प्रवासी मजदूरों के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध : असंवेदनशीलता को कृपा मनवाने का अहंकार

PM Modi Speech On Coronavirus

हरेक आपदा कोई न कोई सबक जरूर देती है। कोविड-19 महामारी का एक बड़ा सबक (A big lesson of the COVID-19 epidemic) यह भी है कि मजदूरों और खासतौर पर शहरों के प्रवासी मजदूरों के प्रति मोदी सरकार की संवेदनहीनता (Modi government’s insensitivity towards migrant laborers) का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ एक चीज कर सकती है। और यह है इस सरकार का इसका गुमान कि वह कोई भी झूठ, कितना भी बड़ा झूठ, जनता से सच मनवा सकती है। इसलिए, आफत सिर्फ यही नहीं है कि यह सरकार स्वभावत: मजदूर-विरोधी और वास्तव में मेहनतकश खेतिहरों समेत सभी मेहनतकशों की शत्रु है। कोढ़ में खाज यह कि उसे इसका पक्का यकीन है कि वह, जाहिर है कि सभी संवैधानिक संस्थाओं से लेकर, मीडिया तथा हर तरह की सरकारी-निजी संस्थाओं तक के ऊपर अपने अभूतपूर्व नियंत्रण के बल पर और अपने अतुलनीय आर्थिक व सांगठनिक संसाधनों के बल पर, बहुसंख्यक जनता से कुछ भी मनवा सकती है। यानी उसके मजदूरविरोधी स्वभाव पर चुनाव आधारित व्यवस्था समेत, किसी भी संस्था का कोई अंकुश कम से कम फिलहाल तो नहीं ही है।

प्रवासी मजदूरों की ‘‘घर वापसी’’ के लिए ‘श्रमिक ट्रेनों’ के प्रसंग में देखने को मिला इस सरकार का रुख, इसी का जीता-जागता उदाहरण है।

देशव्यापी लॉकडॉउन के पहले विस्तार के आखिर तक आते-आते, जब यह साफ हो गया कि 40 दिन के ‘‘लॉकडॉउन’’ से कोरोना संक्रमण रुकना तो दूर, उसका जोर थमने तक नहीं जा रहा था और कुछ ढीलों के साथ लॉकडॉउन को और आगे बढ़ाना जरूरी होगा, तब मोदी सरकार को किसी भी तरह से अपने गांव/घर जाने के लिए छटपटा रहे, प्रवासी मजदूरों का ध्यान आया।

लॉकडॉउन की शुरूआत से लेकर, उसके पहले विस्तार तक का अनुभव बता रहा था कि लॉकडॉउन के और विस्तार में, इन मजदूरों को अपने घरों से दूर रोककर रखना बहुत मुश्किल होगा।

लॉकडॉउन के पांच हफ्ते से ज्यादा के दौरान लगातार इसकी हैरान करने वाली और कई बार दिल-दहला देने वाली खबरें मीडिया की सारी मुश्कें कसे जाने के बावजूद आती रही थीं कि देश भर में दसियों हजार की संख्या में प्रवासी मजदूर, अपनी सारी गृहस्थी सिर पर उठाए, अपने घरों के लिए सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर, अक्सर पैदल ही और खुशनसीब हुए तो साइकिल, साइकिल ठेल वगैरह से ही या फिर टैंकरों, ट्रकों यहां तक कि मिक्सरों तक में छिप-छिपाकर, निकल पड़े थे।

इनमें कामयाबी के साथ घर पहुंच जाने वालों की खबरें उतनी नहीं थीं, जितनी पुलिस द्वारा पकड़कर बीच रास्ते में क्वारेंटीन के नाम पर सुविधाहीन अनौपचारिक जेलों में डाले जाने वालों की और कई मामलों में तो भूख, प्यास, थकान से रास्ते में ही मर-खप जाने वालों की थी।

फिर भी यह सिलसिला लगातार जारी रहा था और लगभग सभी महानगरों से ही नहीं मामूली शहरों से भी पलायन जारी था, क्योंकि मजदूरों का कहना था कि ‘जब मरना ही है तो परदेस में काम के बिना भूखे-प्यासे मरने से अच्छा है, अपने घर जाकर मरें’ और यह भी कि ‘कोरोना तो बाद में मारेगा, लॉकडॉउन में भूख से पहले ही मर जाएंगे।’ फिर भी, दिल्ली में बैठकर इस विशाल महादेश के लिए सख्त फैसले लेने का गरूर पालने वाले शायद इस सब को तो अनदेखा करते भी रहते पर, मुंबई में बांद्रा से लेकर, सूरत तक में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के ‘‘घर जाने’’ की एकमात्र मांग के साथ सडक़ों पर उतरने ने, इस मांग को और अनदेखा करना मुश्किल कर दिया था।

इसके अलावा, लॉकडॉउन की सारी सख्तियों के बावजूद और सारे ताली-थाली बजाने तथा दीया-मोमबत्ती जलाने के बावजूद, कोरोना की आफत का अभी लंबा चलना तय दिखाई देने से, कोचिंग उद्योग के केंद्र राजस्थान के कोटा शहर में फंसे लाखों मध्यवर्गीय व संपन्नतर परिवारों के बच्चों से लेकर, दूसरे देशों में फंसे भारतीयों तक को ‘‘घर लाने’’ की मांग जोर पकड़ रही थी, जिसे सुनना उसी तरह मौजूदा शासकों के स्वभाव का हिस्सा था, जैसे करोड़ों प्रवासी मजदूरों की उसी मांग को नहीं सुनना।

आप पहले क्रोनोलॉजी लीजिए।

पहले, केंद्र सरकार की मूक सहमति से और जाहिर है कि राजस्थान सरकार के कोंचने से, सैकड़ों की संख्या में बसों से, कोटा में फंसे बच्चों को उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, असम व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों आदि-आदि द्वारा बसों से निकाला जाता है। उसके बाद, प्रवासी मजदूरों के लिए भी ऐसा ही किए जाने की सुनगुन शुरू होती है। और लॉकडॉउन के ताजातरीन विस्तार की घोषणा की पूर्व-संध्या में बाकायदा इसका एलान कर दिया जाता है कि लॉकडॉउन के चलते दूसरे राज्यों में फंसे मजदूरों, तीर्थयात्रियों तथा पर्यटकों आदि को निकाला जाएगा।

चूंकि इस बार मामला मजदूरों का था जिनकी संख्या लाखों में होने वाली थी, रेलवे द्वारा श्रमिक ट्रेनों के नाम से विशेष ट्रेनें चलाने का भी एलान किया गया।

बहरहाल, जैसाकि मोदी राज के मजदूरविरोधी स्वभाव का तकाजा था, जिसमें कोरोना के खिलाफ ‘‘युद्ध’’ के सारे एलानों के बावजूद, रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा है, रेलवे और उसका संचालन करने वाली केंद्र सरकार, दोनों ही शुरू से इस संबंध में बिल्कुल स्पष्ट थे कि इन मजदूरों को, इस सफर का पूरा पैसा देना होगा।

1 मई को जारी रेलवे की विज्ञप्ति में यह स्पष्ट भी किया गया था कि यह किराया इस प्रकार होगा–मेल/एक्सप्रैस का स्लीपर का किराया+ 30 रु0 सुपर फास्ट चार्ज+ 20 रु0 अतिरिक्त शुल्क।

यानी हरेक यात्री से पूरे 50 रु0 अतिरिक्त वसूल किए जाने थे। इसके साथ ही 1 तथा 2 मई के अपने दिशा-निर्देशों में रेलवे ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि वह स्टेशनों पर टिकट मुहैया नहीं कराएगी। इन विशेष ट्रेनों के पाइंट टू पाइंट टिकट, रेलवे राज्यों को ही मुहैया कराएगी और राज्य ही संबंधित यात्रियों से टिकट का पैसा जमा इकट्ठा करेंगे और रेलवे को देंगे।

ऐसा भी नहीं है कि रेलवे तथा उसे चलाने वाली सरकार तक इसकी बढ़ती आवाज पहुंची ही नहीं हो कि ये मजदूर, जो करीब चालीस दिनों से रोजी-रोटी के साधनों से कटे हुए थे, इस यात्रा के लिए पैसा कहां से लाएंगे?

इंडियन एक्सप्रैस की 3 मई की एक रिपोर्ट में (‘‘माइग्रेंट्स पे टु रिटर्न होम, स्टेट्स ऑस्क सेंटर टु फुट द ट्रेन फेयर बिल’’) रेलवे बोर्ड के चेयरमैन का इस आशय का बयान मौजूद है कि ‘सरकार ने सोच-समझ कर यह तय किया था कि इन ट्रेनों को मुफ्त में नहीं चलाया जाए, ताकि उन्हें ही ले जाया जाए जो वाकई जाने के इच्छुक थे।’

उनके शब्द थे :

‘‘यह सेवा प्रवासी मजदूरों, छात्रों आदि के लिए ही है और उन्हें पूरी स्क्रीनिंग के बाद ही यात्रा करने दिया जाएगा। ये ट्रेनों आम लोगों के लिए नहीं हैं। इसलिए, हम बस नाम-मात्र का किराया ले रहे हैं।’’

यह दूसरी बात है कि यह नाम मात्र का किराया, जैसा हमने पहले ही बताया, सामान्य किराए से 50 रु0 ज्यादा था!

प्रसंगवश यह भी बता दें कि इसी समय पर कर्नाटक की भाजपा सरकार ने, आंध्र प्रदेश जा रहे प्रवासी मजदूरों को बस से ले जाने के लिए, सामान्य चार गुना किराए की मांग की थी, जिसकी गणना यात्री के किराए के साथ बगल की खाली रखी जाने वाली सीट का किराया और वापसी पर दोनों सीटें खाली आने का किराया जोड़कर, की गयी थी। जब इसका ज्यादा शोर मचा तो इस मांग को आधा कर दिया गया और वापसी का किराया छोड़ दिया गया।

इसी तरह गुजरात में कुछ जगहों से तीन-तीन, चार-चार हजार रु. प्रति यात्री के हिसाब से निजी बसों से प्रवासी मजदूरों के राज्य से बाहर निकलने की खबरें आयी हैं।

Epidemic is an excuse to make the laborers bonded.

बहरहाल, इस किराए के बोझ को बहुत ज्यादा पाकर, कुछ प्रवासी मजदूरों के पैदल ही यात्रा करने का तय करने, कई जगहों पर बहुत से मजदूरों के इसी वजह से अपने राज्यों में जा रही ट्रेनों में नहीं चढ़ पाने तथा बहुतों के घर से पैसे मंगवाकर जैसे-तैसे टिकट का इंतजाम करने की बढ़ती खबरों की पृष्ठभूमि में, जब एक ओर कांग्रेस पार्टी ने खुद सभी जरूरतमंद मजदूरों की ट्रेन टिकट के पैसे खुद देने का एलान किया तथा आरजेडी ने बिहार में मजदूरों की 50 ट्रेनें लाने का पैसा देने का एलान दिया और दूसरी ओर महाराष्ट्र जैसी राज्य सरकारों ने केंद्र से यह भार उठाने की मांग की तथा खुद सुब्रमण्यम स्वामी जैसे भाजपा नेताओं ने इस पर सवाल उठाना शुरू कर दिया कि ‘पीएम केयर्स’ के नाम से जो कोष ऐसी ही आपदा में सहायता देने के नाम पर, सरकार के सारे साधन लगाकर जमा किया जा रहा है, उसमें से यह खर्चा क्यों नहीं किया जा सकता है; तो सत्ताधारी भाजपा और सरकार को ख्याल आया कि इससे तो उसके लिए अच्छा संदेश नहीं जाएगा और उसके सुप्रीमो की सूट-बूट की सरकार की छवि, लोगों को फिर याद आ जाएगी।

बस फिर क्या था, मोदी सरकार और भाजपा के प्रवक्ता, सारे सरकारी दिशा-निर्देशों, मजदूरों को दी गयी टिकटों, रेलवे द्वारा राज्यों से लिए गए पैसे तथा पैसा न होने के चलते बहुत से मजदूरों के ट्रेन में नहीं चढ़ पाने जैसी ठोस सचाइयों के बावजूद, यह साबित करने में जुट गए कि मोदी सरकार की रेलवे की ओर से तो मजदूरों की यह यात्रा मुफ्त ही थी। राज्यों से सिर्फ 15 फीसद किराया देने की अपेक्षा की जा रही थी और यह पैसा भी रेलवे इन मजदूरों को खाना और पानी आदि देने पर ही खर्च करने जा रही थी।

वास्तव में यह तक कहा गया कि रेलवे ने बड़ी उदारता से यह तय किया था कि ये यात्री जितना पानी मांगें, उन्हें दिया जाए; एक बोतल की कोई पाबंदी नहीं रखी जाए!

प्रवक्ताओं ने यह साबित करने में पूरा जोर लगा दिया कि सामान्य से 50 रु0 अतिरिक्त किराया, वास्तव में रेलवे द्वारा 85 फीसद माफी दिए जाने के बाद का नाम मात्र का किराया है! यानी बिना योजना के लॉकडॉउन थोपने के तानाशाहीपूर्ण फैसले के जरिए दाने-दाने को मोहताज कर दिए गए मजदूरों के प्रति घोर असंवेदनशीलता ही नहीं, उसे मोदी सरकार की अतिरिक्त उदारता साबित करने की बेशर्मी भी।

कोरोना से युद्ध के नाम पर प्रवासी मजदूरों के खिलाफ मोदी सरकार का युद्ध | Modi government’s war against migrant laborers in the name of war from Corona
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

और कोरोना से युद्ध के नाम पर खासतौर पर प्रवासी मजदूरों के खिलाफ मोदी सरकार के युद्ध का अंत इतने पर भी नहीं होने वाला है। प्रवासी मजदूरों को ट्रेनों से घर वापसी की उम्मीद बंधाने के बाद, अपने दिशा-निर्देशों के स्पष्टीकरण मुहैया कराने के नाम पर मोदी सरकार, इस वादे से भी पीछा छुड़ाने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय गृह सचिव ने, 3 मई को राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर, यह स्पष्ट किया कि ट्रेन, बस आदि से परिवहन की सुविधा सिर्फ ऐसे मुसीबत के मारों के लिए है, ‘जो लॉकडॉउन से पहले अपनी काम करने की जगहों से चलना शुरू कर, बीच में फंस गए थे।’ इस निर्देश का ठीक-ठीक क्या आशय है, इस पर तो नौकरशाह माथापच्ची करते रहेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार चालीस दिन की लॉकडॉउन की कैद के बाद भी, प्रवासी मजदूरों को घर जाने देने के लिए तैयार नहीं है। इस बीच कर्नाटक सरकार ने राज्य से चलने वाली श्रमिक ट्रेनों को इस दलील से रद्द ही कर दिया बताते हैं कि राज्य में इन मजदूरों की जरूरत है! यह तब है जबकि सरकार, न इन मजदूरों की छूटी रोजी-रोटी की भरपाई करने के लिए कोई बोझ उठाने के लिए तैयार है और न इसी सचाई को समझने के लिए तैयार है कि इन गरीबों का शहरों में बिना सुविधाओं की तंग जगहों में कैद कर रखा जाना, कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिहाज से भी, उन्हें उनके गांव-घर पहुंचाए जाने के मुकाबले कहीं ज्यादा नुकसानदेह है। लगता है कि महामारी तो बहाना है, मकसद मजदूरों को बंधुआ बनाना है।

0 राजेंद्र शर्मा

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