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भारत में मत्स्य न्याय आ रहा है

Matsya Nyaya is coming in India

हमारे प्राचीन विचारकों का मानना था कि समाज में सबसे खराब स्थिति अराजकता ( lawlessness ) की स्थिति है। जब कानून का शासन ढह जाता है, तो मत्स्य न्याय का आविर्भाव हो जाता है, जिसका अर्थ है जंगल का कानून। संस्कृत में मत्स्यशब्द का अर्थ मछली होता है, और मत्स्य न्याय का अर्थ होता है जब बड़ी मछली छोटी को खा जाती है।

हमारे सभी प्राचीन विचारकों ने मत्स्य न्याय की कठोर निंदा की है

( पी वी काणे की ‘धर्मशास्त्रों का इतिहास’खंड ३ पृष्ठ २१ देखें)।

 मत्स्य न्याय का यह विचार (बड़ी मछलियों का छोटी मछलियों को खा जाना, या कमजोरों पर मज़बूतों का हावी हो जाना) अक्सर कौटिल्य, महाभारत और अन्य ग्रंथों में वर्णित है । इसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण (अध्याय ११,१.६.२४) में भी है, जहाँ यह कहा गया है कि “जब भी सूखा पड़ता है, तब ताकतवर कमजोर पर कब्जा कर लेता है, क्योंकि पानी कानून है” अर्थात बारिश के अभाव से कानून का शासन समाप्त हो जाता है, और मत्स्य न्याय का संचालन शुरू हो जाता है।

कौटिल्य कहते हैं, “यदि दंड को नियोजित नहीं किया जाता है, तो यह मत्स्य न्याय की स्थिति को जन्म देता है, क्योंकि एक कानून के पालक की अनुपस्थिति में मजबूत कमजोर को खा जाता है”। एक राजा की अनुपस्थिति में ( अराजक )या जब सजा का कोई भय नहीं होता है तो मत्स्य न्याय की स्थिति पैदा हो जाती है ( देखिये रामायण अध्याय ६७ महाभारत का शांतिपर्व अध्याय १५, १६, ३० और ६७ कामन्दक अध्याय 40, मत्स्यपुराण (225.9), मानस उल्लास (2.20.1295), आदि ) I

इस प्रकार महाभारत के शांतिपर्व में कहा गया है :

“राजा चेन्न भवेद्लोके पृथिव्यां दण्डधारकः शूले मत्स्या निवापक्षयं दुर्बलात बलवत्तराः “

अर्थात

“जब दंड की छड़ी लिए राजा पृथ्वी की रक्षा नहीं करता है, तो मजबूत व्यक्ति कमजोर लोगों को नष्ट कर देते हैं, ठीक उसी तरह जैसे पानी में बड़ी मछलियां छोटी मछलियों को खा जाती हैं”।

महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा कि अराजकता से बुरा संसार में कुछ भी नहीं है, क्योंकि मत्स्य न्याय की स्थिति में कोई भी सुरक्षित नहीं हैI बुरे कर्ता को भी जल्दी या बाद में अन्य बुरे कर्ता निगल जाएंगेI

हालिया चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा बताती है कि मत्स्य न्याय भारत में आ रहा है, और इसका पहला कदम पश्चिम बंगाल में शुरू हो गया हैI

जस्टिस मार्कंडेय काटजू

(लेखक सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश हैं )

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