मेरे दोस्त को कोरोना नहीं हुआ, बिना इलाज मर गया

Novel Coronavirus SARS-CoV-2 Colorized scanning electron micrograph of a cell showing morphological signs of apoptosis, infected with SARS-COV-2 virus particles (green), isolated from a patient sample. Image captured at the NIAID Integrated Research Facility (IRF) in Fort Detrick, Maryland.

बहुत दुःखद खबर है, बसंतीपुर में मेरे बचपन के मित्र रवीन्द्र मण्डल का कल दोपहर बाद 3 बजकर 20 मिनट पर निधन हो गया। वे मुझसे दो तीन साल बड़े थे। कृष्णपद मण्डल की तरह। दोनों अब नहीं हैं। कृष्ण खिलाड़ी थे तो रवींद्र की बचपन से पढ़ने लिखने की बहुत रुचि थी। ऐसे लोग गांव में अब कोई नहीं है। यह निजी अपूरणीय क्षति है।

दफ्तर से लौटने के बाद रात आठ बजे सविता जी को खबर लगी तो मैं उनके घर गया। अंतिम दर्शन नहीं हो सका अपने प्रिय मित्र का। शाम छह बजे ही उन्हें श्मशानघाट ले गए।

अभी पिछले साल उनके जवान बेटे पत्रकार मुकुंद की मोटर साईकिल दुर्घटना में मृत्यु हो गयी थी। उसकी हाल में शादी हो गई थी, लेकिन कोई बच्चा नहीं था उनके पास। पुत्रवधु मायके वापस चली गयी थी।

पति पत्नी अकेले थे। अब रवीन्द्र की पत्नी बिल्कुल अकेली हो गयी।

बेटे के निधन पर मेरे पास सांत्वना के कोई शब्द नहीं थे और आज बाप के निधन पर भी निःशब्द हूँ।

रवीन्द्र गुर्दे की बीमारी से पीड़ित थे। मुकुंद जब तक थे, पिता का इलाज कराते रहे। उसके निधन के बाद इलाज बन्द था।

वह इतने गम्भीर रूप से बीमार था,किसी ने नहीं बताया। हम पुत्रशोक की वजह से उसे अस्वस्थ मानकर चल रहे थे।

वे प्रेरणा अंशु के नियमित पाठक थे।

रवीन्द्र प्रेरणा अंशु लेने बेटे के निधन के बाद भी घर चले आते थे। पिछले शनिवार को दिनेशपुर बाजार से लौटकर वह बीमार पड़ गया।

इससे पहले वह जमीन से लौटते हुए रास्ते पर मिला और प्रेरणा अंशु मांगने लगे। करीब पिछले चार अंकों के बाद प्रतियां नया अंक प्रेस में जाने से पहले खत्म हो जा रही हैं।

मैने कहा कि नया अंक आते ही घर आऊंगा। अगस्त अंक छपने के बाद फुर्सत ही नहीं मिली। कल सुबह फिर शक्तिफार्म सितारगंज किच्छा इलाकों में जाना है।

मुझे अफ़सोस है कि उसकी मामूली सी आखिरी ख्वाहिश पूरी नहीं कर सका।

बचपन में वह जबरदस्ती मेरे घर आकर मेरा खजाना लूट ले जाता था। अब वह लूटता नहीं था, मांगता था।

उम्र के साथ दोस्ती के हक की बुनियाद शायद कमजोर हो गयी थी।

मुकुंद की मौत से पहले प्रेरणा अंशु में हमने उसकी एक कविता छापी थी। उसकी वर्तनी की शुद्धता देखकर मैं हैरान रह गया। बाप बेटे दोनों खुश थे। मुकुंद के निधन के बाद शोक संतप्त मित्र से फिर में लिखने का अनुरोध नहीं कर सका। इसका भी अफ़सोस है।

शनिवार को अस्वस्थ हो जाने पर उसे दिनेशपुर के एक निजी क्लिनिक में ले गए। उसे बुखार था। डॉक्टर ने उसे ग्लूकोज चढ़ाया तो फेफड़े में पानी भर गया।

रुद्रपुर ले गए लेकिन किसी अस्पताल ने उसका इलाज नहीं किया। आक्सीजन सिलिंडर के साथ घर भेज दिया। वह आक्सीजन पर था। आक्सीजन खत्म होते ही मेरे प्रिय दोस्त ने दम तोड़ दिया।

यह एक साहित्य प्रेमी के बिना इलाज मरने की त्रासदी है।

मुझे मालूम नहीं कि किसी पाठक की मौत पर भाषा और साहित्य को नुकसान होता है या नहीं।

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग
पलाश विश्वास
जन्म 18 मई 1958
एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय
दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक।

प्रेरणा अंशु ने एक जेनुइन पाठक हमेशा के लिए खो दिया।

हमारे लिए यह अपूरणीय क्षति है।

समाज और राष्ट्र को कोई फर्क नहीं पड़ता।

बेमौत मारे जा रहे ऐसे लोगों के लिए कितनी आंखों में आंसू होंगे, हम नही जानते, लेकिन हमारी आंखों में इस शोकमग्न समय में भी दो चार बून्द आंसू जरूर हैं।

प्रेरणा अंशु पारिवार से अपने पाठक और कवि को विनम्र श्रद्धांजलि।

मेरा दिलोदिमाग लहूलुहान है।

वर्तनी की गलतियों के लिए माफ करें।

आंखें काम नहीं कर रहीं।

पलाश विश्वास

पाठकों सेअपील - “हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें
 

Leave a Reply