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नंदीग्राम और महाझूठ का खेला होबे : हिटलर के योग्य चेला-चेली

Nandeegraam aur maha jhooth ka khela hobe : hitalar ke yogy chela-chelee

हिटलर के योग्य चेला-चेली, उसके ‘बिग लाई’ या महाझूठ के हथियार का प्रयोग करने में जरूर माहिर होते हैं। प्रचार के इस हथियार का प्रयोग करने में महारथ हासिल हुए बिना कोई हिटलर का नाकाम चेला तक नहीं हो सकता है। बिग लाई या महाझूठ के इस सिद्धांत का, जो हिटलर ने अपनी कुख्यात आत्मकथा, ‘मीन कैम्फ’ में बाकायदा लिखित रूप में पेश किया था (हालांकि इसे यहूदियों के दानवीकरण के लिए उनसे शिकायतों/ आरोपों के हिस्से के तौर पर पेश किया गया था) और जिसे हिटलर के प्रचारमंत्री गोयबल्स ने प्रोपेगंडा के हथियार के तौर पर विनाशकारी तरीके से आजमाया था, सार संक्षेप में यही है कि प्रचार के जरिए झूठ को लोगों ने सच जरूर मनवाया जा सकता है, पर उसकी दो शर्तें हैं। ये शर्तें परस्पर पूरक हैं। पहली, झूठ को बार-बार दोहराया जाए, सैकड़ों बार दोहराया जाए। बार-बार दोहराने से, लोगों को उसमें सच नजर आने लगता है। दूसरी, यह कि बहुत बड़ा झूठ बोल जाए, इतना बड़ा झूठ कि लोगों को इस पर यकीन ही नहीं आए कि कोई इतना बड़ा झूठ भी बोल सकता है। लोग मानेंगे कि  चूंकि इतना बड़ा झूठ नहीं हो ही नहीं सकता है, इसलिए कहा जा रहा है तो सच ही होगा!

महाझूठ के पक्ष में हिटलर की मनौवैज्ञानिक दलील

महाझूठ के पक्ष में हिटलर ने एक दिलचस्प मनौवैज्ञानिक दलील भी देता है। वह कहता है कि साधारण लोग अपने जीवन में छोटे-छोटे झूठ तो खूब बोलते हैं, पर बड़ा झूठ बोलने से हमेशा बचते हैं। इसलिए, छोटे झूठ के झूठ होने पर तो वे आसानी से विश्वास कर लेते हैं, लेकिन बड़े झूठ को आसानी से झूठ मान ही नहीं पाते हैं। इसलिए, बड़ा झूठ कितना ही अविश्वसनीय क्यों न हो, सुनने वाले पर उसका कुछ न कुछ असर तो रह ही जाता है।

         बंगाल में, नंदीग्राम में 2007 में हुई हिंसक घटनाओं के सिलसिले में, जिन्होंने बंगाल की राजनीति में जबर्दस्त उलट-पुलट की जमीन तैयार थी, इस बार के चुनाव प्रचार के दौरान हुए रहस्योद्घाटनों ने हिटलर-गोयबल्स के ‘बिग लाई’ या महाझूठ के सिद्धांत और व्यवहार की बरबस याद दिला दी है।

नंदीग्राम में तथाकथित ‘पुलिस गोलीबारी’ की घटना में हुई, प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण के विरोधी किसानों की 14 दुर्भाग्यपूर्ण मौतों को जिस तरह अंतत: प. बंगाल में वाम मोर्चा के तीन दशक से ज्यादा से चले आते राज को उखाडऩे का हथियार बनाया गया और 2011 में राज्य में तमाम वाममोर्चा विरोधी ताकतों की सेनानायक के रूप में ममता बैनर्जी बंगाल में सत्ता में पहुंच गयीं, यह तो खैर सभी जानते हैं। लेकिन, ‘चोरों के कुनबे में फूट’ पड़ने से अब इस ‘परिवर्तन’ के पीछे, महाझूठ के ठीक इसी हथियार के बहुत ही घातक इस्तेमाल की जो कहानी सामने आयी है, उसे ज्यादा लोग नहीं जानते थे। बल्कि यही कहना ज्यादा सही होगा कि तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार तथा हर प्रकार के तथ्यों द्वारा बार-बार ध्यान दिलाए जाने से, इस कहानी को लोग जानते तो थे, लेकिन मानते नहीं थे, मान ही नहीं सकते थे।

आखिरकार, हर प्रकार के मीडिया से लेकर, सत्ताधारी वर्ग की सभी पार्टियों तक के सहारे फैलाए जा रहे ‘किसानों की जमीनें छीनने के लिए सीपीएम सरकार के किसानों के नरसंहार’ के महाझूठ के, झूठ होने पर वे यकीन करते भी तो कैसे? झूठ इतना बड़ा था कि उन्हें उसे तो सच मानना ही पड़ा।

बहरहाल, अब जब प्रतिक्रांतिकारी ‘परिवर्तन’ का 14 साल पहले शुरू हुआ चक्र, इस ‘परिवर्तन’ के शुरूआती लाभार्थियों को भी बदलकर, सबसे ज्यादा प्रतिक्रियावादी तथा धुर-दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक ताकत को सत्ता सौंपने के ‘परिवर्तन’ तक पहुंचने के पूरा जोर लगा रहा है, इस प्रतिक्रांतिकारी ‘परिवर्तन’ के तीनों प्रमुख खिलाड़ी और नंदीग्राम के महाझूठ के मुख्य गढ़ैया, एक-एक कर अलग हो चुके हैं।

ममता बैनर्जी के सत्ता में आने के बाद, सबसे पहले अलग हुए बल्कि सफाए का ही शिकार हुए, कथित माओवादी, जिन्हें वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ इस मुहिम का ‘इस्तेमाल करो और फेक दो’ वाला औजार बनाया गया। ममता बैनर्जी के सत्ता में आने के बाद चूंकि उनका कोई इस्तेमाल नहीं रह गया था, किशन जी समेत माओवादी ताने-बाने का तेजी से खात्मा कर दिया गया। उन्हें नंदीग्राम का सच बताने का मौका ही नहीं मिला। हालांकि इसमें भी शक है कि उन्हें बताने का मौका भी मिला होता, तो भी उनकी बात सुनी जाती!

खुद ममता ने किया ‘‘अशोल परिबर्तन’’ का झूठ का पर्दाफाश

और अब ‘परिवर्तन’ को सबसे सांप्रदायिक और सबसे कार्पोरेटपरस्त, भाजपा के थैले में बंद करने की कोशिश के चलते, जिसे ‘‘अशोल परिबर्तन’’ बताया जा रहा है, नंदीग्राम के स्थानीय बाहुबली प्रायोजक, अधिकारी परिवार और इस ‘परिवर्तन’ का प्रमुख राजनीतिक साधन बनीं, ममता बैनर्जी के बीच फूट पड़ गयी है।

अब 28 मार्च को नन्दीग्राम की एक चुनावी सभा में ममता बनर्जी ने खुद ही नंदीग्राम के झूठ को उजागर कर दिया है। ममता ने एलानिया कहा कि ‘14 मार्च 2007 को पुलिस यूनिफार्म और हवाई चप्पल पहने जिन कथित पुलिसवालों ने चलाई थी वे बाप-बेटे – शुभेन्दु अधिकारी और शिशिर अधिकारी के भेजे हुए लोग थे।’

याद रहे कि उस समय ही, मृतकों के शव परीक्षण में निकली गोलियों से तथा अन्य साक्ष्यों से यह साफ हो चुका था कि नंदीग्राम की मौतें पुलिस की गोलियों से नहीं हुई थीं और कई तस्वीरों में लोग न सिर्फ दूसरी ओर से गोली चलाते दिखाई दे रहे थे बल्कि गोली चलाते देखे गए कई लोग नकली पुलिस वाले थे, जिसकी गवाही उनका खाकी पोशाक के साथ पांवों में हवाई चप्पल पहने होना देता था। सीबीआई की जांच में भी मौतें पुलिस की गोलियों से नहीं होने का ही सच सामने आया था। लेकिन, महाझूठ के प्रायोजित अभियान में सच सुनता ही कौन! 

बहरहाल, अब खुद ममता बनर्जी ने बता दिया है कि नंदीग्राम में खून-खराबे की पूरी पटकथा, अधिकारी परिवार तथा उसके एजेंटों ने ही लिखी थी और अभिनीत की थी।

बहरहाल, शुवेंदु अधिकारी ने भी साफ कर दिया है कि ममता बैनर्जी इतनी आसानी से सारी जिम्मेदारी से हाथ नहीं धो सकती हैं। ममता बैनर्जी के यह कहने के जवाब में कि उन दिनों में और बाद तक भी नंदीग्राम पर पूरी तरह से अधिकारी परिवार का ही नियंत्रण था और उनकी मर्जी के बिना वह भी वहां घुस तक नहीं सकती थीं, शुवेंदु अधिकारी ने यह याद दिलाया है कि कथित नंदीग्राम गोलीकांड से जुड़े विभिन्न स्तर के पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों को, ममता बैनर्जी के शासन में दंडित करना तो दूर, वास्तव में किसी न किसी तरह से पुरस्कृत ही किया गया था, जो इस पूरे खेल में ममता बैनर्जी की संलिप्तता को उजागर कर देता है।

इसके ऊपर से अधिकारी ने एक प्रकार से ममता बैनर्जी को जवाबी रहस्योद्घाटनों की धमकी देते हुए यह भी कहा है कि, उससे ज्यादा मुंह न खुलवाया जाए। उसके पास भी सुश्री बैनर्जी के खिलाफ कहने को बहुत कुछ है।

नंदीग्राम की हिंसा और सिंगुर के सहारे, वाम मोर्चे के किसान-विरोधी होने का महाझूठ रचने के जरिए, बंगाल में प्रतिक्रांतिकारी परिवर्तन के लिए रास्ता बनाने के लिए जैसे सभी वामपंथविरोधी ताकतों ने हाथ मिलाया, वह भी जाहिर है कि वाम मोर्चा को अपदस्थ करने के बाद ज्यादा नहीं चल सकता था। 2006 के विधानसभाई चुनाव में वाम मोर्चा के हाथों बुरी चुनावी हार के बाद, ममता बैनर्जी 2009 के आम चुनाव तक कांग्र्रेस को बंगाल में, जूनियर पार्टनर के तौर पर अपने साथ आने के लिए तैयार कर चुकी थीं। इस गठजोड़ को यूपीए-1 की सरकार के आखिरी वर्षों में, वामपंथ के मनमोहद सरकार से समर्थन वापस लेने के जवाब में मजबूत किया गया था।

जाहिर है कि नंदीग्राम के महाझूठ को केंद्र में सत्ता में बैठी कांग्रेस का भी अनुमोदन हासिल था। 2009 के आम चुनाव में तृणमूल-कांग्रेस-एसयूसीआइ गठबंधन के राज्य की 26 लोकसभा सीटों पर कब्जा कर लेने के बाद, ‘पोरिबोर्तन’ के नारे के साथ, वाम मोर्चा का सत्ता से हटाया जाना बहुत दूर नहीं रह गया था। लेकिन, इसके लिए सुश्री बैनर्जी के नेतृत्व में धुर-वामपंथ में माओवादियों व एसयूसीआइ से लेकर धुर-दक्षिणपंथ में संघ-भाजपा-गोरखा कट्टरपंथियों तक का महागठजोड़ आसानी से सामने आ गया। यह दूसरी बात है कि सत्ता ‘पोरिबोर्तन’ के साथ ही इस गठजोड़ का बिखरना भी शुरू हो गया।

सबसे पहले माओवादी बाहर धकेले गए। उसके बाद 2013 में कांग्रेस का नंबर आया। इसके बाद, 2014 के आम चुनाव के ऐन पहले ‘दिल्ली में मोदी, कोलकाता में दीदी’ का ‘‘दोनों हाथों में लड्डू’’ का खेल बनते-बनते बिगड़ गया। इस संबंध विच्छेद पर 2016 के विधानसभाई चुनाव में मोहर लग गयी। और इस चुनाव में भाजपा ‘‘अशोल पोरिबोर्तन’’ का वादा कर रही है।

नंदीग्राम के महाझूठ का दम निकल चुका है, जिसका एक संकेतक संयुक्त मोर्चा की युवा सी पी आइ (एम) उम्मीदवार, मीनाक्षी मुखर्जी का ममता बैनर्जी तथा सुवेंदु अधिकारी जैसे भारी-भरकम राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के सामने प्रभावशाली राजनीतिक प्रचार अभियान है। दूसरी ओर महाझूठ के खिलाड़ी, अपने-अपने नये महाझूठ गढऩे में लगे हुए हैं।

वामपंथ के विपरीत, चूंकि वे जनता के वास्तविक हितों से विमुख हैं बल्कि उनके खिलाफ हैं, इसलिए उन्हें इस सचाई को छुपाने के लिए हमेशा किसी न किसी महाझूठ का सहारा चाहिए।

भाजपा को, हिंदू बहुसंख्यकों का हितरक्षा के महाझूठ के सहारे, बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का ही आसरा है। पश्चिम बंगाल की जनता ही यह तय करेगी वह एक बार फिर एक और महाझूठ से ठगी जाएगी या अपने वास्तविक हितों के तकाजों को पहचानकर, वामपंथ की वापसी लिए रास्ता बनाएगी। 

 राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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