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मीर तक़ी ‘मीर’ और आत्मकथा लेखन की चुनौतियां

Mir Taqi ‘Mir’ and the Challenges of Writing Autobiography

इन दिनों आत्मकथा पर बहुत बातें हो रही हैं,लेखक-लेखिकाएं आत्मकथा लिखने में व्यस्त हैं, आत्मकथा की परंपरा और विधागत संस्कारों को अधिकतर आत्मकथा लेखक जानते ही नहीं हैं, उनके आत्मकथा लेखन में निजी जीवन इस कदर छाया हुआ है कि आपको लेखक का समकालीन समाज और इतिहास नजर ही नहीं आएगा। आत्म में एकदम लीन होकर लिखी गयी आत्मकथाएं वस्तुतः आत्म का छद्म निर्मित करती हैं, इस तरह की आत्मकथाएं न तो लेखक पर रोशनी डालती हैं और न समाज पर ही रोशनी डाल पाती हैं। लेखक अपने घर-परिवार की चौहद्दी में इस कदर मशगूल नजर आता है कि उसमें प्रेरणा लायक बहुत कम अंश नजर आते हैं।

आत्मकथा का स्व और समाज से क्या संबंध है?

आत्मकथा का स्व और समाज से द्वंद्वात्मक संबंध है, इस संबंध का स्व के साथ ऐतिहासिक रिश्ता है जिसे आजकल के लेखक देखना पसंद नहीं करते। इसके चलते आत्मकथा महज आत्म प्रपंच और आत्मश्लाघा है।

मीर तक़ी ‘मीर’ की आत्मकथा ´जिक्रे-मीर’ क्यों महत्वपूर्ण है ?

हिन्दी के मध्यकालीन उर्दू कवियों में आत्मकथा लेखन की परंपरा के अनेक प्रमाण नजरों से गुजरे हैं, इनमें मीर तक़ी ‘मीर’ की आत्मकथा ´जिक्रे-मीर’ का नाम खासतौर पर उल्लेखनीय है। व्यक्ति, परिवार, समाज, राजसत्ता आदि के अन्तर्विरोधों और संघर्षों का इसमें विशद विवेचन मिलता है। यह आत्मकथा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें उत्तर भारत के मुगलकालीन पतन के दौर में मराठों, जाटों, अंग्रेजों, पठानों के संघर्षो का अछूता पक्ष सामने आता है, साथ ही मुहम्मद शाह की मृत्यु से लेकर गुलाम कादिर रुहेला के अत्याचारों की दास्तां बयां की गयी है। इसमें मीर के जीवन के तमाम अनछुए पहलू भी सामने आते हैं।

मीर की आत्मकथा से सीखें हम कैसे आत्मकथा लिखें

मेरे ख्याल से आत्मकथा विमर्श में मीर की आत्मकथा हम सबकी मदद कर सकती है, हम कैसे आत्मकथा लिखें, हम यह सीख सकते हैं।

मीर मुहम्मद तक़ी ‘मीर’ का जीवन

मीर मुहम्मद तक़ी ‘मीर’ (1709-1809) का उपनाम ‘मीर’ था। ठीक सौ साल जिन्दा रहे। आगरे में 1709 में पैदा हुए और 1809 में लखनऊ में मौत हुई। इस दौरान तकरीबन 65साल दिल्ली में रहे। बेहद स्वाभिमानी, निस्वार्थी और सहिष्णु शायर के रूप में मशहूर थे। भयानक गरीबी में जिंदगी गुजारी लेकिन किसी के सामने हाथ नहीं पसारा। उर्दू कविता में नई भाषा, नए विषय और नई शैलियों को जन्म देने वाले इस महान शायर का लोहा गालिब और जौक भी मानते थे।

    रेख़तां के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो गालिब।

    कहते हैं अगले जमानेमें कोई ’मीर’ भी था।

‘मीर’ के स्वभाव की तीन बड़ी कमजोरियां थी, पहली वे तुनकमिज़ाज़ थे, दूसरे रूखे स्वभाव के थे और तीसरे दुनियादारी से अनभिज्ञ थे। दूसरों की प्रशंसा करने में कंजूसी से काम लेते थे। जरा-जरा सी बात पर उनके दिल को ठेस लग जाती थी। जो दिल में आता वैसा ही कह देते थे। इसके कारण उनकी तकलीफें और बढ़ गयीं।

एक दिलचस्प किस्सा है।

जब दिल्ली से लखनऊ को प्रस्थान किया तो उनके पास बैलगाड़ी का भाड़ा नहीं था। अतः एक यात्री को साझीदार बनाकर यात्रा आरंभ की। रास्ते में यात्री ने बात करने की कोशिश की तो ‘मीर’ साहब ने जवाब नहीं दिया और मुँह फेरकर बैठ गए। कुछ देर बाद उस यात्री ने फिर बात करने की कोशिश की तो ‘मीर’ साहब ने पलटकर तेवर के साथ कहा “बेशक,आपने किराया दिया है। आप गाड़ी में शौक़ से बैठे चलें, मगर बातों से क्या ताल्लुक ?”

यात्री ने कहा -“हजरत, क्या मुज़ाइक़ा है ? रास्तेमें  बातों से जी बहलता है।”

मीर साहब बिगड़कर बोले- “जी, आपका तो जी बहलता है, मगर मेरी ज़बान खराब होती है।”

जगदीश्वर चतुर्वेदी

Jagadishwar Chaturvedi जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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