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पांचवे लॉकडाउन की आहट के बीच कोरोना महामारी पर नए सिरे से सोचने की जरूरत

Need to rethink corona epidemic amidst the fifth lockdown

एक नए शोध (New research on corona virus) के मुताबिक शांत समय में कोरोना वायरस छींक, खांसी, यहाँ तक कि बातचीत के दौरान 20 फिट तक जा सकता है। छींकने, खाँसने, या सामान्य बातचीत में 40.000 नन्हीं बूंदें निकल सकती हैं जो एक सेकंड में कुछ मीटर से लेकर कुछ सौ मीटर तक जा सकती ही हैं। जाहिर सी बात है ऐसा हवा के प्रवाह और उसमें मौजूद नमी पर निर्भर होगा।

The sound of the fifth lockdown has been heard in India

भारत में पांचवें लॉकडाउन की आहट सुनाई देने लगी है। लेकिन लॉक डाउन कितना प्रभावी है इसपर भी बहस जारी है। अब इस नए शोध के बाद गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि लॉक डाउन का भारतीय परिपेक्ष्य में इस तरह से पालन कर पाना संभव है कि संक्रमण की प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा सके या लॉक डाउन से होने वाले नुकसान की तुलना में फायदा कितना है।

यह बात भी अपनी जगह अटल है कि लॉकडाउन अपने आप में समस्या का हल नहीं है। इसको लागू करने के पीछे धारणा यह थी कि कोरोना के फैलाव को नियंत्रित किया जाए और इस प्रकार मिलने वाले समय का इलाज की सुविधा उपलब्ध करवाने, जरूरी उपकरणों की व्यवस्था करने और अन्य प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करने के लिए किया जाए ताकि स्थाई समाधान की तरफ बढ़ा जा सके।

What was found from the lockdown, what is lost also needs to be reviewed

लॉक डाउन से क्या पाया, क्या खोया इसकी समीक्षा की भी जरूरत है ताकि आगे की रणनीति बनाने में इस अनुभव से सीख मिल सके।

राजनीतिक व्याख्या अपनी जगह कि लॉक डाउन न होता तो अब तक संक्रमितों की संख्या 10-15 लाख होती। इस तरह के दावों के लिए कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन यह कटु सत्य है की अगर जांच बड़े पैमाने पर की गई होती तो संक्रमितों की संख्या अवश्य ही काफी अधिक होती लेकिन हम इसके स्थाई समाधान के भी उतने ही करीब होते।

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Masihuddin sanjari  अमेरिका में कुल संक्रमितों की संख्या 17 लाख से भी अधिक है। लेकिन वहाँ करीब 10 प्रतिशत या 3.5 करोड़ लोगों की कोरोना जांच हो चुकी है। जबकि भारत में भारत में अब तक केवल करीब 32 लाख लोगों की ही कोरोना जांच हुई है और संक्रमितों की संख्या करीब 1.5 लाख है। संक्रमण की इस दर से अगर 3.5 लोगों की जाच होती है या 10 प्रतिशत भारतीयों की जांच की जाती है तो संभावित मरीजों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है।

जांच कम करने का मतलब है संक्रमितों को खुला छोड़कर संक्रमण के बढ़ते रहने की संभावना को प्रबल बनाना। इससे न केवल ज्यादा क्षति होगी बल्कि देश लंबे समय तक कोरोना के नाम पर अछूत बना रहेगा, अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचेगा और आम आदमी का जीना दूभर हो जाएगा।

मसीहुद्दीन संजरी

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