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couple facing each other closely

प्रेम ही क्रांति है ..Love is revolution!

क्रांति या प्रेम …प्रेम या क्रांति ..दोनों अलग हैं ..या दोनों एक …या एक दूसरे के पूरक..एक प्रक्रिया के दो सम्बोधन… क्रांति मतलब बदलाव..परिवर्तन ..प्रेम का अर्थ है बदलाव ..परिवर्तन .. दोनों में फर्क है ‘स्वेच्छा’! प्रेम में ‘स्वेच्छा’ सर्वोपरि है ..जबकि क्रांति ‘स्वेच्छा से शुरू होकर तानाशाही तक पहुँच जाती है.

प्रेम को व्यक्तिगत स्तर एवम् सीमा तक देखा जाता है जबकि ‘प्रेम’ जीवन और मनुष्यता का ‘विवेकशील’ आधार है.

प्रेम व्यक्ति और व्यक्तियों को बदलता है.

दो प्रेमी अपने ‘लोक’ का ‘स्वेच्छा’ से निर्माण करते हैं. मानवीय सृजन प्रकिया से गुजरते हुए अपने संसार में सिमट जाते हैं. अपने ‘अमरप्रेम’ से दुनिया में ‘प्रेम’ की लौ जला जाते हैं. सदियों तक उनके प्रेम के किस्से साहित्यकारों को,कलाकारों को प्रेरित करते रहते हैं. उनके प्रेम को शब्दबद्ध कर अनगिनत कलाकार और साहित्यकार अमर हो जाते हैं.

व्यवस्था की जड़ता हमेशा प्रेम का विरोध करती है क्योंकि ‘व्यवस्था’ जड़ होती है. एक हुकुम की तालीम पर चलती है.

व्यवस्था को ‘स्वेच्छा’ शत्रु लगती है. ‘स्वेच्छा व्यवस्था में अराजकता का भाव पैदा करती है. क्योंकि कोई भी व्यवस्था ‘परिवर्तन’ से डरती है या यूँ कहें बदलाव व्यवस्था का मूल स्वभाव नहीं है उसका मूल स्वभाव है जड़ता जिसे सत्ता का समर्थन होता है ..

हर प्रकार की सत्ता सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक या फिर राजनैतिक. सत्ता को अपने होने के लिए, अपने आप को साबित करने के लिए एक व्यवस्था की ज़रूरत होती है. सामान्य जनता को व्यवस्था के जरिये ‘सत्ता’ अपने होने का अहसास और आभास कराती है. वस्तुस्थिति का अहसास है व्यवस्था. जीवन हर पल बदलता है जबकि व्यवस्था जड़ रहती है. कालांतर में बदलाव मनुष्यता के लिए अनिवार्य हो जाता है जबकि व्यवस्था जड़ रहती है. बदलाव और जड़ता टकराने लगते हैं और यह टकराव ‘क्रांति’ को जन्म देता है. क्रांति का लक्ष्य जीवन के लिए अनिवार्य ‘बदलाव’ होते हुए भी उसका दामन मनुष्यों के रक्त से सना होता है ..लहूलुहान होता है ..रक्तरंजित होता है!

मानव को मुक्त करने के लिए मनुष्यता की हत्या का दाग क्रांति के माथे पर लगा होता है जबकि प्रेम मनुष्यता को जन्मता है.

क्रांति के हत्यात्मक दाग से मुक्ति के लिए ‘प्रेम’ के निजी स्वरूप को व्यवस्थागत दायरे में देखने की आवश्यकता है. प्रेम जब व्यवस्थागत दायरे में मुखरित होकर ‘व्यवस्था’ को बदलेगा तब वो मनुष्यता का ‘परमस्वरूप’ होगा. प्रेम के इसी व्यापक रूप को साकार करने की नीति का नाम है ‘राजनीति’.

पर दुखद तथ्य यह है कि सदियों से राजनीति मात्र सत्ता पाने तक सिमट गयी. सभी सभ्यताएं राजनीति को सत्ता का द्वार मात्र समझती हैं. मनुष्य हमेशा उत्क्रांति के पथ पर चलता है. इसलिए अब समय आ गया है कि हम राजनीति के व्यापक स्वरूप को स्वीकार कर उसे क्रियान्वित करें. जैसे जीवन हर पल बदलता है उसी की परिणिति है कि राजनीति भी हर पर बदलती है ..राजनीति हर पल बदलती है का अर्थ उसके ‘तत्व’ नही प्रकिया बदलती रहती है. अलग राजनैतिक दलों का ‘तत्वों’ के लिए एक साथ आना मनुष्यता की अनिवार्यता है और मात्र सत्ता तक सीमित होना अवसरवाद.

हम भारतीयों को अपने स्वतन्त्रता आन्दोलन से सीखने की ज़रूरत है. हमने आज़ादी के लिए राजनीति के पवित्र मूल्यों को पहले समझा फिर सत्ता हासिल की पर त्रासद यह रहा कि सत्ता मिलते ही हम राजनीति के पवित्र मूल्यों को भूल गए और मात्र 70वर्षों में ‘विकारवादी’ लोकतंत्र की कमजोर कड़ी ‘संख्याबल’ का फ़ायदा उठाकर, ‘विकास’ की लालच देकर सत्ता पर काबिज़ हो गए हैं और हमारे लोकतंत्र के प्रेम ग्रन्थ ‘संविधान’ को लहुलुहान कर रहे हैं.

हमारे भविष्य निर्माताओं ने ‘आज़ादी के वीरों और शहीदों’ की कुर्बानियों से जन्में लोकतंत्र को सुरक्षित और चिरायु होने के वरदान स्वरूप हमें संविधान दिया.

हम भारतीयों को अब राष्ट्रध्वज के साथ-साथ अपने संविधान के लिए भी आहुति देनी होगी ताकि हमारा ‘लोकतंत्र’ आबाद रहे. समता, समानता, बंधुतत्व, मानवीय गरिमा का प्रेम ग्रन्थ है हमारा संविधान! हमारा संविधान ‘प्रेम’ का व्यवस्थागत स्वरूप हैं. आइये हम भारतीय अपने प्रेम ग्रन्थ यानी संविधान से अपने जीवन के सपनों को साकार कर दुनिया को रक्तरंजित बदलाव की बजाय मानवीय गरिमा से जनित प्रेम क्रांति का मार्ग दिखाएं. क्योंकि प्रेम ही क्रांति है ..Love is revolution!

-मंजुल भारद्वाज

Manjul Bhardwaj
Manjul Bhardwaj

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