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narendra modi violin

मोदी जनता को मूर्ख बना रहे हैं और जनता मूर्ख बन रही है! नदियों में शव बह रहे हैं किन लोगों के हैं ?

Modi is fooling the public and the public is becoming foolish!

वैसे तो हर सरकार ने किसी न किसी रूप में जनता को ठगा ही है पर मोदी सरकार ने ऐसा बेवकूफ बनाया कि कहीं न छोड़ा। उनको भी जिनके बलबूते पर सत्ता का मजा लूटते रहे। क्या रोजी-रोटी स्वयंभू हिन्दुओं की नहीं गई है ? क्या कोरोना कहर से ये लोग अछूते रह गये हैं ? क्या आज के हालात में इन लोगों के बच्चों का भी भविष्य और जान खतरे में नहीं है ?

जमीनी हकीकत तो यह है कि हिंदुत्व का राग अलापने वाली मोदी सरकार ने सबसे अधिक हिन्दुओं की भावनाओं से ही खिलवाड़ किया है। ये जो नदियों में शव बह रहे हैं किन लोगों के हैं ? ये जो शवों के आसपास कपड़े दिखाई दे रहे है किस धर्म के लोगों के हैं ?

शुक्र है कि धर्म के नाम पर सत्ता हथियाने वाले लोगों को मुस्लिम समाज के खिलाफ कुछ नहीं मिल रहा है नहीं तो गत साल की तरह इस बार भी कोरोना कहर के लिए मुस्लिमों को ही जिम्मेदार ठहरा देते।

विपदा या महामारी में बड़े स्तर पर जान और माल का नुकसान होता है पर क्या कोरोना महामारी में लोग मरे हैं ? क्या उन लोगों की हत्या नहीं हुई है। कौन लोग हैं इन हत्याओं के जिम्मेदार ? क्या ऑक्सीजन की कमी मरने वालों की स्वभाविक मौत हुई है ? क्या उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव में जबर्दस्ती धकेले गये शिक्षकों की मौत हत्या नहीं है ? क्या इन शिक्षकों ने इलाहाबाद कोर्ट और योगी सरकार से कोरोना संक्रमण का हवाला देते हुए चुनाव को टालने की गुहार नहीं लगाई थी।

हां संक्रमण रोकने का सरकारों के पास बस एक ही उपाय है, वह है लॉकडाउन।

यह देश की विडंबना ही है कि इतना झेलने के बावजूद देश का एक बड़ा तबका जमीनी हकीकत समझने को तैयार ही नहीं। उसे देश और समाज के साथ ही अपने बच्चों के भविष्य और जान से चिंता भाजपा के सत्ता के स्वंभू हिंदुत्व की है। इन लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि तीसरी लहर का डर बच्चों में इतना बैठ गया है कि वे डिस्प्रेशन में आ रहे हैं।

ये लोग समझने को तैयार नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिलाधिकारियों की बैठक में जिन गांवों में कोरोना को हराने की बात कर रहे हैं वहां की स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह से चरमराई हुई हैं।

क्या इसे न्यायिक प्रक्रिया कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के आदेश को योगी सरकार सुप्रीम कोर्ट पलटवा दिया।

क्या आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कोरोना संक्रमण से मरे लोगों के बारे में ‘मुक्त हो जाने’ वाले बयान को व्यावहारिक कहा जा सकता है।

लोग कह रहे हैं कि मोदी सरकार क्या करे। राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी बनती है अरे भाई प्रधानमंत्री तो वाहवाही लूटने के लिए सब कुछ हथियाकर रखना चाहते हैं। इन्हीं महाशय ने सांसदों से गांवों को गोद लेने की अपील की थी। तो इन सांसदों द्वारा गोद लिये गये गांवों ही स्वास्थ्य सेवाएं देख लीजिए।

चलो प्रधानमंत्री के साथ ही सांसदों दूसरे मंत्रियों की ही बात छोड़ दीजिए। खुद स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्धवर्धन ने जिस गांवों को गोद लिया था, उनका ही हाल देख लीजिए।

2014 में प्रधानमंत्री के आह्वान पर डॉ. हर्षवर्धन ने दिल्ली के धीरपुर और घोगा गांव को गोद लिया था। 2018 में उन्होंने सिंघोला गांव को भी गोद ले लिया। वह बात दूसरी है कि गांवों को गोद लेना मात्र औपचारिकता ही रह गया है। डॉ. हर्षवर्धन ने गोद लेने के बाद उधर पलटकर भी नहीं देखा। आज सिंघोला गांव की स्थिति यह है कि वहां 90 फीसद लोग संक्रमित हुए और घर पर ही ठीक हो गये। जो लोग अस्पताल में भर्ती हुए उन्होंने से अधिकतर दम तोड़ गये। जहां तक जांच की बात तो इस गांव में न कोई जांच हुई और न कोई हाल जानने के लिए आया। यह हाल स्वास्थ्य मंत्री द्वारा गोद लिये गये गांव का है। फिर लोग कहते सुने जा रहे हैं कि देश में मोदी का विकल्प नहीं है। मतलब 130 करोड़ के देश में एक बहुरूपिया के सामने लोगों को देश चलाने वाला ही नहीं दिखाई दे रहा है।

मैं मानता हूं कि देश में विपक्ष नाकारा है। अधिकतर स्थापित नेता वंशवाद या परिवारवाद के बल पर बड़े नेता बने हुए हैं पर क्या देश को ऐसे ही बर्बाद होते देखते रहें। क्या लोगों को ऐसे ही मरते देखते रहें। क्या ऐसे ही बच्चों का भविष्य बर्बाद होते देखते रहें। क्या ऐसे ही आने वाली पीढ़ी की बर्बादी को देखकर भी अनदेखा कर दें।

हमारे देश में एक कहावत प्रचलित है कि बेवकूफ बनाना वाला चाहिए बनने के लिए तो लोग तैयार बैठे हैं। देश के लोगों की इस कमजोरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बखूबी पहचाना है। वह भलीभांति जानते हैं कि देश के लोगों को सपने दिखाते जाओ और उन पर राज करते जाओ।

प्रधानमंत्री को संक्रमण में आई कमी तो दिखाई दे रही है पर बढ़ती मौतों की संख्या नहीं दिखाई दे रही है। देश में कोरोना महामारी खत्म नहीं हुई कि ब्लैक फंगस महामारी आ गई पर प्रधानमंत्री को अब हालात सुधरते दिखाई दे रहे हैं। उनके द्वारा बनाये गये माहौल में उनके प्रवक्ता के रूप में स्थापित टीवी चैनल भी भरपूर साथ दे रहे है। मतलब लोगों को बरगलाकर जमीनी हकीकत से दूर ले जाओ। सुविधाओं कुछ मत दो बस बातों से ही उन्हें छका दो। जिनके घर में मौत हुई है, उन्हें मुक्ति का उपदेश देकर सकारात्मक सोचने के लिए कहो। मतलब किसी भी तरह से लोगों का बेवकूफ बनाते रहो।

वैसे भारतीय लोगों के बारे में उनकी यह धारणा एक तरह से ठीक भी है। नोटबंदी में कितने लोग परेशान हुए, सब भूल गये। जीएसटी की परेशानी को सब भूल गये। देश में प्रधानमंत्री कितने स्मार्ट सिटी बनवा रहे थे, कहां वे स्मार्ट सिटी ? सब भूल गये। कितने स्मार्ट विलेज बनवा रहे थे, सब भूल गये। भाजपा सांसदों ने कितने गांव गोद लिये और उनका कितना विकास किया, सब भूल गये। 2014 में इतना काला धन विदेश से लाने की बात कर रहे थे कि प्रत्येक आदमी के खाते में 15 लाख रुपये आ रहे थे, सब भूल गये। हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार दे रहे थे कि लोग सब भूल गये। नये किसान कानून लाकर किसानों ही नहीं बल्कि सभी लोगों के हाथ से रोटी उतारने की व्यवस्था प्रधानमंत्री ने कर दी है पर लोगों को जनता के लिए सर्दी, गर्मी और बारिश को झेलते हुए देश की राजधानी के चारों ओर लड़ाई लड़ रहे किसानों में भी आतंकवादी, नक्सली, देशद्रोही और नकली किसान नजर आ रहे हैं।

श्रम कानून में संशोधन कर नयी पीढ़ी को मानसिक रूप से बीमार बनाने की पटकथा प्रधानमंत्री लिख चुके हैं पर लोगों को अपने बच्चों का भविष्य और स्वास्थ्य देखने के बजाय मोदी में करिश्मा दिखाई दे रहा है।

अब जब कोरोना की दूसरी लहर में डॉक्टर ऑक्सीजन की कमी से लाखों संक्रमित लोग दम तोड़ गये। लोग रेमडेसिविर इंजेक्शन और ऑक्सीजन के लिए दर-दर की ठोकरें खाते रहे। मोदी सरकार वैक्सीन लगाने की बात तो करती रही पर वैक्सीन बनाने की कंपनियों को पैसे देने के नाम पर ठेंगा दिखा दिया। अब जब वैक्सीन की किल्लत हो गई तो दूसरी दोज की मियाद बढ़ा दी गई। एक-दो महीने में शायद वैक्सीन लगवाने की जरूरत ही महसूस न की जाए। यदि लोगों ने देश की वैक्सीन विदेश में भेजने  के पोस्टर छपवा कर चस्पा दिये तो उनकी गिरफ्तारी कर ली गई। इन सबके बावजूद लोगों को लगता है कि देश में सब कुछ ठीक चल रहा है तो फिर मोदी सरकार और भाजपा शासित सरकारों को कुछ करने की जरूरत ही क्या है ?

चरण सिंह राजपूत

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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