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एक देश बारह दुनिया : समकालीन भारत में विकास के विरोधाभासों का रेखाचित्र

पुस्तक समीक्षा

नीरज

2021 का वर्ष भारत के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष है। इस वर्ष के महत्त्वपूर्ण होने के जो अनेक कारण हैं उनमें से एक यह है कि इसी वर्ष भारत ने एक देश के रूप में अपनी औपनिवेशिक दासता से मिली आजादी के 75 वर्ष पूरे किए हैं।

इस मौके पर क्या हम आज यह विचार करने की स्थिति में हैं कि इस दौरान हमने जो विकास हासिल किया है उसकी कीमत किसने, कितनी और किस रूप में चुकाई है? या फिर महानगरों की रातों में जो जगमगाहट है उसकी कीमत कितने लोगों के जीवन में अंधेरे के रूप में आज भी चुकायी जा रही है? जाहिर है कि यह काम हुकूमत कभी नहीं करेगी। करेगी तो भी जनता को कभी नहीं बताएंगी, क्योंकि अपनी परीक्षा देने से महज बच्चे ही नहीं अमूमन हर हुकूमत डरती है? तो फिर यह काम कौन करेगा? बच जाते हैं इतिहासकार, सामाजिक-शास्त्री, पत्रकार और साहित्यकार

समाज को देखने का इतिहास और समाज-शास्त्र का अपना एक तरीका है, जिस पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं कि इतिहास को किसकी दृष्टि से लिखा जाना चाहिए, किसके द्वारा लिखा जाना चाहिए।

पत्रकारिता का महत्त्व क्यों है

रही बात पत्रकार की तो मुझे लगता है कि स्वतंत्र भारत में पत्रकारिता की स्वतंत्रता से भी सब भारतीय परिचित ही हैं। लेकिन, पत्रकारिता में फिर भी कुछ संभावना दिखाई देती है। पत्रकारिता का महत्त्व इसलिए भी है, क्योंकि इसका असर आम जन-जीवन पर सीधे रूप में पड़ता है। अंत में बचता है साहित्यकार।

साहित्य के बारे में यह कहा जाता है कि जो बात इतिहास में दर्ज होने से छूट जाती है या छोड़ दी जाती है, उसे साहित्य सहेजकर रख लेता है। यह साहित्य की अपनी विशेषता भी है। यहां इतिहास, समाज-शास्त्र, पत्रकारिता से लेकर साहित्य की भूमिका इसलिए कि हाल ही में समकालीन भारत में हुए तमाम विकास और साहित्य की कीमत को समझाती हुई ‘एक देश बारह दुनिया शीर्षक से एक पुस्तक ‘राजपाल प्रकाशन’ से प्रकाशित हुई है, जिसके लेखक हैं शिरीष खरे, जो पेशे से पत्रकार हैं किंतु संवेदनशीलता की दृष्टि से साहित्यकार हैं।

समग्रता में देखें तो किसी देश की दृष्टि से 75 वर्षों का अरसा कोई लंबा समय नहीं होता है। लेकिन, देश में रहने वाले लोगों की दृष्टि से देखें तो इस 75 वर्ष के कालखंड में चार-पांच पीढ़ियां समा सकती हैं। अर्थात् जन-मानस के जीवन को प्रभावित करने के लिहाज से यह पर्याप्त समय है।

मौटे तौर पर देखें तो इन दशकों के दौरान हम भारतीयों की जीवन-शैली और रहन-सहन के तौर तरीकों में काफी कुछ  बदलाव आया है। शहर आबाद हो रहे हैं, यातायात और संचार के साधनों का भी तेजी से विकास हुआ है। भारत के कुछ लोग अब विश्व के अमीर लोगों की सूची में शामिल हो रहे हैं। भारत में पहले से अधिक बड़ी और राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों का निर्माण हो गया है।

कुल मिलाकर सामान्यत: राजधानी में बैठे एक वर्ग को ऐसा दिखाई देता है कि सब कुछ पहले से अच्छा चल रहा है। हर स्वतंत्रता दिवस या ऐसे ही किसी अन्य गर्व करने वाले दिन भी तो हमारे हुकुमारान दोहराती रहे हैं और हमें बताते रहे हैं कि उनकी उपलब्धियां क्या रही हैं।

ऐसी स्थिति में ‘एक देश बारह दुनिया’ किताब की विशेषता इस बात में है कि पिछले 75 वर्षों में हमने जो विकास और उपलब्धियां हासिल की हैं उनकी कीमत का सटीक और बारीक वर्णन यहां दर्ज हुआ है। जैसी कि पुस्तक के फ्लैप पर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हर्ष मंदर लिखते हैं, ”जब मुख्यधारा की मीडिया में अदृश्य संकटग्रस्त क्षेत्रों की जमीनी सच्चाई बताने वाले रिपोर्ताज लगभग गायब हो गए हैं तब इस पुस्तक का संबंध एक बड़ी जनसंख्या को छूते देश के उन इलाकों से है जिसमें शिरीष खरे ने विशेषकर गांवों की त्रासदी, उम्मीद और उथल-पुथल की परत-दर-परत पड़ताल की है।”

इस पुस्तक का बड़ा हिस्सा गांवों से संबंधित है, इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत में गांधी ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने गांवों के महत्त्व और उसकी चुनौतियों को समझा था और उसके विकास की भी चिंता की थी।

गांधी कहते थे, ”हम जो कुछ भी हम हासिल करते हैं उसकी कीमत को हमें कभी नहीं भलनी चाहिए।” इस कथन के आलोक में समकालीन भारत के विकास को देखा जा सकता है और इस संदर्भ में इस पुस्तक को पढ़ने-समझने में मदद ली जा सकती है। कम से कम मैंने तो गांधी के उक्त विचारों को ध्यान में रखते हुए ही इस पुस्तक को देखा-पढ़ा है। चाहें तो आप भी ऐसा ही कर सकते हैं।

बहरहाल, इस पुस्तक को लेखक ने पिछले करीब डेढ़ दशक के दौरान देश के विभिन्न इलाकों में की गई अपनी बेतरतीब, गैर-नियोजित यात्राओं के आधार पर लिखा है, जो स्पष्ट तौर पर यह दर्शाता है कि लेखक के भीतर किसी प्रकार की जल्दबाजी नहीं है, बल्कि पुस्तक को लिखने का कारण लेखक के मन की आंतरिक अशांति है। वैसे भी यह अक्सर कहा जाता है कि किसी लेखक को बेचैनी की हद तक कलम नहीं उठानी चाहिए। इस पुस्तक को पढ़कर लगता है कि इसमें संकलित हर रिपोर्ताज अपनेआप में एक पीड़ा का संसार लिए हुए है, जिसे लेखक ने समय और अनुभव की आग में पकने के बाद ही पाठकों तक लाने का प्रयास किया है।

यहां संकलित रिपोर्ताजों में जनजातीय जीवन से लेकर घुमंतू, अर्ध-घुमंतू, दलित उत्पीड़न से लेकर स्त्री शोषण और जीवनदायी नदियों से लेकर अन्नदाता किसानों के दुःख-दर्दों की दास्तान को बयां किया गया है। मूलत: लेखक ने इस पुस्तक के माध्यम से निरक्षर, असहाय और पीड़ित लोगों की टूटी-फूटी आवाजों को शब्दों के रूप में दर्ज किया है।

 पुस्तक में जिस पहले रिपोर्ताज को स्थान दिया गया है वह मेलघाट, महाराष्ट्र पर केंद्रित है। अधिकांश लोग मेलघाट को टाइगर रिजर्व के रूप में जानते हैं। यहां मूल निवासी भी इस टाइगर रिजर्व को भुलाए नहीं भूलते। अधिकांश बुजुर्ग आदिवासियों को 1974 का साल आज भी ज्यों का त्यों याद है जब यहां टाइगर रिजर्व वजूद में आया था। जिसके बाद यहां के कोरकू आदिवासियों का जीवन विस्थापन और पुनर्वास इन दो हिस्सों में विभाजित हो गया। इसके अलावा मेलघाट को इसकी सुंदर घाटियों, ऊंची चोटियों और खूबसूरत सूर्योदय के कारण भी जाना जाता है। किंतु, इसकी तमाम सुंदरता पर तब गहरा धब्बा लग जाता है जब लेखक इस इलाके में होने वाले मौत के आंकड़ों को हमारे सामने लाते हैं।

लेखक के अनुसार महाराष्ट्र सरकार का यह आंकड़ा है कि वर्ष 1991 से 2008 तक मेलघाट में 10,762 लोगों की मृत्यु हो चुकी थी, जिनमें से अधिकांश मौतें भूख और कुपोषण से हुई थीं। वहीं, सरकार बच्चों की मौतों की संख्या को तो मानती है, लेकिन इन मौतों के पीछे भूख को कारण नहीं मानती है।

यह आश्चर्य तब और अधिक बढ़ जाता है जब आपको मालूम होता है कि मेलघाट का यह क्षेत्र उस लोकसभा क्षेत्र (अमरावती) के तहत आता है जहां से 1991 में पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल चुनाव जीतकर संसद पहुँच चुकी थीं! इसी इलाक़े में विदर्भ का वह दर्दनाक क्षेत्र भी आता है जहाँ जो दुनिया भर में विकट ‘सूखे और किसान आत्महत्या’ के लिए जाना जाता है। स्वास्थ्य सुविधा ऐसी की यदि आपकी तबीयत ज्यादा बिगड़ी तो मेलघाट के किसी गांव से 70-80 किलोमीटर भागने के बाद भी कोई गारंटी नहीं कि आप सही सलामत उस सर्वसुविधा सम्पन्न अस्वताल तक पहुंच जाएंगे, जो आपको बचा सकता है। इन विवरणों को पढ़कर एक सभ्य नागरिक होने के नाते आपके भीतर अपराध-बोध उपज सकता है।

आदिवासी जीवन की त्रासदी से जुड़े रिपोर्ताज :दंडकारण्य यूं ही लाल नहीं है

आदिवासी जीवन की त्रासदी से जुड़े ऐसा ही एक अन्य रिपोर्ताज यहां दर्ज हुआ है, नाम है- ‘दंडकारण्य यूं ही लाल नहीं है’, जिसमें मिड-डे मिल के लिए संघर्ष, मनरेगा मजदूरी के लिए अफसरों के जुल्म, पेंशन के लिए भटकती विधवा महिलाएं, शिक्षा का अभाव, नक्सली आतंक और पुलिसिया दमन के खौफ का जीवंत वर्णन दर्ज किया गया है।

लेखक लिखते हैं, ”बस्तर के लोगों का समूचा संघर्ष और टकराव मनुष्य के सांस लेते रहने और मूलभूत जीवन-अधिकारों के बारे में है। सबसे अंतिम पंक्ति में धकेल दी गई जनसंख्या के बारे में है, जो सम्पूर्ण गरिमा के साथ अपने स्थान पर उपस्थित रहना चाहती है।”

बस्तर समस्या पर ही केंद्रित एक उपन्यास ‘बस्तर-बस्तर’ का भी हाल ही में प्रकाशन हुआ है, जिसके लेखक लोकबाबू हैं। इस उपन्यास में भी हिडमा नामक एक युवती की प्रेम कहानी के माध्यम से लेखक ने बस्तर की पुरानी समस्या को अपने अंदाज में कहा है। इस उपन्यास को भी लोकबाबू ने रिपोर्ताज की तरह अपने लंबे अनुभवों के आधार पर रचा है। मेरा मानना है कि इन दोनों रचनाओं को साथ में पढ़ने से ‘बस्तर और बस्तरिया लोगों’ के दुःख-दर्द को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

भारत में बसने वाले असंख्य नट समुदाय तथा घुमंतू जातियों के दुःख-दर्द को भी यहां इस पुस्तक में तीन अलग-अलग रिपोर्ताजों के साथ स्थान दिया गया है। तकनीकी के इस जमाने में जब रेडियो, टीवी और मोबाइल ने मनोरंजन के परंपरागत साधनों को लगभग निगल लिया है तब इन नट लोगों के खेलों में कौन रुचि लेगा! अत्याधुनिक साधनों के सामने इनके जादू अब फीके पड़ने लगे हैं। एक समय जब ये लोग बम्बईय्या अभिनेताओं के लिए स्टंट करते थे। लेकिन, अभिनेता तो आज भी करोड़ों रुपए फीस लेकर बड़ी बजट की फिल्मों में काम कर रहे हैं, दूसरी तरफ नट समुदाय और उनकी परंपरागत कला आज भी वहीं है, बल्कि आज तो उनके सामने रोजीरोटी का संकट कहीं अधिक गहराने लगा है। इसी प्रकार, घुमंतू समुदाय भी आज अपनेआप को असहाय महसूस कर रहा है। इन दोनों समुदाय के लोगों की विशिष्टता ही यह रही है कि कभी ये एक जगह टिककर नहीं रहे हैं। ऐसे में जब इनसे सरकारें- राशन, वोटर कार्ड, पैन, आधार कार्ड आदि के बारे में पूछती हैं तो इनके पास कोई जवाब नहीं होता है। जमीन की तो बात ही दूर है। यही वजह है कि तमाम सरकारों के पास न तो इनका ठीक-ठीक आंकड़ा मौजूद है और न ही इनकी समस्याओं के बारे में ही उन्हें कुछ ज्यादा पता है।

पुस्तक में कमाठीपुरा (मुंबई) के रेड लाइट एरिया के माध्यम से देह व्यापार की समस्या को भी उजागर किया गया है, जिसकी जड़ें समाज में कहीं गहरे दबी हुई हैं। हालांकि, ऐसा नहीं है कि यह समस्या भारत में ही मौजूद है, बल्कि यह पूरी दुनिया में किसी न किसी रूप में फैली हुई है, इसके रूप अलग-अलग हो सकते हैं।

लेखक एक जगह जिक्र करते हैं कि एक विदेशी वेश्या ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि “वेश्यावृत्ति ने उसे आजादी का एहसास दिलाया है।” यानी जिन वेश्याओं को लोग पीड़िता की नजर से देखते हैं वे पूरे मामले को सिरे से नहीं समझते हैं। कुछ महिलाएं इस पेशे को अपनी मर्जी से भी चुनती हैं। शायद यह उनकी आजादी और आत्मविश्वास से जुड़ा मामला है? लेकिन, सवाल है कि क्या यही बात भारत के संदर्भ में सही बैठती है? कारण यह है कि हमारे यहां कई प्रकरणों में देह व्यापार काफी हद तक मजबूरी का ही पर्याय बन चुका है। बहुत से माता-पिता अभावों के चलते अपनी बच्चियों को इस अंधकार में धकेल देने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। हालांकि, यहां सरकार ने यौन-व्यवसाय को प्रतिबंधित कर रखा है। किंतु, फिर भी कमाठीपुरा भारत का दूसरा सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है। इससे साफ है कि समस्या का समाधान प्रतिबंधित कर देना नहीं है, बल्कि समस्या का मूल कारण कुछ और है। दरअसल, देश की बीमारी कोई और है, दवा दूसरी दी जा रही है!

इसके अलावा इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी उभरती हुई ‘वैश्विक पर्यावरणीय संकट की चिंता’ के दौर में लेखक ने अत्यंत मौजूं समस्या उठाई है, उन्होंने नर्मदा नदी के अस्तित्व पर आए नए संकटों को पाठकों के सामने रखा है। आज पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। उससे निबटने के लिए योजनाएं भी बनाई जा रही हैं। लेकिन, यदि कुछ ऐसा है जो इस बीच सिरे से गायब है तो वह है योजनाओं पर अमल। हम आए दिन वैज्ञानिकों द्वारा दी जाने वाली संकटपूर्ण चेतावनियों को सुनने के आदी होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के असंतुलन से उपजे हादसों को देखकर भी अनदेखा करते जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में तो भारत ने भी इस मानव-जनित आपदा की भयावहता का सामना किया है।

 ‘वे तुम्हारी नदी को मैदान बना जाएंगे’ रिपोर्ताज में लेखक ने नर्मदा नदी, जो सदियों से मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के लोगों की जीवनरेखा रही है; का वर्णन किया है। एक नदी जहां से गुजरती है वहां एक परिस्थितिकी तंत्र का भी निर्माण करती है, जिसमें न केवल मनुष्य बल्कि अन्य प्राणी भी रहते हैं। नदी वहां के जल, जंगल और पर्यावरणीय आदि की सेहत को भी दुरुस्त रखती है। लेकिन, जब किसी नदी पर संकट आता है तो वह नदी मात्र का संकट नहीं होता है, बल्कि उसका प्रभाव बहुत व्यापक और गहरा होता है। जैसा कि लेखक बताते हैं कि वाशिंगटन डीसी की ‘वर्ल्ड रिसौर्सेज इंस्टिट्यूट’ की रिपोर्ट के अनुसार, ”नर्मदा नदी विश्व की छह सबसे संकटग्रस्त नदियों में शामिल है।” यह रिपोर्ट सफ तौर पर बताती है कि हम अपने संसाधनों को बचा पाने में किस हद तक असक्षम हैं। इस अक्षमता और लापरवाह होने के अनेक कारण हैं- गैर-नियोजित विकास को बढ़ावा देना, स्थानीय लोगों के अनुकूल नीतियां न बनाना, उनकी मदद न लेना और व्यवसायिक लाभ के लिए संसाधनों का अधिकतम दोहन करना आदि।

लेखक बताते हैं कि नर्मदा नदी को तो पहले ही बड़े-बड़े बांधों से बांधकर, इसकी धारा को अवरुद्ध कर दिया गया था, जबकि इसके अलावा हाल के वर्षों में अनेक कोयले और परमाणु के बिजलीघर भी निर्मित किए जाने की तैयार की जा रही है, जो न केवल बड़ी मात्रा में नदी का पानी सोखेंगे, बल्कि साथ में हजारों टन राख भी नदी में वापस गिरा देंगे। इन तमाम प्रदूषणों की वजह से नर्मदा का पीएच स्तर 9.02 तक हो गया है।

आईआईटी का अध्ययन बताता है कि इससे ग्रीन हाउस गैसों पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। कुल मिलाकर इस प्रकार के अनियोजित प्रबंधन से हम किसी भयानक हादसे की ओर बढ़ रहे हैं। नदी के अलावा पहाड़ों पर पाए जाने वाले तमाम उपयोगी पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। एक दशक पहले यहां घने जंगलों के कारण आसमान का सूरज सीधे रूप में दिखाई नहीं देता था वहीं आज अनेक पहाड़ियों से जंगलों को उजाड़कर उन्हें नंगा कर दिया गया है।

स्वाभाविक रूप से नदी और जंगल के अस्तित्व पर संकट साथ-साथ वहां के जीव-जंतुओं और बैगा जनजाति के लोगों के जीवन पर भी अस्तित्व बचाने का संकट बना हुआ है। लेखक बताते हैं कि के लिए जिन स्थानीय निवासियों को हटाया है उनकी दूसरे स्थान पर कोई व्यवस्था नहीं की जाती है। एक स्थान पर लेखक लिखते हैं, ”जिस चुटकी बांध पर परमाणु बिजलीघर को बनाने की बात चल रही है वहां  बिजली नहीं पहुंची है। यहां तक कि आसपास बिजली के खंबे भी नहीं हैं। बरगी बांध के लिए अपना जीवन बुझाने वालों के घरों में आज भी चिमनी जल रही है। यहां से समझा जा सकता है कि जो लोग बिजली के लिए कुर्बानी देने में सबसे आगे होते हैं वे किस तरह बिजली की रोशनी से बेदखल कर दिए जाते हैं।” यहां तक कि चुटका के विशाल परमाणु बिजलीघर के प्रति ‘केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय’ भी अपनी आपत्ति जता चुका है।

इस रिपोर्ताज के माध्यम से आप जान पाएंगे कि हमारी योजनाएं किस हद तक जमीनी हकीकत और उसके आशंकित खतरों को भांपने में असमर्थ हैं।

इस रिपोर्ताज की विशेषता यह है कि लेखक ने जन-जीवन और पर्यावरणीय संकट से उपजे दुःख-तकलीफों का तो बखूबी चित्रण किया ही है, बल्कि साथ में उन्होंने अनेक शोध तथा रिपोर्ट के आंकड़ों के साथ चेतावनियों को भी दर्ज किया है।

जैसा कि शुरू में कहा जा चुका है यह पुस्तक अनेक वर्षों की यात्राओं के अनुभवों का नतीजा है और यहां इस पुस्तक में शामिल रिपोर्ताजों को पढ़कर भी यह स्पष्ट हो जाता है कि लेखक की रुचि अलग-अलग जगहों की यात्रा करने और वहां पहुंचकर कुछ विशेष खोजने में अधिक है, बजाय इसके कि पहले से निर्धारित किसी तय लक्ष्य के मुताबिक पहुंचकर वहां अपना काम करके वापस लौटना। लेखक एक जगह यात्रा को लेकर अपने विचार बताते हैं, ”यात्रा के दौरान अतीत को देखने का दृष्टिकोण वैसा नहीं रह जाता जो उसके पहले होता है। मुझे यात्रा ने हर बार वर्तमान और भविष्य के लिए नयी दृष्टि दी है। लिखने के लिए आत्मविश्वास दिया है। व्यक्तित्व को नयी तबाही और ताकत दी है। मन को और अधिक संवेदनशील बनाया है। कल्पनाओं में यथार्थ के रंग भरने में मदद की है। यात्रा बोरियत मिटाने की मंशा भर नहीं होती। यात्रा कुछ जानने की जिज्ञासा से शुरू होती है।”

यात्रा करने से जुड़े कुछ सूत्र लेखक ने दिए हैं, जिन्हें कोई भी गंभीर यात्री (मनोरंजन और धार्मिक यात्री नहीं) अपनी यात्राओं के दौरान प्रयोग में ला सकता है।

यहां बताए गए सूत्र का ही परिणाम है कि लेखक ने जहां भी, जिस भी स्थान का वर्णन अपने रिपोर्ताजों में किया है वहां का पूरा परिदृश्य पाठक की आुखों में तैरने लगता है। यदि कहीं नदी का वर्णन आता है तो पाठक के मन के किसी कोने में एक नदी बहने लगती है। पहाड़ की बात आती है तो पाठक के मन में पहाड़ी रम्यता आकार लेने लगती है, बांध का जिक्र होता है तो उसकी विशालता और भयावहता सामने मंडराने लगती है और यदि किसी दुखी व्यक्ति की पीड़ा का चित्रण होता है तो उसकी उम्मीद भरी आंखें पाठक से बहुत कुछ कहने लगती हैं। इस तरह शिरीष खरे की यह पुस्तक भारत के अनेक समुदायों के दुःख-दर्दों को उनकी सम्पूर्ण जीवंतता के साथ पाठकों के समक्ष रखती है।

पुस्तक: एक देश बारह दुनिया

लेखक- शिरीष खरे

विधा: रिपोर्ताज (समाज व संस्कृति)

प्रकाशक: राजपाल एंड सन्ज़, दिल्ली

पृष्ठ: 208 पेपरबैक

पुस्तक अमेजन पर उपलब्ध है: https://amzn.to/3ChFJMM

नीरज दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में हिन्दी साहित्य के शोधार्थी हैं और इन दिनों यात्रा-साहित्य पर पीएचडी कर रहे हैं।

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें

 

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