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झूठ की ताक़त के भरोसे चल रहे हैं मोदी, थोड़े दिनों बाद ही मोदी रोते हुए भी दिखाई दे सकते हैं

झूठ की ताक़त के भरोसे चल रहे हैं मोदी, थोड़े दिनों बाद ही मोदी रोते हुए भी दिखाई दे सकते हैं

Modi is running on the strength of lies

पंचतंत्र की प्रसिद्ध कहानी (Famous story of panchatantra) है कि कैसे तीन ठगों ने बकरी को कंधे पर लाद कर ले जा रहे एक ब्राह्मण को बार-बार टोक कर उसे यह साबित कर दिया कि वह बकरी नहीं, कुत्ता लाद कर जा रहा है। भ्रम में फँस कर ब्राह्मण ने बकरी को कंधे से उतार कर फेंक दिया और ठगों ने उसे हथिया लिया।

तमाम प्रकार के षड़यंत्रकारियों और कथित नरेटिव सेटर्स की फ़ौज के साथ काम करने के अभ्यस्त मोदी अभी इसी ठगबाजी के गुर को किसानों पर आज़माने पर तुले हुए हैं। उनके प्रमुख सिपहसलार अमित शाह तो पूरी निर्लज्जता के साथ खुली सभा में यह कह चुके हैं कि वे कैसे चंद घंटों के अंदर किसी भी झूठ को देश के कोने-कोने में फैला देने की ताक़त रखते हैं। अभी वे सभी किसानों को ही यह साबित करने पर तुले हुए हैं कि तुम तो किसान ही नहीं हो।

थोड़े दिनों बाद ही मोदी रोते हुए भी दिखाई दे सकते हैं और कहते पाए जाएँगे कि कैसे लुटियन की दिल्ली के चंद ताकतवर लोगों ने उनके जैसे और अंबानी-अडानी की तरह के बेचारे देशभक्तों और जन-सेवकों को किसानों का दुश्मन साबित करने का बीड़ा उठा लिया है !

और, जब मोदी और अंबानी-अडानी आंसू बहायेंगे, तो भला ऐसा कौन हृदयहीन होगा, जो उनके दुख को साझा करने और उन्हें दिलासा दिलाने के लिये आगे नहीं आएगा !

ये वे लोग हैं जो आपके सामने गिड़गिड़ाते हुए आप से ही आपकी हत्या करने का अधिकार माँग सकते हैं ! मोदी का रकाबगंज गुरुद्वारा में मत्था टेकना भी तो ऐसा ही था। वे वहाँ सिखों के ही दमन का अधिकार हासिल करने के लिए तो गए थे !

जीवन के सभी स्तर पर तमाम दक्षिणपंथी रणनीतिकार दिन रात इसी प्रकार झूठ की साधना के ‘पवित्र काम’ में ही लगे रहते हैं। भारत में आरएसएस इस गुर के सबसे पुराने और मंजे हुए उस्तादों का संगठन है। अभी इनके लोगों के मुँह से आप अमेरिका में ‘बेचारे’ ट्रंप को वहाँ के राजनीतिक इलीट के द्वारा साज़िश रच के अपदस्थ कर दिए जाने की कहानियाँ भी सुन सकते हैं। ये हिटलर तक के बारे में भी शक्तिशालियों द्वारा घेर कर मार दिये जाने की किस्सागोई से उसके प्रति दया-भाव पैदा करने से नहीं चूकते ! हिटलर के हत्यारे कुकर्म इनके लिए कोई मायने नहीं रखते।

सभ्यता के इतिहास में सत्य की अंतिम जीत के सिद्धांतों की जितनी भी बात क्यों न की जाए, वह झूठ की ताक़त के उदाहरणों से भी भरा हुआ है।

बार-बार झूठ को पराजित करके ही मनुष्यता का विजय रथ आगे बढ़ता है। पर उससे कभी झूठ के साधकों का उत्साह कम नहीं होता है।

भारत के वर्तमान ऐतिहासिक किसान संघर्ष को सरकार के झूठे प्रचार के ख़िलाफ़ सही सूचनाओं के प्रसारण के काम में ज़रा भी कोताही नहीं बरतनी चाहिए। किसानों के सत्य की अंतिम जीत को संघी प्रचारकों का दल-बल कभी रोक नहीं सकता है, पर नाना प्रकार के भटकावों से उनकी लड़ाई को कठिन और जटिल जरूर बना सकता है।

-अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari - अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।
Arun Maheshwari – अरुण माहेश्वरी, लेखक सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार हैं। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘कलम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव। वह हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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