गमछे से बाहर भी देख लीजिए सरकार, अपने में मस्त न रहिए, सरकार मजदूरों को आखिर इंसान कब समझेगी ?

Modi in Gamchha

केंद्र सरकार ने जब लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाने की घोषणा (Announcement to extend lockdown till 3 May) की तो देश के हजारों प्रवासी मजदूरों के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ गईं। दिल पहले से अधिक घबराने लगा कि अब वे किस तरह जिएंगे, क्या खाएंगे, कहां रहेंगे।

कहने को तो मोदीजी ने देश को सात सुझाव दिए (Modiji gave seven suggestions to the country) कि सब कुछ बंद रहने की स्थिति में क्या-क्या करें। इनमें एक बिंदु अपने मातहत काम करने वालों को न निकलने की अपील भी था। मोदीजी की अपील पर लोग बालकनी में आकर ताली बजा सकते हैं, दिए जला सकते हैं। अगर वे कहें कि सबको 10 मिनट तक एक पैर पर खड़ा रहना है, तो शायद इसके लिए भी तैयार हो जाएं। इसमें अपनी जेब से कुछ नहीं जाता और टाइमपास करने के लिए एक शगल मिल जाता है।

लेकिन जब अपने कर्मचारियों को बैठे-बिठाए, बिना काम के वेतन देने की बात हो, तो कितनी लोग उनकी अपील का मान रखते हैं, इसका परीक्षण भी उन्हें करा लेना चाहिए। शायद बालकनी से उतर कर जमीन की हकीकत से मोदीजी का सामना हो जाए।

वैसे इतने दिनों में अगर उन्होंने खबरों का विश्लेषण किया हो, तो उन्हें पता चल ही गया होगा कि इस देश की बड़ी आबादी के पास बालकनी तो दूर, रहने के लिए एक कमरा भी नहीं है।

सड़क किनारे तंबू गाड़ के या घास-फूस की झोपड़ी बनाकर रहने वाले या निर्माणाधीन भवनों के पास अस्थायी ठिकाने बनाकर रहने वाले बहुत सारे लोग हैं, जिनके पास न राशन कार्ड है, न आधार का अता-पता। ये निराधार लोग भी इसी भारत के हैं और उनका जीवनयापन रोज कमाने-खाने से होता है। इन लोगों की मेहनत के दम पर लाखों का मुनाफा कमाने वालों में शायद ही इतनी दरियादिली हो कि वे उन्हें बिना वेतन के रोज की मजदूरी दें, उनके रहने का इंतजाम करें या उनके मकान मालिकों तक किराया पहुंचा दें, ताकि उन्हें भी घर पर रहने की इस मौजूदा जरूरत से वंचित न रहना पड़ा। अपने नियोक्ताओं और सरकार, प्रशासन की तंगदिली के कारण ही हजारों मजदूरों को जान जोखिम में डालकर घर जाने की जल्दी है।

इसका एक उदाहरण देश ने 28 मार्च के दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर देखा था। तब की तस्वीरों ने संवेदनशील समाज (Sensitive society) को विचलित किया था, लेकिन हमारी सरकार न जाने किस मिट्टी की बनी है,कि उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा।

इस मसले पर खूब राजनीति हुई, तब जाकर घोषणाएं की गईं कि कहीं खाने का इंतजाम है, कहीं रुकने का। लेकिन ये घोषणाएं भी नाकाफी थीं और सरकार की अदूरदर्शिता को साबित करने वाली। तभी तो पिछले दिनों सूरत में सैकड़ों मजदूरों ने जब घर जाने की आवाज उठाई, तो उन पर प्रशासनिक सख्ती दिखानी पड़ी और अभी फिर से मुंबई में और सूरत में वैसी ही तस्वीरें देखने मिलीं।

समाचार एजेंसी पीटीआई की एक तस्वीर है, जिसमें एक सड़क पर जूते-चप्पल का बड़ा ढेर है, ये ढेर मजदूरों पर लाठीचार्ज (Lathi charge on laborers) के कारण लगा।

दरअसल 14 तारीख को जब फिर से लॉकडाउन की घोषणा हुई तो ये मजदूर इस उम्मीद पर बांद्रा रेलवे स्टेशन पहुंच गए कि शायद ट्रेनें चालू हो जाएं और उन्हें घर वापसी की सुविधा मिले।

खबर है कि एक न्यूज चैनल के पत्रकार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है, क्योंकि उसने एक खबर में बताया था कि लॉकडाउन के कारण फंसे हुए लोगों के लिए जन साधारण विशेष ट्रेनें बहाल होंगी।

इसी तरह एक एफआईआर विनय दुबे नाम के एक शख्स के खिलाफ दर्ज किया गया है जिसने सोशल मीडिया पर एक वीडियो डालकर प्रवासियों को सड़क पर उतरने के लिए कहा था। जब पुलिस ने उन लोगों पर लाठी चार्ज किया होगा या मजदूरों की जुटी भीड़ की तस्वीर समाज के एक तबके ने देखी होगी, तो अधिकतर लोगों की यही प्रतिक्रिया होगी कि ये लोग कुछ समझते ही नहीं हैं, इनके कारण पूरे देश को कोरोना का खतरा हो जाएगा, इनमें अकल नहीं है।

लेकिन अगर ऐसे सवाल किसी के मन में उठें तो उसे साथ ही साथ कुछ और सवाल भी उठाने चाहिए, जैसे सरकार इन लोगों को आखिर इंसान कब समझेगी। जब विदेशों में फंसे भारतीयों को लाने के लिए हवाईजहाज भेज सकती है, तो इनके लिए खास बसों का इंतजाम क्यों नहीं किया जाता। या इनके हाथ में तुरंत नगदी पहुंचाने की व्यवस्था क्यों नहीं होती, ताकि कुछ दिनों तक इन्हें राहत मिल सके। गृहमंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से कहा है कि इस तरह की घटनाओं से कोरोना वायरस के खिलाफ भारत की लड़ाई कमजोर होती है और प्रशासन को ऐसी घटनाओं से बचने के लिए सतर्क रहना होगा।

सवाल ये है कि क्या उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री से भी ऐसा ही कुछ कहा है या नहीं। और कोरोना के खिलाफ हमारी लड़ाई मजबूत थी ही कब। सरकार ने तो शुरु से इसमें अपनी कमजोर प्रशासनिक क्षमता दिखलाई इसलिए 21 दिनों के लॉकडाउन के बावजूद मामले दोगुनी-तिगुनी गति से बढ़े। शुरु से टेस्टिंग पर जोर नहीं दिया, कई दिनों तक यही तय नहीं हुआ था कि सरकारी लैब के अलावा निजी लैब इसकी जांच करेंगे या नहीं, फिर जांच की रकम भी इतनी रखी कि गरीब आदमी के लिए उसका वहन करना मुश्किल हो जाए।

Modi in Gamchha  देश में मास्क, ग्लव्स की अचानक कमी हो गई और अब उसमें भी जुगाड़ का इंतजाम कर लिया गया है.

वैसे मोदीजी अगर गमछा नहीं भी पहनते, तब भी लाखों भारतीयों के पास गमछे या रूमाल के अलावा मुंह ढंकने का कोई साधन नहीं है और वे उनके प्रचार के बिना भी इन्हीं का इस्तेमाल करते।

कोरोना के खिलाफ हमारी लड़ाई की बहुत सी कमजोरियां एक-एक कर उजागर हो रही हैं, जिनके बारे में विपक्ष भी सवाल कर रहा है औऱ साथ ही कई सुझाव भी दे रहा है। राहुल गांधी शुरु से आर्थिक संकट की ओर ध्यान दिलाते आए हैं।

Rahul Gandhi has been calling attention to the economic crisis from the beginning.

अभिजित बनर्जी और रघुराम राजन जैसे अर्थशास्त्री सुझाव दे रहे हैं, जिस पर सरकार को अपना अहं किनारे रखकर सोचना चाहिए। यह अच्छी बात है कि 20 तारीख के बाद से कुछ क्षेत्रों में काम शुरु हो रहा है, इससे बहुतों की आजीविका का संकट चलेगा और देश की अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे संभालने में मदद मिलेगी। लेकिन इन उपायों से सबसे पहले गरीब को राहत मिलनी चाहिए, सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता यही हो तो बेहतर है।

देशबन्धु का संपादकीय

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