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फेफड़ा पूरा फूल नहीं रहा, क्या करें ?

क्या करें जब आपका एक तरफ का फेफड़ा पूरा फूल नहीं रहा

अपने देश में फेफड़े के सिकुड़ जाने की समस्या बहुत ज्यादा है। अकसर आपने देखा होगा कि आपके परिवार में किसी एक सदस्य को फेफड़ों का इन्फेक्शन (Lung infection) हुआ था और उसकी छाती में ट्यूब डालकर पानी व मवाद निकाला गया (Water and pus were removed by inserting a tube into the chest) था। इसके बावजूद भी फेफड़ा पूरी तरह से फूला नहीं। कई ऐेसे नवयुवक व नवयुवतियां होंगी जिनकी सड़क दुर्घटना में छाती में चोट (Chest injury in road accident) आई थी जान तो बच गई पर एक तरफ का फेफड़ा सिकुड़ गया है। बहुत बड़ी सुख्या में कई ऐसे नौजवान मिलेंगे जिनकी छाती में नली पड़ी हुई है और नली से मवाद और हवा के बुलबुले निकल रहे हैं। ऐसे मरीज छाती में ट्यूब डलवाए और ट्यूब से जुड़ी थैली में मवादनुमा पानी भरे हुए महीनों से घूम रहे हैं। सारी जगह हर तरह का इलाज करवा लिया, नीम हकीमों के चक्कर लगा लिए, घरेलू दवाइयां भी खाईं गई पर नली के जरिए मवाद और हवा का निकलना बंद नहीं हुआ।

कितनी अजीब विडंबना है कि एक तरफ तो भारत में उपलब्ध उच्चकोटि के स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में हम बढ़-चढ़ कर बातें करते हैं तो दूसरी तरफ  खस्ता हाल स्वास्थ्य सेवाओं की ये जीती जागती मिसाल है कि लोग छाती में ट्यूब डलवाए बरसों से घूम रहे हैं। ऐसा लगता है कि मरीज ने स्वयं ही आत्मसमर्पण कर दिया है यह सोचकर कि छाती में पड़ी नली व उससे निकलने वाले मवाद से कभी उबर नहीं पायेंगे। मरीज के साथ साथ फिजीशियन भी हताश हो चुके होते हैं।

आखिर फेफड़ा क्यों सिकुड़ जाता है? | फेफड़ों की सिकुड़न के कारण | After all, why does the lung shrink?

फेफड़ा अगर सांस लेने पर पूरी तरह से फूल नहीं रहा है तो इसका मतलब यह है कि या तो फेफड़ा इन्फेक्शन की वजह से नष्ट हो गया है और अपनी पुरानी स्थिति में लौटने में असमर्थ है। फेफड़े के पूरा न फैलने का कारण (Cause of complete lung failure) दूसरा यह भी हो सकता है कि फेफड़े में हवा ले जाने वाली श्वास नलियों में किसी तरह की रूकावट हो।

श्वास नली में रूकावट पैदा करने वालों में ट्यूमर या खून का कतरा या फिर बलगम के कचरे का जमाव हो सकता है।

फेफड़े के पूरा न फैलने का तीसरा मुख्य कारण छाती में कभी पहले हुए इन्फेक्शन का अपर्याप्त इलाज होना है जिसके परिणामस्वरूप इन्फेक्शन की वजह से छाती में मवाद (Chest pus) इकट्ठा हो जाता है। अगर ये मवाद समय रहते पूरी तरह से निकाला नहीं गया तो ये मवाद फेफड़े के ऊपर चढ़ी हुई झिल्ली को अत्यधिक मोटा बना देता है। इसका परिणाम यह होता है कि मवाद और मोटी झिल्ली फेफड़े को चारों ओर से दबा देता है और फेफड़े को पूरी तरह से फूलने नहीं देता है।

कौन से रोग फेफड़े को पूरा फूलने नहीं देते? | How Different Conditions Affect Your Lungs

हमारे देश भारतवर्ष में फेफड़े के सिकुड़ जाने का सबसे बड़ा कारण टी.बी. का इन्फेक्शन है। जैसा आप जानते हैं अपने भारतवर्ष में हर साल 3 लाख नए टी.बी. के मरीज प्रकाश में आते हैं। टी.बी. का इन्फेक्शन (TB infection) एक तरफ तो फेफड़े की प्राकृतिक संरचना को नष्ट कर देता है तो दूसरी तरफ  टी.बी. इन्फेक्शन की वजह से छाती में इकट्ठा हुआ पीला पानी फेफड़े को बाहर से दबाता है। इस इकट्ठे हुए पीले पानी की दो गतियां होती हैं। एक तो अगर ये पीला पानी गाढ़ा हो गया और सूख गया तो यह फेफड़े के चारों ओर जाल बना लेता है और उसके चारों ओर की खाली जगह को भर देता है जिससे फेफड़ा सिकुड़ जाता है।

हाइड्रो न्यूमोथोरैक्स

छाती में इकट्ठे हुए पानी की दूसरी गति यह होती है कि यह प्रभावी ढ़ंग से इन्फेक्शन पर नियंत्रण न होने की वजह से यह पीला पानी मवाद में परिवर्तित हो जाता है जिससे फेफड़ा जख्मी हो जाता है और इसका परिणाम यह होता है कि फेफड़े के अन्दर स्थित श्वास नलियों से हवा निकलकर छाती के अन्दर इकट्ठी होने लगती है और ये इकट्ठा हुआ मवाद और हवा, फेफड़े को किसी भी सूरत में फूलने नहीं देता। इस अवस्था को मेडिकल भाषा में हाइड्रोन्यूमोथोरेक्स (Hydropneumothorax in Hindi) कहते हैं।

न्यूमोनिया और फेफड़ों का सिकुड़ना

फेफड़े के सिकुड़ने का दूसरा मुख्य कारण न्यूमोनिया का इन्फेक्शन (Pneumonia infection) है जो अगर प्रारंभिक अवस्था में प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया गया तो इसकी परिणिति छाती के अन्दर इकट्ठे हुए मवाद के रूप में होती है। इन्फेक्शन से क्षतिग्रस्त फेफड़ा (Infections damaged lungs) और उसके चारों ओर इकट्ठा हुआ मवाद फेफड़े को अपनी पुरानी फूली हुई स्थिति में लाने के सारे प्रयास नाकाम कर देता है।

फेफड़े के सिकुड़ने में छाती चोट की अहम भूमिका | Important role of chest injury in lung contraction

आजकल की बेतहाशा और भागदौड़ की जिंदगी में सड़क दुर्घटनाओं की भरमार है। आप देखते व सुनते होंगे कि आए दिन नवयुवक व नवयुवतियां सड़क दुर्घटनाओं में छाती की चोट की वजह से घायल हो जाते हैं। छाती चोट की वजह से पसलियां तो टूटती ही हैं और साथ ही साथ फेफड़े व छाती की चोट की वजह से छाती के अन्दर खून का जमाव हो जाता है। ऐसे समय में अगर समय रहते किसी थोरेसिक सर्जन (Thoracic surgeon) से छाती में ट्यूब डलवाकर जमा हुए खून को निकलवाया नहीं गया तो ये छाती के अन्दर स्थित फेफड़े को दो तरह से नुकसान पहुंचा सकता है एक तो ये जमा हुआ खून गाढ़ा होकर के ठोस हो जाता है और फेफड़े पर दबाव बनाता है। दूसरे इस जमा हुए खून में अगर इन्फेक्शन पहुंच गया तो इसे मवाद में परिवर्तित होने में देर नहीं लगती और ये जमा हुआ मवाद फेफड़े को क्षतिग्रस्त करने के साथ-साथ उस पर दबाव डालता है जिससे फेफड़ा अपनी पुरानी स्थिति में फिर से नहीं आ पाता।

देशी तमन्चे व गोलाबारी से लगी चोट भी फेफड़े की सिकुड़न का कारण

अक्सर समाज में व्याप्त गुंडागर्दी, लड़ाई झगड़े व दंगे फसाद में लोगों को छाती में चोट पहुंचती है जिसकी वजह से छाती में खून इकट्ठ (Collect blood in chest) हो जाता है। इसलिए छाती चोट से घायल व्यक्ति को चाहिए कि वो तुरंत किसी थोरेसिक सर्जन से परामर्श लें और फेफड़े को नष्ट होने से बचाए।

आजकल गुंडे मवालियों द्वारा इस्तेमाल किए गए देशी तमंचे भी फेफड़े की सिकुडऩ के लिए जिम्मेदार है। होता यह है कि देशी तमंचों में प्रयुक्त देशी कारतूस में छर्रों के साथ प्लास्टिक का खोल भी होता है जो छर्रों के साथ साथ छाती के अन्दर प्रवेश कर जाता है। छर्रे एक बार न भी नुकसान पहुंचाए पर छाती के अन्दर प्रविष्ट हुआ कारतूस का प्लास्टिक का खोल फेफड़े की दयनीय हालत बना देता है। ये प्लास्टिक का खोल फेफड़े के अन्दर इन्फेक्शन का बहुत बड़ा कारण होता है जिसके परिणामस्वरूप छाती की दीवार में कारतूस के छर्रों की मार द्वारा बनाए गए छेदों से मवाद निकलता रहता है और फेफड़ा सिकुड़ जाता है। अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो ये ही क्षतिग्रस्त सिकुड़ा हुआ फेफड़ा संपूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है तब पूरे फेफड़े को निकलवाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता।

फेफड़े की सिकुड़न में कैंसर का क्या रोल | What is the role of cancer in lung contraction

कुछ विशेष तरह के छाती के कैंसर (Chest cancer) फेफड़े को पूरा फैलने नहीं देते जिससे फेफड़े की क्रिया प्रणाली पूरी तरह से बाधित हो जाती है। फेफड़े में सिकुड़न पैदा करने वाले इन ट्यूमरों में सबसे पहला नाम फेफड़े के ऊपर चढ़ी हुई झिल्ली का ट्यूमर है जिसे मेडिकल भाषा में ‘मीजोथीलियोमा’ (Mesothelioma in Hindi) कहते हैं। ये ट्यूमर एस्बेस्टस नामक खनिज के संपर्क में आने वाले लोगों को होता है। ये मीजोथीलियोमा का ट्यूमर धीरे धीरे एक तरफ तो फेफड़े को चारों ओर से दबोच लेता है और दूसरी तरफ फेफड़े के अन्दर घुसकर फेफड़े को पूरी तरह से निष्क्रिय बना देता है। इसका समय रहते इलाज न किया गया तो देर सवेर मौत निश्चित है।

कुछ ट्यूमर फेफड़े में स्थित श्वास नली की शाखाओं में होते हैं जो सांस लेते वक्त श्वास नली के अन्दर जाने वाली हवा को फेफड़े तक पहुंचने में बाधा उत्पन्न करते हैं जिसके परिणामस्वरूप फेफड़े में पूरी हवा नहीं पहुंच पाती और फेफड़ा सिकुड़ कर रह जाता है।

अगर आपका फेफड़ा सिकुड़ा हुआ है तो क्या करें? | What to do if your lungs are contracted? | how to take care of lungs

अगर किसी व्यक्ति का किन्हीं कारणों से पूरा फेफड़ा या फेफड़े का कुछ हिस्सा सिकुड़ गया है और सांस खींचने में पूरी तरह से फूल नहीं रहा है या फिर आपकी छाती में पानी या मवाद इकट्ठा होने पर उसे निकालने के लिए छाती में ट्यूब डाली गई थी और छाती से पानी या मवाद निकाला गया था और छाती में एक हफ्ते तक ट्यूब रखने के बावजूद भी फेफड़ा अभी तक सिकुड़ा हुआ है और सारी कोशिशों के बावजूद फेफड़ा फूल नहीं रहा है। ऐसी परिस्थितियों में हाथ पर हाथ धरकर मत बैठिए और बगैर समय नष्ट किए तुरंत किसी बड़े अस्पताल में किसी अनुभवी थोरेसिक सर्जन से परामर्श लें। अगर आपकी छाती में मवाद निकालने के लिए डाली गई ट्यूब को एक हफ्ते से ज्यादा समय हो गया है तो समझ जाइए कि फेफड़ा सिकुड़ गया है और आपको चाहिए कि तुरंत किसी थोरेसिक सर्जन से संपर्क कर उसकी निगरानी में आगे इलाज कराएं, नहीं तो फेफड़ा पूरी तरह से नष्ट हो जाएगा।

कभी कभी हमारे चिकित्सक छाती में इकट्ठे हुए मवाद को बार बार इंजेक्शन व सुई द्वारा थोड़ा-थोड़ा निकालते रहते हैं। इसका नुकसान यह होता है कि एक तो मवाद पूरा निकल नहीं पाता और इन्फेक्शन छाती के अन्दर बना ही रहता है और दूसरी तरफ फेफड़ा सिकुड़ जाता है और शनै: शनै: नष्ट होना शुरू हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में लापरवाही न करके तुरंत किसी जनरल सर्जन की बजाय किसी थोरेसिक सर्जन से परामर्श लेकर उनसे इलाज कराएं।

सिकुड़़ गए फेफड़े के इलाज की विधाएं | What is the treatment for lung shrinking?

अगर आपका एक तरफ का फेफड़ा सिकुड़ा हुआ है और छाती में ट्यूब पड़ी हुई है तो हमेशा किसी ऐसे बड़े अस्पताल में जाएं, जहां एक अनुभवी थोरेसिक सर्जन की चौबीस घंटे उपलब्धता हो और उसके साथ ही साथ अत्याधुनिक जांचें जैसे मल्टी स्लाइड सी.टी,. टैक्सला एम.आर.आई., ब्रोंकोस्कोपी (bronchoscopy in Hindi),थोरेकोस्कॉपी (Thoracoscopy) की सुविधा हो क्योंकि इन जांचों के आधार पर ही सिकुड़े फेफड़े के इलाज की दिशा का निर्धारण होता है। सिकुड़े फेफड़े को अपनी पुरानी स्थिति में लाने व दूसरे फेफड़े को होने वाली क्षति से बचाने के लिए ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज है। मरीज को चाहिए कि ऑपरेशन करवाने में आनाकानी न करें क्योंकि ऑपरेशन में कोताही बरतने से फेफड़ा तो खोना ही पड़ेगा पर उसके साथ साथ जान भी जा सकती है।

Loss of delayed operation in contracted lungs

सिकुड़े फेफड़े में ऑपरेशन देरी से करने का एक सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि दूसरी तरफ का स्वस्थ फेफड़ा इन्फेक्शन की चपेट में आ जाता है, तब प्राण गंवाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता। सिकुड़े फेफड़े के ऑपरेशन में कई विधियां अपनाई जाती हैं, जैसे डीकोरटिकेशन और इम्पायेमेक्टमी जिसमें फेफड़े को जकड़ने वाली झिल्ली व ठोस मवाद को ऑपरेशन द्वारा निकाल कर फेफड़े को स्वतंत्र किया जाता है जिससे फेफड़ा सांस खींचने पर आसानी से फूल कर अपनी सामान्य अवस्था को प्राप्त कर सके। यह ऑपरेशन सिकुडे फेफड़े के आरंभिक दिनों में बहुत ही सफल व कारगर साबित होता है क्योंकि आरंभिक अवस्था में सिकुड़ा फेफड़ा दबाव में तो होता है पर ज्यादा क्षतिग्रस्त नहीं होता।

महंगी पड़ सकती है इलाज में लापरवाही

ध्यान रहे ऑपरेशन में टालामटोली करने पर फेफड़ा का कुछ या पूरा हिस्सा ज्यादा दिन सिकुड़े रहने के कारण नष्ट हो चुका होता है तो ऑपरेशन द्वारा झिल्ली हटाने के साथ-साथ फेफड़े के क्षतिग्रस्त हिस्से को भी बाहर निकालना पड़ता है। इस ऑपरेशन को लोबेक्टमी (Lobectomy in Hindi) कहते हैं। कभी-कभी सिकुड़ गए फेफड़े को पूरा ही निकालना पड़ता है जब यह फेफड़ा नष्ट होने के साथ टी.बी. के कीटाणुओं का पिटारा बन चुका होता है। ऐसे नष्ट हुए फेफड़े को जितनी जल्दी शरीर से बाहर निकाल दिया जाए उतना ही मरीज की जान बचाने में सहायक होता है। इस ऑपरेशन को मेडिकल भाषा में निमोनेक्टोमी/ न्यूमोनेक्टॉमी (Pneumonectomy in Hindi) कहते हैं।

एक बात और ध्यान में रखें कि फेफड़े के ऑपरेशन को गंभीरता से लेना चाहिए। फेफड़े के ऑपरेशन के लिए अनुभवी बेहोशी देने वाले डाक्टर का होना बहुत आवश्यक है। ऑपरेशन के बाद एक अत्याधुनिक आई.सी.यू., इन्टेसिविस्ट व अनुभवी क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट की उपलब्धता का होना बहुत जरूरी है। साथ ही साथ कृत्रिम श्वास यंत्रों (वेन्टीलेटर) की आई.सी.यू. में प्रचुर मात्रा में उपलब्धता हो। अस्पताल का चुनाव करते वक्त इन सब बातों का ध्यान रखें क्योंकि इन सब की सिकुड़े फेफड़े के सफल इलाज में अहम भूमिका है।

अकसर देखा गया है कि ज्यादातर दिल का ऑपरेशन करने वालों को फेफड़े के ऑपरेशन का ज्यादा अनुभव नहीं होता है। इसलिए सर्जन का चुनाव करते समय इस बात का भी ध्यान रखें।

डॉ. के. के पाण्डेय

वरिष्ठ थोरेसिक व कार्डियो वैस्क्युलर सर्जन

इन्द्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली

नोट – यह समाचार किसी भी हालत में चिकित्सकीय परामर्श नहीं है। यह सिर्फ एक जानकारी है। कोई निर्णय लेने से पहले अपने विवेक का प्रयोग करें।)

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार)

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