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jagdishwar chaturvedi

श्रीमद्भगवद्गीता से क्या सीखा ?

What did you learn from Shrimad Bhagavad Gita?

मथुरा में जिस परिवेश और परिवार में जन्म हुआ वहाँ ‘आस्था’ ख़ासकर सनातनी धार्मिक आस्थाएँ बड़ी प्रबल थीं। इन आस्थाओं को कब और कैसे जीवनशैली और संस्कारों में समायोजित कर दिया गया। यह मैं नहीं जानता। हमारा सनातनी हिन्दू परिवार था। खान-पान, जीवन शैली, संस्कार आदि के क्षेत्र में पुराने रिवाज़ों का प्रदर्शन और दिखावा बहुत होता था। आज भी होता है। यहीं से इस पारिवारिक मूल्य-संरचना को चुनौती देने वाले विचारों और नज़रिए का जन्म हुआ। मन के अंदर कहीं न कहीं इनसे निकलने की इच्छा भी थी। इसी इच्छा ने मेरे जीवन की दिशा बदल दी। आरंभ में धर्म में ‘आस्था’ थी, बाद में उसकी जगह वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने ले ली।

मार्क्सवाद पढ़ने और उसके अनुरूप मूल्य ग्रहण करने की प्रक्रिया ने सारे रुटीन को ही बदल दिया। पहले खोए हुए को पाने के लिए अतीत में लौटते थे, लेकिन नई वैज्ञानिक दृष्टि ने उसके रूपान्तरण को समझने में मदद की। शहर के लोगों में व्यक्तिगत और निजी मसलों पर व्यस्तता अधिक रहती और वे अतीत में या धर्म में उनके समाधान खोजते रहते हैं। इसने परिवेश में अतीतजीवी समाज निर्मित किया।

‘खोए हुए को पाने’ के क्रम में आम लोगों के ज़ेहन में अतीत के जुल्मों की कहानियाँ-क़िस्से चर्चा में रहते हैं। यही वजह है मथुरा के लोगों के पास उन दिनों अतीत के क़िस्सों, जुल्म की कहानियों, ऐतिहासिक दंतकथाओं का अक्षय भंडार था।

मथुरा के अतीत में ‘आस्था’ के सवालों पर वैचारिक, धार्मिक और सामाजिक संघर्ष हुए हैं। इस क्रम में उदीयमान नए विचारों ने पहले से वर्चस्व बनाए हुए विचारों को चुनौती दी। ख़ासकर मध्यकाल में उदार विचारों की परंपरा पैदा हुई, जिसे 18वीं सदी में पैदा हुए सनातनी हिन्दू भावबोध ने अनुदारतावादी दिशा में मोड़ दिया। 18वीं सदी के पहले सनातनी हिन्दू आस्था और संस्कार मथुरा में नहीं दिखते। उससे पहले एक ही क़िस्म के विचार और उनके प्रति इक-सार आस्था समाज में नज़र नहीं आती।

‘आस्थाओं’ के संग्राम में अपने महाकाव्यों और उनके समानांतर पैदा हुए साहित्यबोध, साहित्यिक विचारधाराओं और दर्शनों को देखें तो पाएँगे कि ‘आस्था’, ‘प्रतिबद्धता’ और ‘विचारधारा’ ये तीनों एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं।

मध्यकाल में हिन्दुओं की आस्थाएँ एक जैसी नहीं थीं। हिन्दू भी एक जैसे नहीं थे। लेकिन वे एक जैसे कैसे बन गए ॽ उनके अंदर एक ही क़िस्म की विचारधारा, सामाजिक संरचना ने कैसे जड़ें जमा लीं ॽ कब से यह सिलसिला सामने आता है ॽ इत्यादि सवालों पर मित्रों में आए दिन बहसें होतीं।

इन बहसों में ही हिन्दू धर्म और उसकी प्राचीन मान्यताओं को गहरी और बड़ी चुनौती दी गयी। पहली बार बड़ी मात्रा में हिन्दूधर्म के मध्यकाल में बने ढाँचे और वैचारिक वर्चस्व को सीधे चुनौती दी गयी। इस दौर में धार्मिकता का प्रचार, धार्मिक आस्थाओं और आस्था के नए क्षेत्रों का उदय हुआ। इसने धर्मनिरपेक्षता के स्पेस को धीरे-धीरे नष्ट कर दिया।

19वीं शताब्दी ने जहाँ एक ओर पुराने हिन्दूधर्म को चुनौती दी उसके वैचारिक रूपों को बींसवीं शताब्दी में बुनियादी तौर पर धराशायी किया, तो 21वीं शताब्दी में यह महसूस किया गया कि 20सदी में हिन्दुओं के साथ धोख़ा हुआ है। इस धोख़े का बदला लिया जाना चाहिए। इस नए क़िस्म की ‘आस्था’ के मुख्य उपकरण बने ‘महात्मा’ और ‘कथावाचक’, इनके समागमों के साथ तीर्थाटन और मंदिरों में पूजा-अर्चना की एक नई बाड़ पैदा हुई। राममंदिर से लेकर श्रीकृष्ण मंदिर तक नए देवता पधराए गए और नए आंदोलन पैदा हुए।

ऐसे मंदिर थे जिनमें अँगरेज़ों, निचली जातियों और औरतों को घुसने नहीं देते थे। यह एक तरह का नव्य ब्राह्मणवाद था जो विभिन्न रूपों में सामने आया।

आस्था और विभाजन के जातिवादी और सनातनी हिन्दू जीवनशैली के पक्षधर मथुरा में लंबे समय से रहे हैं। विगत तीन दशक में यह फिनोमिना पूरे देश में फैल गया।

नया भारतीय कौन है? (Who is the new Indian?)

नया भारतीय वह है जो स्वभाव से असहिष्णु है और मन से मानवतावाद विरोधी है। नई सामाजिक इकाई है विभाजन, सामाजिक विभाजन।

पहले धर्म और वर्ग के नाम पर एकता थी। अब इसके उलट सामाजिक विभाजन के नाम पर एकता है। इसमें आस्था ही महत्वपूर्ण है इसीलिए साम्प्रदायिक ताक़तों ने ‘आस्था के लिए आस्था’ का नारा दिया। इस नारे के आधार पर नए सिरे से समाज को विभाजित करके बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के नाम से एकजुट किया गया। ‘आस्था’ के नाम पर जो भी एकत्रित हुए वे सब एक ही बात कहते थे भगवान असफल रहा। भगवान के प्रति आस्थावादी बहुसंख्यक थे। शहर में बहुत कम लोग थे जो भगवान को न मानते हों। इसीलिए शहरी परिवेश में ईश्वर विरोधी मुहिम चलाने या विचारधारा का प्रचार करने की संभावनाएँ नहीं थीं। फलतः हममें से सब भगवान को ऊपर से मानते थे। अंदर से असहमत थे।

कई के घरों में मंदिर थे अथवा मंदिरों के परिवेश से घिरा घर था। हम सबने साम्यवाद का प्रचार किया, धर्म की आलोचना विकसित की और इसके आधार पर धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया को गति प्रदान करने की कोशिश की।

सबसे दिलचस्प बात थी कि हम सब मित्रों में उदारतावाद और उससे जुड़े मूल्यों के प्रति गहरा आकर्षण था। वैचारिक फंडामेंटलिज्म मुझे कभी पसंद नहीं था, अफ़सोस की बात है कि इसके प्रचारक हिंदी समाज में लंबे समय से रहे हैं। वैचारिक फंडामेंटलिज्म से लड़ने में श्रीमद्भगवतगीता ने सबसे अधिक मदद की।

वैचारिक फंडामेंटलिस्ट विचार स्वातंत्र्य नहीं मानते, जबकि यह हमारी परंपरा का मुख्य जीवन मूल्य है। बाद में इसे संविधान में शामिल कर लिया गया। इसी प्रसंग में श्रीमद्भगवतगीता प्रतिनिधि रचना है। इस कृति के पाठ को वैचारिक फंडामेंटलिज्म को परास्त करने के वैचारिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

गीता में कितने श्लोक हैं?

गीता में 700 श्लोक हैं। इनमें 1 धृतराष्ट्र का, 41 संजय के, 84 अर्जुन के और 574 कृष्ण भगवान के श्लोक हैं। पंडित रामावतार विद्याभास्कर ने ‘गीता परिशीलन’ नामक भाष्य में लिखा है भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकले श्लोकों में दो महान भेद पाये जाते हैं। एक वे श्लोक हैं जिनमें ज्ञानी के लक्षणों का वर्णन है। दूसरे वे श्लोक हैं जिनमें जनमानस में ज्ञान नाम से प्रचलित मिथ्या आचार व्यवहारों का वर्णन है। इन दोनों प्रकार के श्लोकों में ज्ञानी के लक्षणों का वर्णन करने वाले श्लोक ही गीतोक्त उपदेश के रूप में स्वीकार किये जाते हैं। परन्तु जिन श्लोकों में ज्ञान का नाम लेकर चलाये हुए, अज्ञानान्ध संसार के आचार व्यवहारों का उल्लेख इसलिये किया गया कि उनकी उपेक्षा या खण्डन किया जाय, उन श्लोकों को भी केवल श्रीकृष्ण के मुख से कहे जाने के कारण गीता के उपदेश के रूप में मान लेना उचित नहीं है।

गीता पढ़ते समय पहला सवाल यह उठता है कि अर्जुन की बुद्धि का स्तर क्या था ॽउसके पास किस तरह की बुद्धिचेतना थी ॽ उसके बारे में यह मिथ है कि वह मेधावी और बुद्धिमान था। लेकिन गीता में इसके स्वरूप का जो चित्रण मिलता है वह अर्जुन के बारे में प्रचलित मिथ का खंडन करता है। मसलन् कुरूक्षेत्र में पहुंचकर अर्जुन किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गया था। श्रीकृष्ण ने संपूर्ण गीता में अर्जुन को युद्ध रूपी कर्तव्य को ज्ञान की स्थिति में रहकर परखने की प्रेरणा दी। युद्ध में क्या करें इसका आधार कॉमनसेंस को नहीं बल्कि ज्ञान को बनाया।

आमतौर पर सत्-असत् के बारे में विचार करते समय हम सभी लोग सब्जैक्टिविटी (आत्मगतता) के शिकार होते हैं, यह स्थिति अर्जुन की भी हुई इसके ही कारण उसके अंदर स्वजन मोह पैदा हुआ। यदि वस्तुगत ढ़ंग से अर्जुन सोचता तो वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ न होता। स्वजन मोह के कारण ही उसके अंदर विचार भ्रान्ति पैदा हुई। श्रीकृष्ण ने युद्धक्षेत्र में उसके सामने कोई ऐसी युक्ति नहीं रखी जिसके लिए शास्त्रज्ञान ज़रूरी होता, पुस्तकें पढ़नी पढ़तीं। श्रीकृष्ण ने सरल रूप में समझाया।

गीता को कैसे समझें?

कहने का आशय यह कि गीता को समझने के लिए पुस्तकों के सहारे की ज़रूरत नहीं है। ठीक से पढ़ने की आदत हो तो गीता समझ में आ सकती है।

गीता में अर्जुन ने एक ही सवाल किया है क्या युद्ध में स्वजन वध करके मोक्ष प्राप्ति संभव है ॽ इस प्रसंग में कृष्ण ने ‘स्वजन’ पदबंध के साथ जुड़ी भ्रांतियों का निराकरण किया है। वे कहते हैं युद्ध में कोई ‘स्वजन’ नहीं है। ‘स्वजन’ की बजाय ‘आत्म तत्व’ पर कृष्ण ने ज़ोर दिया और कहा सब देहों का एकमात्र विराटदेही रूप आत्मतत्व ही तुम्हारा ‘स्वजन’ या ‘स्वरूप’ है। इस देही में देहों के उत्पत्ति और विनाश से कोई परिवर्तन नहीं होता। देहों के जीवन मरण से अप्रभावित रहना ही देही का स्वधर्म है। तुम देहों को विनष्ट होते देखकर अपने मन पर इस विनाश का प्रभाव मत पड़ने दो और निर्मम होकर कर्तव्यपालन करते रहो, यही तुम्हारा स्वधर्म है। स्वधर्म की रक्षा करते रहना ही मोक्ष की अवस्था है। इससे भिन्न और कोई मोक्ष नहीं है। मृत्यु के बाद मोक्ष जैसी कोई चीज़ नहीं होती। मृत्यु के बाद मिलने वाला मोक्ष औपन्यासिक कल्पना है। इस कल्पना ने मोक्ष को मुर्दों की संपत्ति बना दिया। परन्तु मोक्ष मुर्दों की संपत्ति नहीं है। जीवित मनुष्य की विदेह मनोदशा ही मोक्ष की अवस्था है। गीता में श्रीकृष्ण ने इसी महासत्य को अर्जुन के सामने रखा।

कहने का आशय यह कि यथार्थ को मानो, जीवित मनुष्य ही जीवन का सार है। इसके साथ एक और बात कही, वह यह कि शब्दों के यथाश्रुत अर्थों का मोह त्याग देना चाहिए। क्योंकि शब्दों के अर्थों की कोई सीमा नहीं होती। शब्दों को वक्ता के भाव समुद्र को ढोना पड़ता है। वक्ता के तात्पर्यानुसार सब शब्दों को सब अर्थों का वाचक हो जाना पड़ता है। भाव का वाहन बनना ही शब्दों का एकमात्र काम है। भाव के वाहक होने के अतिरिक्त शब्दों का और कोई स्वरूप नहीं है। शब्दों को वक्ता के भाव का अनुगमन करना ही पड़ता है। भाव शब्दों के अधीन नहीं होता। शब्दों को ही भाव के अधीन रहना पड़ता है। यही वह दृष्टिकोण है जिसको आधार बनाकर तमाम क़िस्म के विचारों को पढ़ा जाना चाहिए।

इन दिनों ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो गांधी की प्रशंसा कर रहे हैं, गांधी के विचार बोल रहे हैं लेकिन गांधी से कोई लेना देना नहीं है।

सवाल यह है कि बोलने वाले की मंशा क्या है ॽ

राजनीति क्या है ॽ यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से प्रत्येक विचार और उसके बोलने वाले के रिश्ते की परख करनी चाहिए। वक्ता के तात्पर्यानुसार सब शब्दों को सब अर्थों का वाचक हो जाना पड़ता है। भाव के वाहक होने के अतिरिक्त शब्दों का और कोई स्वरूप नहीं है। कोई वैचारिक फंडामेंटलिस्ट या धार्मिक फंडामेंटलिस्ट जब गांधी के विचारों को व्यक्त करता है तो वह असल में गांधी को नहीं अपने भावों को व्यक्त करता है। गांधी के शब्द या विचार मूलतः बोलने वाले के अधीन हैं। वे गांधी के नहीं उसके विचार हैं। शब्दों को वक्ता के भावों का अनुगमन करना पड़ता है। भाव शब्दों के अधीन नहीं होता। शब्दों को ही वक्ता के भाव का अनुगमन करना पड़ता है। पहले भाव की मंशा निश्चित हो जाती है फिर शब्दों से उस भाव को कहलाना पड़ता है। यही वह बुनियादी दृष्टिकोण है जिसके आधार पर हमें शब्द और भाव के अंतस्संबंध की व्याख्या करनी चाहिए। कुछ लोग हैं जो यह मानते हैं कि भाव तो शब्दों के अधीन हैं, वे यह मानते हैं शब्द जैसे कहते हैं भाव उसके अनुरूप ढ़ल जाते हैं। यह शब्दों को घसीटने का असफल प्रयास है। शब्दों के अनुरूप भाव ढूँढने के प्रयास अज्ञानी करते हैं। इस तरह का प्रयास करने वालों की दृष्टि के अंदर सत्य प्रवेश नहीं करता। मसलन् कोई व्यक्ति यदि गांधी, पटेल के विचारों को बोले या लिखे या कहे तो उससे न तो गांधी के सत्य को पाएँगे और न पटेल के सत्य को पाएँगे। गांधी-पटेल या मार्क्स के विचारों को पाने, उनमें निहित सत्य को समझने के लिए उसके अनुरूप भावबोध और राजनीतिक आचरण का होना ज़रूरी है।

गीता के प्रसंग में दूसरा बड़ा प्रसंग ‘ध्यान’ पदबंध को लेकर है।

‘ध्यान’ का अर्थ भी महत्वपूर्ण है। मसलन्, चोर के ध्यान करने और संत के ध्यान करने में ज़मीन-आसमान अंतर है। ध्यान किंतु दोनों कर रहे हैं। यही वजह है गीता में योगी को धीमान् और योगभ्रष्ट को श्रीमान् विशेषण से विभूषित किया गया है। आमतौर पर योगभ्रष्ट को ही लौकिक जीवन में योगी की पदवी से विभूषित किया गया है। लेकिन वास्तव में तो वे योगी नहीं हैं। योगी और योगभ्रष्ट दो अत्यन्त विरोधी मनोदशा हैं। इसलिए उनके लिए धीमान् और श्रीमान् पदबंध का प्रयोग किया गया है। योगी के जीवन में ‘धी’ ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसके विपरीत योगभ्रष्ट तो धीविहीन होता है। मदमत्तता, विषयलालसा अज्ञानमय जीवन ही उसकी धुरी हैं। अर्जुन के प्रश्न में योगभ्रष्ट का वर्णन आया है। अर्जुन और कृष्ण के बीच के संवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है दोनों का ज्ञान और चेतना के स्तर पर एक ही धरातल। इसमें एक समझाता है और दूसरा समझ लेता है। यानी वक्ता और श्रोता दोनों ज्ञान की समतल भूमि पर खड़े रहकर ही बातचीत या प्रश्नोत्तर करते हैं। एक में समझाने की शक्ति है दूसरे में समझने की शक्ति है।

कहने का आशय यह कि गीता को पढ़ते समय पंडितों और टीकाओं के बताए अर्थ के आधार पर नहीं समझना चाहिए बल्कि पाठक को अपने अंदर अर्जुन की तरह समझने की शक्ति विकसित करके पढ़ना चाहिए। टीका के अधीन गीता पढ़ने का अर्थ है गीताबोध से वंचित रहना।

एक अन्य मिथ है जिससे बचना होगा। आमतौर पर यह कहते हैं कि गीता ऐसा कहती है इसलिए यह सत्य है। इस मिथ को तोड़ने या इस मनोदशा से निकलने की ज़रूरत है। गीता को सत्य की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। इस क्रम में यह समझ साफ रहे कि गीता सत्य की जन्मदात्री नहीं है। इसके विपरीत सत्य ने गीता को जन्म दिया है। सत्य प्रत्येक मनुष्य की निजी संपत्ति है। प्रत्येक मनुष्य सत्य दर्शन का अधिकारी है। प्रत्येक मनुष्य की जिह्वा कड़वे और मीठे रस को पहचानने में समर्थ है। रस चखने की अवस्था ही रसना की सजीव अवस्था है। जो मनुष्य हृदय विषयसुख भोगने में समर्थ है वही हृदय ब्रह्मसुखास्वादन में भी समर्थ होता है। इस नज़रिए से देखें तो मनुष्यमात्र ब्रह्मज्ञान का अधिकार और योग्यता रखता है।

ब्रह्मज्ञानी कोई ऊँचा पद नहीं है, बल्कि वह तो साधारण मनुष्य की ज्ञान संपदा है। इसलिए अपने को अज्ञानी नहीं मानना चाहिए। मनुष्य को अज्ञानी नहीं मानना चाहिए। गीता को हृदयंगम करने के लिए इनके प्रति श्रद्धा, सामर्थ्य आदि पैदा करनी होगी, सिर्फ़ गीता का पाठ करने से उसके मर्म को हृदयंगम करना संभव नहीं है। ऐसी अवस्था में गीता का पाठ निरर्थक हो जाएगा।

वैचारिक फंडामेंटलिज्म (ideological fundamentalism) मानवीय भावबोध को नष्ट कर देता है और अनुगामी मात्र बनाता है, वह मनुष्य के विवेक, ज्ञान, सामर्थ्य को अस्वीकार करता है। इस मनोदशा और नज़रिए से लड़ने में गीता का पुनर्पाठ आज के दौर में बेहद ज़रूरी है।

गीता पर स्वाधीनता संग्राम के दौरान अनेक नेताओं और बुद्धिवादियों ने विचार किया है। इनमें हिंदी समाज के प्रमुख बुद्धिवादी विद्वान रामावतार शास्त्री का नाम ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है। उनकी हिंदी क्षेत्र में विवेकवाद और वैज्ञानिकचेतना के प्रचार-प्रसार में अग्रणी भूमिका थी। उनका लिखा ग्रंथ ‘गीता परिशीलन’ क्रांतिकारी भाष्य है। यह किताब सबसे पहले मथुरा में ही 18 साल की उम्र में पढ़ने को मिली। यह ग्रंथ 1938 में पुणे से प्रकाशित हुआ।

इससे पहले महात्मा गांधी का गीता पर लिखा सन् 1930 में सामने आ चुका था। शास्त्रीजी ‘बुद्धि सेवाश्रम’ नामक संस्था रतनगढ़, बिजनौर में चलाते थे। ‘गीता परिशीलन’ की भूमिका में रामावतार शास्त्री ने लिखा ‘भाव का वाहन बनना ही शब्दों का एकमात्र काम है। भाव के वाहक होने के अतिरिक्त शब्दों का और कोई स्वरूप नहीं है। शब्दों को वक्ता के भाव का अनुगमन करना ही पड़ता है। पहले भाव निश्चित हो जाते हैं फिर शब्दों से उस भाव को शब्दों के पीछे घसीटने का व्यर्थ प्रयत्न करते हैं। जैसे शब्द देखते हैं वैसे ही भाव ढूँढने का अज्ञानयुक्त उद्यम करते हैं। परन्तु ऐसा करने से सत्य उनकी दृष्टि से बाहर खड़ा रह जाता है।’ यही वो परिप्रेक्ष्य है जिसके आधार पर गीता के नए क्रांतिकारी भाष्य को रामावतार शास्त्री ने लिखा। वे शब्दार्थवादी व्याख्या के बाहर जाकर नए नज़रिए से देखते हैं।

गीता का पाठक गीता पर निर्भर रहने वाला मनुष्य नहीं है। वह स्वतंत्रचेतना से लैस मनुष्य है।

रामावतार शास्त्री का मानना है सत्य को गीता की कसौटी पर न कसा जाय। बल्कि सत्य की कसौटी पर गीता को कसा जाय। यह नजरिया उनके मूल्यांकन को गांधी और अन्य नेताओं के मूल्यांकन से अलग करता है। हमारे यहाँ गीता के महापुरूषों के बताए अर्थ या भाष्य को मानने या उनका अनुसरण करने की सुदीर्घ परंपरा है। इसने ख़ास क़िस्म के आस्थावाद को जन्म दिया। टीका के अंधानुगामी पैदा किए।

रामावतार शास्री ने लिखा जिस तरह कोई महापुरुष गीता का अर्थ बता सकते हैं, उसी तरह आप भी अर्थ बता सकते हैं। महापुरुष के बताए अर्थ को मानने का मतलब है टीका का अनुगामी बन जाना। जब महापुरुष अपने मन के अनुरुप गीता का अर्थ निकाल सकते हैं तो आप क्यों नहीं ॽ यदि हम गीता में अपने मन के सत्य की प्रतिध्वनि न पाएँ तो हममें गीता को ज्ञान ग्रन्थ के रूप में अस्वीकार करने का सत्साहस होना चाहिए। ऐसी दृढ़ता और आलोचनात्मक विवेक के साथ ही गीता का पुनर्पाठ संभव है। ज्योंही पाठक इस आधार पर गीता को पढ़ेंगे तो गीता के अंधानुगमन से बच जाएँगे।

वैचारिक फंडामेंटलिस्ट परंपरागत अंधानुगमन, संस्कारों और रूढ़ियों का अपने जनाधार के विस्तार के लिए इस्तेमाल करता है। इस प्रक्रिया को चुनौती देने के लिए हमें गीता के पाठ को अपने मन के अनुसार व्याख्यायित करने की आदत या संस्कार पैदा करने की ज़रूरत है। इस पद्धति को समझने के लिए ही पुराने लोगों ने अर्थ निकालने के लिए एक पद्धति बनायी है।

रामावतार शास्त्री ने पाठ को पढ़ने की इस पुरानी पद्धति का अपनी किताब में इस्तेमाल किया। इसमें (1)मूल श्लोक रहता है, (2)संधिरहित पदच्छेदसहित संस्कृत में अन्वय रहता है, (3) हिन्दी भाषा में श्लोकार्थ रहता है, (4)तथा श्लोकों का भाव रहता है।

इसके अलावा अनेक विद्वान हैं जो अंत में भाष्यकार के रूप में स्वतंत्र रूप में भाष्य लिखते हैं। यही वह लोकतांत्रिक पद्धति है जिसमें पाठक की स्वतंत्र भाव ग्रहण क्षमता और स्वतंत्रता बनी रहती है। श्लोक के सम्बन्ध में भाष्यकार का विचार भावार्थ के रूप में पृथक् रखा जाता है जिससे पाठक की विवेक बुद्धि के सामने परीक्षण के लिए पाठ पूरी तरह खुला रहे। अन्वय और श्लोकार्थ में आमतौर पर मूल भाव को अक्षुण्ण बनाए रखा जाता है। जबकि भाष्य में भाष्यकार अपने भिन्न अर्थ की व्याख्या या विश्लेषण पेश करता है। संस्कृत में अन्वय और श्लोकार्थ में यदि कहीं विशेष अर्थ निकलता है तो उसे कोष्ठक में रख दिया जाता है।

आलोचना की यह पद्धति लोकतांत्रिक, पारदर्शी और स्वतंत्रता को बरकरार रखती है।

गीता के अन्वय और श्लोकार्थ को संपूर्ण रूप से अप्रभावित तथा सर्वमान्य अर्थ का बोधक बनाने का पूरा-पूरा प्रयत्न इसलिए किया गया है कि जिससे गीता के अभिप्रेत सत्य का दृष्टिकोण किसी देश, समाज या सम्प्रदाय की संकुचित सीमा का बन्दी न बन जाय।

ईश्वर को पाने के लिए कई जन्म लेने पड़ते हैं, एक ही जन्म में ईश्वर को पाना संभव नहीं है। इसलिए वे लोग ईश्वर को अज्ञेय, अज्ञात, अवर्णनीय आदि कहते हैं। रामावतार शास्त्री ने लिखा ‘इन लोगों को मुक्ति का कोई निश्चित समय ज्ञात नहीं है।’ इस तरह के तर्कों ने ईश्वर प्राप्ति को उत्साहहीन और निराशाजनक कर्म बना डाला।

असल में ईश्वर प्राप्ति पदबंध के कारण ही निराशा शब्द का जन्म हुआ। कहने का आशय यह कि ईश्वर प्राप्ति की ओर भागने की बजाय स्वतंत्रता की ओर भागो तो निराशा-अवसाद का सामना नहीं करना पड़ेगा। भारत में निराशा और अवसाद के बादल इसलिए हैं क्योंकि समाज में ईश्वर पाने की होड़ लगी है, उसे पाने के हजारों साधनों की समाज में बाढ़ आई हुई है, साधनों की बाढ़ ने ईश्वर पाने और विषयाशक्ति की बाढ़ पैदा कर दी है।

यह नया आध्यात्मिक उपभोक्ता है। जिसके पास अनेक साधन हैं, वस्तुओं के अम्बार लगे हैं। उसे न तो ईश्वर की चिंता है और अध्यात्म की, उसे तो धर्म के प्रदर्शन और सुख-सुविधा की चिन्ता है। इसके कारण मध्यवर्ग का यह हिस्सा लोकतंत्र के विकास में बड़ी समस्या बनकर खड़ा हो गया। इसकी अचेतनता और प्रतिगामिता के कारण वैज्ञानिक समाज का निर्माण नहीं हो पाया। हाँ, अध्यात्मवाद का समूचे देश में विशाल तंत्र जरुर खड़ा हो गया। आज लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए इसी तंत्र से सबसे बड़ी वैचारिक-सामाजिक चुनौती मिल रही है। यही वर्ग अध्यात्मवादी, फंडामेंटलिस्ट और फासिस्ट संगठनों का सक्रिय जनाधार है। इसने धार्मिक विभाजन, पहचान, उन्माद के साथ मुसलमानों के प्रति नफरत को जन्म दिया है। दूसरी ओर समाज में व्यापक स्तर पर आत्महत्या, सामाजिक हिंसा, निराशा और अवसाद फैला है।

यह सवाल उठा कि गीता की रचना किस उद्देश्य की गयी ॽ

रामावतार शास्त्री ने लिखा है ‘श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अनासक्त होकर कर्म करने का उपदेश दिया था। महाभारतकार ने श्रीकृष्ण के इसी उपदेश को आधार बनाकर, ज्ञान की स्थिति का विशद वर्णन करने के लिये, समग्र मानव समाज के कर्त्तव्यशास्त्र के रूप में ‘गीता’ का निर्माण किया है। उनका अभिप्राय मनुष्य को यह समझाना है कि यह समग्र संसार ‘संग्राम क्षेत्र’ है। जो कर्म मनुष्य मात्र को अनिवार्य रूप से करना पड़ रहा है वह कर्म ही ‘मनुष्य जीवन में लड़ा जाने वाला संग्राम है’। इस ‘संग्राम’ से निवृत्त रहना किसी के भी वश में नहीं है। प्रत्येक मनुष्य इस संग्राम को लड़ने के लिये विवश है। जो संग्राम मनुष्य को विवश होकर भी लड़ना ही पड़ेगा, मनुष्य उस कर्म नाम के अनिवार्य संग्राम को ज्ञान की स्थिति में रहकर करे,यही ‘सफल जीवन’ की अवस्था है। इसी को सुखदुःखातीत ब्रह्मानन्द या अनाशक्त स्थिति कहा जाता है। गीता में अर्जुन को द्वार बनाकर संपूर्ण मानव समाज को, कर्त्तव्य पालन कराने वाली ज्ञानमयी स्थिति से परिचित कराया गया है। यही गीतोपदेश का अभिप्राय है।’

महात्मा गांधी ने लिखा ‘गीता सूत्र-ग्रन्थ नहीं है। गीता एक महान धर्मकाव्य है। उसमें जितना गहरे उतरिए उतना ही उसमें से नये और सुंदर अर्थ लीजिए। गीता जन समाज के लिए है, उसमें एक ही बात अनेक प्रकार से कह दी गई है। इसलिए गीता के महाशब्दों का अर्थ युग-युग में बदलता और विस्तृत होता रहेगा।’

‘गीता में ज्ञान की महिमा सुरक्षित है। तथापि गीता बुद्धिगम्य नहीं है। वह हृदयगम्य है इसलिए वह अश्रद्धालु के लिए नहीं है। ’गीता ने ‘अनाशक्ति’ को ही सच्चा सुख माना है। इसके विपरीत ‘आसक्ति’ की गंभीर आलोचना पेश की है।

रामावतार शास्त्री ने लिखा ‘गीता में जिस कर्मफल के सिद्धांत, स्थित प्रज्ञता, ब्राह्मी स्थिति, गुणातीत स्थिति, भक्ति, योगारूढ स्थिति आदि का जो उज्ज्वल वर्णन किया गया है, वह सब निरर्थक वाग्जाल है। तब इसका यह स्पष्ट अभिप्राय मानना पड़ेगा, कि गीता पाठक इन सब उज्ज्वल स्थितियों को अप्राप्तव्य माने, और जब तक जीवन है, तब तक शरीर की विद्यमानतारूपी अपराध के कारण अपने को बन्धन दशा में समझे, और मुक्ति पाने के लिए अन्तहीन प्रयत्न करने वाला शोकातुर, मृत्यु से भयभीत बना रहकर स्वजनादियों के बन्धन में फंसा पड़ा रहे। कोई भी विचारशील मनुष्य इस प्रकार की निराशाभरी बातों को, अध्यात्म मार्ग में अनुत्साहित करने वाली और अज्ञान की स्थिति का समर्थन करने वाली मानकर अज्ञान कहना पडेगा।’

रामावतार शास्त्री ने गीता का भाष्य रचते हुए अनेक बातें कही हैं जो काम की हैं, जैसे, ‘नरक’ और ’स्वर्ग’ की अवधारणा को ही लें, शास्त्रीजी के अनुसार ‘नरक’ माने ‘अज्ञान को अपनाए रहना’, ‘स्वर्ग’ माने जन्मबन्धनातीत, अनाशक्त निष्काम कर्म।

यह भी लिखा ‘मृत्यु के पश्चात् जिस स्वर्ग, नरक और मुक्ति मिलने की बात कही जाती है, वह सब अज्ञानियों की कल्पना है।’

गीता के ज्ञान की मुश्किल यह है कि वहाँ श्रद्धा और अनुभव पर इस क़दर ज़ोर है कि ‘शंका’ या ‘संदेह’ प्रकट करके सवाल करने की कोई संभावनाएँ ही नहीं हैं।

‘भक्ति’ और ‘श्रद्धा’ के नज़रिए में समूचा गीतादर्शन बंधा है, जिसकी तीखी आलोचना की जानी चाहिए। जहाँ से अज्ञान का आरंभ होता है। ‘संदेह’ या ‘शंका’ करना दर्शन के विकास का पहला नियम है, इसके बिना दर्शन का विकास नहीं होता। श्रद्धा और ज्ञान को यदि आलोचनात्मक विवेक के दायरे के बाहर ले जाएँगे तो समाज में आलोचनात्मक विवेक के विकास का माहौल ही पैदा नहीं होगा।

इसके अलावा पुनर्जन्म जैसी कोई चीज़ नहीं होती। पुनर्जन्म की धारणा वस्तुतः समस्त परंपरागत व्याधियों की प्रमुख जड़ों में से एक है। पुनर्जन्म की धारणा से मुक्ति पाए बिना ज्ञान और भक्ति के संकुचित दायरों से मुक्ति संभव नहीं है। इसी तरह मृत्यु के बाद मोक्ष की अवधारणा एकदम निरर्थक है। परंपरावादी ‘पुनर्जन्म’ को ‘आशा’ और ‘न्याय का दिन’ के रूप में पेश करते हैं।

रामावतार शास्त्री ने ‘पुनर्जन्म’ की धारणा की आलोचना करते हुए लिखा, ‘मनुष्य के मन की यदि कोई अमूल्य निधि है, तो वह ‘शान्ति’ है। शान्ति को छीननेवाली किसी कल्पना को मानना, मनुष्य का अज्ञान है। पुनर्जन्मवाद, सर्वप्रलय के दिन न्याय की आशा या मरणोत्तर मिलनेवाली मुक्ति की कल्पना, मनुष्य से इस शान्ति को छीनकर, उसे अशान्त बना देती है। मनुष्य के मन से शान्ति हटाने वाली इस असंभव तथा अस्वाभाविक कल्पना को भोगासक्ति का दुष्टजाल कहना अनुचित नहीं है।’

गीता का सबसे मूल्यवान् पक्ष क्या है?

रामावतार शास्त्री ने रेखांकित किया कि गीता ने ‘प्रचलित कुविश्वासों की उपेक्षा की है, और केवल मनुष्य की ज्ञानमयी स्थिति का वर्णन किया है।’ गीता का सबसे मूल्यवान् पक्ष है कि ज्ञान से किसी भी मनुष्य को, किसी भी कारण से, वंचित नहीं किया जा सकता।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

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