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किसने कहा था कि जो जहां है, वहीं रहे? सबको खाना मिलेगा, सबको छत मिलेगी? जो लोग गोबर  का ट्रम्प बना रहे थे वे असल में गोबर से क्या बना रहे थे?

किसने कहा था कि जो जहां है, वहीं रहे? सबको खाना मिलेगा, सबको छत मिलेगी? जो लोग गोबर  का ट्रम्प बना रहे थे वे असल में गोबर से क्या बना रहे थे?

मध्यांतर

मई का महीना है और कम से कम उत्तराखण्ड में शीत काल अभी जारी है। कल भी हमारे यहां आंधी पानी का मौसम रहा। अच्छा ही है। एसी जिनके पास है, वे न चलाएं तो बेहतर। पंखे कूलर की नौबत न आये तो बेहतर।

आज भतीजे अविनाश ने हमारी हजामत बनाई। उसके दादा अतुल मिस्त्री और उनके भाई अकेले बसंतीपुर पहुंचे थे और हमारे परिवार में शामिल थे। पिताजी पुलिन बाबू ने अतुल काका की शादी कराई उनके लिए जमीन एलॉट कराई गई। तबसे वे हमारे परिवार  में शामिल हैं।

अतुल काका के भाई अवनी काका एकदम हीरो थे। वे और कार्तिक काका बसंतीपुर जात्रा पार्टी के स्टार थे, जो मुंबई के बॉलीवुड के भी स्टार बन सकते थे। वे एकदम रंजन की तरह तलवारबाजी करते थे।

तब भी बंगालियों की शादी में उपहार और  दहेज में भी किताबें देने का रिवाज था। अवनी काका को शादी में दर्जनों उपन्यास और दूसरी किताबें मिली थीं।

काका प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक थे। काकी भी पढ़ाती थीं। वे घर में ताला लगाकर अक्सर बाहर होते और मैं  कक्षा 5 से पढ़ाकू था। कुछ न कुछ पढ़ने को चाहिए था और पढ़ने के लिए मैं कुछ भी कर सकता था। मैं अक्सर उनके घर का ताला खोल लिया करता था। पढ़ने की गरज से ताला खोलना मेरे बाएं हाथ का खेल था। घर में घुसकर किताबें लेकर सीधे खेत में निकल जाता था और काका काकी के लौटने से पहले खुफिया जानकारी के मुताबिक वक्त से पहले किताब पढ़कर उनके सूटकेस में रख आता था।

अविनाश और असीम सिडकुल में काम करते हैं। मेरे गांव के ज्यादातर युवा और स्त्रियां भी सिडकुल में कामगार हैं। हमारे प्रधान संजीत विश्वास सिडकुल के मजदूर नेता हैं। इनमें से ज्यादातर अशोका  लेलैंड,टाटा और बजाज के बड़े कारखानों या उनके सहायक उद्योगों में काम करते हैं, जो सारे के सारे बन्द हैं।

असीम को रुक-रुककर बुलाया जा रहा है काम पर। पूरे गांव में उसी को। दिनेशपुर गूलरभोज लालकुआं गदरपुर रुद्रपुर काशीपुर रामनगर किच्छा सितारगंज शक्तिफार्म खटीमा के दर्जनों गांवों के लाखों युवा सिडकुल के बेरोज़गार हैं और बाकी लोग देशभर में दिहाड़ी मजदूर।

ये तमाम लोग बेरोज़गार हैं। खस्ताहाल खेती उन्हें न रोटी दे सकती है और न रोज़गार। मेरे गांव में तो सबके पास, भूमिहीनों के पास भी खेती के लिए कुछ कुछ जमीन है। पूरी तराई में ऐसे गांव बेहद कम हैं।

महानगरों, नगरों, कस्बों और केंद्र, राज्य सरकारों की औकात क्या है कि करोड़ों बेरोज़गार लोगों को मुफ्त में रहने को घर देते रहें, महीनों तक और राशन पानी खाना, नकदी भी? जबकि खजाना अमीरों को लुटाया जाना है? उनसे क्या उम्मीद कीजै जो मुनाफा के कारोबारी हैं?

आज दिल्ली के बड़बोले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी कह दिया कि सिर्फ लॉकडाउन से कोरोना खत्म नहीं होगा। पहले दिन से मैं यही लिख बोल रहा हूँ। लेकिन न में मोदी हूँ और न केजरीवाल। आपने भी नोटिस नहीं लिया।

मैं संघ परिवार के नस्ली नफरत और हिंसा के मनुस्मृति एजेंडा के खिलाफ हूँ। मैंने अभी मोदी का उतना तीखा विरोध नहीं किया जितना इंदिरा गांधी,  बुद्धदेब भट्टाचार्य या मनमोहन सिंह का किया।

क्योंकि सवर्ण मीडिया और बुद्धिजीवी दलित, आदिवासी  और पिछड़ों को नेतृत्व के लायक मानते ही नहीं हैं। सजा सिर्फ लालू प्रसाद को होती है। बाकी बेदाग छूट जाते हैं।

मैं   सचमुच दिलोजान से चाहता था कि मोदी खुद को भारतीय जनता का नेता बनकर दिखाएं। चुनौतियों का राजनीति से ऊपर उठकर दिखाएं। लेकिन वे तो हिटलर बनने के फिराक में हैं। हिटलर बनते बनते वे मध्ययुग के मुक्तबाजारी ब्रांडेड तुगलक बन गए।

परिवार से जिसका नाता नहीं होता, वह महान हो सकता है। सामाजिक और स्वाभाविक नही होता और अंततः स्वभाव से तानाशाह होता है।

किस गधे ने कहा था कि लॉकडाउन दो महीने में कोरोना को खत्म कर देगा? खबर तो यह है कि जून तक लॉक डाउन जारी रखने की योजना है। लॉक डाउन के बावजूद महानगरों का चप्पा-चप्पा कोरोना है। महानगरों का विनाश इसी तरह होता है।

गांव हर हाल में बचा रहता है। गांव ही बिठाकर खिला सकता है। सामाजिक सुरक्षा दे सकता है। गांव में ही समाज और सामुदायिक जीवन है, जो मनुष्यता और सभ्यता के लिए अमृत कुम्भ हैं। इस अक्षय अमृत कुम्भ को किसने लूट लिया है?

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
  किसने कहा था कि जो जहां है
, वहीं रहे? सबको खाना मिलेगा। सबको छत मिलेगी?

जब कोरोना इतनी तेजी से नहीं फैल रही थी,तब मजदूरों के घर वापसी की कोशिशों को चीख-चीखकर देश के खिलाफ़ साजिश बता रहे थे?

फिर वे कौन लोग हैं जो खाना देने में फेल सरकारों के गांवों में कोरोना फैलाने के शाही इंतजाम को महिमामण्डित कर रहे हैं?

मोदीजी, बहुजनों के प्रधानमंत्री, चाहे संघी ही क्यों न हो, बहुजनों को इस तरह मारने के इंतजाम के सनकी फैसले सेनाध्यक्षों के मार्फ़त लागू करवाने की आपसे आशंका नहीं थी।

जो लोग गोबर  का ट्रम्प बना रहे थे वे असल में गोबर से क्या बना रहे थे?

पलाश विश्वास,

कार्यकारी संपादक प्रेरणा अंशु

दिनेशपुर।

बसंतीपुर में घर से।

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