाजपा नहीं थी। जनसंघ था। कहाँ था?

आज हिंदुत्व की विचारधारा के मुताबिक राजकाज है।

हिंदुत्ववादियों में कितने बच्चे सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ते हैं?

उनके भी बच्चे अंग्रेज़ी माध्यम के प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं।

बाजार का कोई धर्म नहीं होता।

बाजार की कोई संस्कृति नहीं होती।

जब परिवार और समाज तक बाजार है तो धर्म और संस्कृति की बात करना पाखण्ड है।

तागरा जी सहमत थे।

हमने कहा कि अंग्रेजी हुकूमत में भी लोग ज्यादा धार्मिक थे। ज्यादा सांस्कृतिक थे।

हमारे गांव आत्म निर्भर थे।

आजादी के बाद पूंजीवादी विकास और मुक्त बाजार ने हमें गुलाम बना दिया है।

हिन्दुत्व की राजनीति और हिंदुत्व का राजकाज धोखा और फरेब है।

राजनीति भी कारपोरेट है और राजकाज भी कारपोरेट।

मुक्तबाजार में प्रधानमंत्री किसी कारपोरेट कम्पनी की सीईओ हैं।

भाजपा के न होकर कांग्रेस या कम्युनिस्ट या बहुजन या समाजवादी कोई भी प्रधानमंत्री होता तो वह सीईओ ही होता।

हमने तागरा जी से कहा कि लॉक डाउन एक  ऑपरेशन की तरह है।  ऑपरेशन सफल भी हो गया तो उसके बाद होने वाले संक्रमण से तो बचना ही होगा।

1995 में सविता जी के दिल का ऑपरेशन हुआ था।

उनके दिल में tumour था।

हमने कोलकाता जनसत्ता ज्वाइन किया था 1991में। तब तक कोलकाता या सोदपुर, जहां हम रहते थे, किसी को नहीं जानते थे। कोई रिश्तेदार मदद के लिए नहीं था। हमने घर या ससुराल किसी को खबर नहीं की क्योंकि वे परेशान होते।

हमारे सम्पादक थे दिवंगत श्याम आचार्य जी। उन्होंने कहा, तुम चिंता मत करो। सब व्यवस्था हो जाएगी।

वे बीएम बिड़ला हार्ट सेंटर ले गए। डॉ. देवी शेट्टी को दिखाया।

तेज आंधी पानी की रात थी। देवी शेट्टी ने खुद इकोकार्डिओग्राफ लिया और कह दिया कि कोई जोखिम नहीं उठाएंगे। अभी ऑपरेशन करना है।

पैसे का जुगाड़ आचार्य जी ने किया। इंडियन एक्सप्रेस समूह के हर कर्मचारी ने मदद की। कम्पनी ने भी हमारे साथियों ने खून दिया और सोदपुर के अपने मुहल्ले अमरावती के लड़कों ने आंधी पानी की उस रात जनसत्ता की गाड़ियों से पहुंचकर खून दिया।

ऑपरेशन से पहले देवी शेट्टी सविता जी को  ऑपरेशन थियेटर ले गए और उन्होंने सारी मशीनों को दिखाकर उन्हें यकीन दिलाया कि कैसे उनके शरीर को फ्रिज करके ऑपरेशन शरीर से दिल को अलग निकालकर उसमें से ट्यूमर अलग जाएगा। कैसे  ऑपरेशन के दौरान किन मशीनों से उनके अंग प्रत्यंग काम करेंगे। फिर  ऑपरेशन के बाद कैसे उनके शरीर को मशीनों से हटाकर नॉर्मल प्रक्रिया में लाया जाएगा।

बाद में पता चला कि पांच घण्टे से चला यह  ऑपरेशन तत्काल इसलिये किया गया कि कभी भी ट्यूमर लीक या फट सकता था और मरीज की मौत हो सकती थी।

आर्टिफिशियल सिस्टम से मरीज का नेचरल मोड में लाना बेहद कठिन होता है।

दिल के ऑपरेशन के दौरान मृत्यु कम होती है, लेकिन ऑपरेशन के बाद मरीज मानसिक और शरीरीक तौर पर तैयार न हुआ तो कोमा में चल जाता है।

दिल से ट्यूमर निकालने का यह पहला सफल ऑपरेशन था। | This was the first successful operation to remove a tumor from the heart.

कोलकाता के डॉक्टरों ने बाद में हमें बताया और समझाया कि  ऑपरेशन के बाद कि स्थिति से निबटने के लिए देवी शेट्टी ने जैसे सविता जी को तैयार किया, वैसा करना किस तरह अनिवार्य है।

इसके बाद पूरे 25 साल बीत गए और सविता देवी शेट्टी की दी हुई ज़िंदगी जी रही हैं।

ऑपरेशन से पहले श्याम आचार्य ने कहा था कि कोई मुफ्त में भी  ऑपरेशन कर दें तो भी हम देवी शेट्टी से ही ऑपरेशन करवाएंगे। चाहे तीन लाख लगे या दस लाख।

देवी शेट्टी ने इस ऑपरेशन की फीस नहीं ली थी।

श्याम आचार्य के इस फैसले की वजह से ही देवी शेट्टी सविता जी की जान बचा सके।

वह एक सम्पादक का निर्णय है।

देश को बचाने के लिए किसी प्रधानमंत्री का निर्णय निश्चय ही किसी एक कि जान बचाने के लिए किसी सम्पादक या किसी सीईओ के फैसले के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण है।

हमारे हिसाब से जान और जहां दोनों मुक्तबाजार के कम्पनीकरण की समस्याएं हैं। मुझे माफ़ करें।

एक ऑपरेशन 1984 में भी हुआ था।

सविता जी का नहीं, स्वतन्त्र भारत का ऑपरेशन।

ऑपरेशन ब्लू स्टार।

देश उसके लिए तैयार नहीं था।

इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी।

सिखों का देश भर में कत्लेआम हो गया।

देश बरसों तक लहूलुहान रहा और सिखों के जख्म आज तक भरे नहीं हैं। वे आज भी लहूलुहान हैं।

ऑपरेशन ब्लू स्टार की तरह कोरोना से निबटने के लिए यह भी भारत का ऑपरेशन है।

ऑपरेशन के लिए और ऑपरेशन के बाद की स्थितियों से निपटने के लिए डॉक्टर ने क्या तैयारी की है, यह अभी मालूम नहीं हो सकी।

चरणबद्ध ढंग से लॉक डाउन से निकलकर कैसे बचेगी जान, कैसे बचेगा जहां, यह हमारी समझ से बाहर है।

हमारी समझदानी छोटी हो सकती है।

उम्मीद है कि देश चलाने वाला सीईओ समुदाय समझ रहा होगा।

देश अगर इस ऑपरेशन के बाद कोमा में चल गया तो क्या होगा?

देश कोई कम्पनी नहीं है।

देश के हुक्मरान 1970 से इस देश को कम्पनी की तरह चला रहे हैं। सत्ता की राजनीति में शामिल सभी लोग इसके जिम्मेदार हैं।

कोरोना से चाहे कितने ही लोग मारे जाएं, यह हमारी हर महामारी की तरह खत्म हो जाएगी।

कोरोना ने दुनियाभर को बता दिया है कि मुक्तबाजार की यह विश्व व्यवस्था और इसके तहत देश को कम्पनी और नागरिकों को उपभोक्ता बना देना कितना सही, कितना गलत है।

हम कितने समझ सके, इस पर देश का भविष्य निर्भर है।

चाहे लॉक डाउन कल हटे या 3 महीने, 6 महीने बाद।

पलाश विश्वास

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