हम लेके रहेंगे आज़ादी !! तिलक भारतीय राष्ट्रवाद के नेता थे, हिन्दू राष्ट्रवाद के नहीं।

है हक़ हमारा आज़ादी !

हम लेके रहेंगे आज़ादी !!

‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे’ ऐसा उद्घोष करने वाले बाल गंगाधर तिलक का यह सौवाँ निर्वाण दिवस है। पहली अगस्त 1920 को वे नहीं रहे।

भारत के प्रथम स्वातंत्र्य युद्ध (1857) से कुछ महीने पहले 23 जुलाई 1856 को वे जन्मे थे। कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव भले ही 1929-1930 के अधिवेशन में पास किया हो, तिलक ने भारतीयों के इस जन्मसिद्ध अधिकार की घोषणा उससे काफी पहले कर दी थी। यह घोषणा न केवल भारत के लिए बल्कि विश्व के प्रत्येक मनुष्य के लिए स्वतंत्रता के अधिकार की प्रस्थापना है।

वे मनीषी थे, नायक भी थे। मंडाले जेल में 1908-1914 के दौरान उनका लिखा ग्रंथ ‘श्रीमद्भागवत गीता रहस्य’ भारतीय वांगमय की अमूल्य धरोहर है। हर क्रांतिकारी को उसे पढ़ना चाहिए। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।

Madhuvan Dutt Chaturvedi मधुवन दत्त चतुर्वेदी, लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।

तिलक कांग्रेस के नेता थे। वे बर्ष 1920 तक जीवित रहे। बर्ष 1908-1914 में वे मंडाले जेल में थे जब उन्होंने ‘श्रीमद्भागवत गीतारहस्य’ की रचना की थी। हिन्दू महासभा की स्थापना 1905 में हो चुकी थी। उनका कोई सरोकार हिन्दू महासभा से नहीं था और उनके लेखन, वक्तव्यों तथा कार्य व्यवहार में कहीं भी हिन्दू राष्ट्रवाद या हिन्दू साम्प्रदायिकता दिखाई नहीं देती।

लाला लाजपतराय, विपिन चंद्र पाल और बाल गंगाधर तिलक की यह नेतात्रयी ( तिकड़ी) कांग्रेस का गरम दल कही जाती थी। वे भारतीय राष्ट्रवाद के नेता थे, हिन्दू राष्ट्रवाद के नहीं।

मधुवन दत्त चतुर्वेदी

 

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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