मकर संक्रांति : पूर्वी बंगाल के किसानों के लिए वास्तू पूजा का अवसर

मकर संक्रांति : पूर्वी बंगाल के किसानों के लिए वास्तू पूजा का अवसर

आज मकर संक्रांति (Makar Sankranti) है।

पूर्वी बंगाल के किसानों (East Bengal Farmers) के लिए यह वास्तू पूजा (Vastu Pooja) यानी पृथ्वी पूजा (Prithvi Pooja) का अवसर है। इस दिन चावल पीसकर आंगन में रोली सजाई जाती है और गाय बैलों को उसका टिका लगाया जाता है। कर्म कांड से इसका कोई मतलब नही है। बचपन में हमारी दादी चूल्हे पर टीन में पानी गर्म करके तड़के ही हम सबको नहला देती थी। तब माटी के घर होते थे। गोबर से घर आंगन लीपने के अलावा तड़के मां, ताई, चाची दरवाजे और आंगन में गोबर जल का छिड़काव करती थीं। इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है।

वास्तु पूजा के अलावा महामारी से बचने के लिए काली और शीतला की पूजा होती थी तो सर्पदंश से बचने के लिये मनसा की पूजा। लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा जरूर होती थी। गाजन में शिव को लेकर इट्सव होता था, जो किसानों के लोकदेवता (Lokadevata of farmers) थे।

कहीं पुरोहित या कर्मकांड का तांडव नहीं था। तराई में बसे शरणार्थी गावों में सिर्फ दिनेशपुर में दुर्गा पूजा सार्वजनिक होती थी।

तब 50, 60, 70 के दशक में गांव के लोग अशिक्षित थे, उनका कोई पाखण्ड, दिखावा या धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद (Theocratic nationalism) नहीं था।

पूर्वी बंगाल में किसानों की सारी जातियां अछूत थीं, क्योंकि वे बौद्ध बंगाल में हिंदुत्व राजकाज लागू होने के बाद हिन्दू अछूत बना दिये गए थे। इस अश्पृश्यता से बचने के लिए ही बड़े पैमाने पर बौद्ध किसानों ने इस्लाम अपनाया।

बंगाल के मुसलमान भी अछूतों की तरह बौद्ध थे, 11 वी सदी में पाल वंश के शासन के अंत तक। इसलिए बंगाल में वर्ण व्यवस्था कभी थी ही नहीं।

आज भी बंगाल में राजपूत या क्षत्रिय नहीं होते।

पश्चिम बंगाल में किसान जातियां (Peasant castes in West Bengal) महिष्व, कैवर्त, सद्गोप ओबीसी हैं, जैसे उत्तर भारत के जाट, यादव, कुर्मो वगैरह। किसान तो भूमिहार और त्यागी भी होते हैं।

Why are all the farmers of East Bengal untouchable?

यह समझने की बात है कि पूर्वी बंगाल के सारे किसान क्यों अछूत हैं और कैसे उन सभी को भारत विभाजन के बाद बंगाल के इतिहास भूगोल से बाहर निकालकर शरणार्थी और घुसपैठिया बना दिया गया।

मेरे पिता पुलिनबाबू बंगाल के इन्हीं अछूत किसानों के हक़ हक़ूक़ के लिए लड़ते रहे आजीवन।

मेरे पिता का मानना था कि अपनी जमीन से बेदखल हर शरणार्थी, विस्थापित दलित होता है, चाहे जन्म से उनकी जाति कुछ हो। वे हिन्दू, सिख, बौद्ध, पारसी, मुसलमान शरणार्थियों और विस्थापित आदिवासियों में कोई फर्क नहीं करते थे।

तराई में उन्होंने अपनी जाति के लोगों के साथ गावँ नहीं बसाया। मेरी मां के नाम बसे गावँ में पूर्वी बगल के तेभागा आंदोलन के साथी बसे और उनमें हमारी जाति के सिर्फ पांच परिवार थे। पूरा गावँ और पूरा इलाका, पूरी तराई और पहाड़ तक फैला था मेरा गावँ, जहां मुझे हमेशा बेइंतहा प्यार मिलता रहा। इसमें जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राजनीति से कभी कोई फर्क नहीं पड़ा।

मेरे गावँ बसंतीपुर में आज वास्तु पूजा है।

पलाश विश्वास

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