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Fidel Castro

क्यूबा के समाजवादी ढांचे को बचाने की आवश्यकता

Need to save Cuba’s socialist structure: Dr Girish

It has become necessary to save Cuba’s socialist structure in the same way that mankind from the COVID crisis.

भारत की आजादी के 12 साल बाद 1959 में वहां के तानाशाह बतिस्ता को उखाड़ कर वहां के क्रांतिकारी हीरोद्वय फिदेल कास्त्रो और चेग्वेरा ने जिस समाजवाद की नींव डाली थी आज वह संकट में है। क्यूबा के इस समाजवादी ढांचे को बचाना उसी तरह आवश्यक हो गया है जिस तरह कि कोविड संकट से मानवजाति को।

यूं तो क्यूबा उसी समय से लुटेरी साम्राज्यवादी व्यवस्था और उसके सरगना अमेरिका के निशाने पर है जब उसने तानाशाही को उखाड़ कर  स्वतंत्रता, समानता और संसाधनों पर सभी के समान अधिकार की राह चुनी। समाजवाद की राह पकड़ते देख बौखलाये साम्राज्यवादियों ने  दुनियां के नौजवानों के हीरो और वहां के स्वास्थ्य मंत्री चेग्वेरा की हत्या करा दी थी। इतना ही नहीं राष्ट्रपति फ़िदेल कास्त्रो की हत्या के प्रयास भी दर्जनों बार किये गये।

अमेरिका से बहुत कम फासले पर स्थित इस देश की अर्थव्यवस्था को छिन्न भिन्न करने और वहां तख्ता पलट कर पिट्ठू सरकार कायम करने के प्रयास अनेकों बार किये गये लेकिन तब समाजवादी ढांचे वाले सोवियत संघ(USSR) से उसे हर तरह की मदद मिलती रही मगर वहां समाजवादी व्यवस्था के पतन के बाद से क्यूबा गहरे संकट में आगया।

उसके बाद चीन ने क्यूबा की तरफ मदद का हाथ बढ़ाया, लेकिन आज कोविड संकट के चलते चीन खुद संकट में है, और क्यूबा की अपरिहार्य मदद कर नहीं पा रहा। क्यूबा के संकट का मतलब है वहां के समाजवादी ढांचे को बचाने का संकट, जिसने विश्व मानवता को कई अमूल्य उपलब्धियां हासिल करायी हैं।

हाल में क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी और वहां की सर्वोच्च सत्ता  में हुये परिवर्तन से जिसमें पहली बार कोई गैर कास्त्रो सत्ता शिखर पर आरूढ़ हुआ है,  लाशों के लिए गीध की तरह क्यूबा के प्राकृतिक संसाधनों पर नजर गढ़ाये बैठे साम्राज्यवादियों की जीभ फिर लपलपाने लगी है। हालांकि कम्युनिस्ट शासन वाले देशों में सत्ता शिखर पर सामूहिक नेतृत्व होता है और क्यूबा की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी इससे भिन्न नहीं है। फिर भी साम्राज्यवादी अपनी साजिशें रोकने से तो बाज आने वाले नहीं।

1959 की क्रान्ति के बाद देश का सर्वोच्च पद क्रान्ति के नायक फ़िदेल कास्त्रो ने संभाला था। 2006 में उन्होंने क्रान्ति के दूसरे नायक और अपने छोटे भाई राऊल कास्त्रो को राष्ट्रपति पद सौंपा था। तब  साम्राज्यवादी प्रचारतंत्र ने पारिवारिक सत्ता का आरोप लगा कर खूब चिल्लपों मचायी थी।

क्यूबा के संविधान के मुताबिक, कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव ही देश का सर्वशक्तिमान पदाधिकारी है और अब इस पद पर अब 61 वर्षीय मिगुएल डियाज- कानेल को चुना गया है। हालांकि मिगुएल पहले से देश के राष्ट्रपति पद पर आसीन थे। वे 2018 में देश के राष्ट्रपति बने थे।

अब चूंकि देश में पहली बार सर्वोच्च पद गैर कास्त्रो के हाथों में है, अतएव पर्यवेक्षक इसे नये युग की शुरुआत मान रहे हैं। लेकिन साम्राज्यवादी इसे अपने लिये नये अवसर के रूप में देख रहे हैं।

1959 की क्रान्ति के बाद जब क्यूबा ने वहां के प्रमुख उद्योग चीनी और और पर्यटन आदि का राष्ट्रीयकरण किया तो देश के संसाधनों पर आधिपत्य जमाये बैठे बतिस्ता समर्थकों में खलबली मच गयी। जब वहां समानता,  बंधुत्व और प्रगति का कारवां आगे बढ़ा तो उसके सिर पर बैठे अमेरिका की भौंहें तन गयीं। दुनियां के स्वघोषित दरोगा से तल्ख रिश्तों के बावजूद फ़िदेल के नेतृत्व में क्यूबा ने वहाँ समाजवाद की व्यवस्था को आगे बढ़ाया। शिक्षा स्वास्थ्य पर्यटन के क्षेत्र में अभूतपूर्व तरक्की की। दुनियां के कोने कोने से आने वाले छात्रों को उसने शिक्षा देने का कीर्तिमान हासिल किया।

मेडिकल और बायो मेडिकल क्षेत्र में क्यूबा ने अपनी प्रगति से धनीमानी देशों को पीछे छोड़ दिया है। अपनी समस्त आबादी को बेहतर और संपूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराने के अलाबा क्यूबा दुनियां के संकटग्रस्त देशों को अपने कुशल डॉक्टर उपलब्ध कराके मानवता की अनुपम सेवा करता रहा है।

जब सारी दुनियां कोविड संकट से जूझ रही है क्यूबा ने अपने अभेद्य मेडिकल सुरक्षा कवच के जरिये अपने नागरिकों को काल कवलित होने से बचाया है। भारी आर्थिक संकट के बीच दुनियां के नक्शे पर एक बिन्दु जैसे दिखने वाले छोटे और गरीब देश क्यूबा ने तीन कोविड वैक्सीनों का सफल परीक्षण किया है। पूरी उम्मीद है कि क्यूबाई वैक्सीन जून-जुलाई तक बाजार में आ जायेगी।

तब क्यूबा न केवल अपने नागरिकों का टीकाकरण कर सकेगा अपितु तमाम जरूरतमंद देशों को अपनी वैक्सीन मुहैया करा सकेगा। जाहिर है वैक्सीन के व्यापार पर कब्जा जमाये बैठे घाघों को इससे बड़ी चुनौती मिलेगी।

हमारे जैसे तमाम देशों, जहां कोविड संकट गहराया हुआ है और हाल फिलहाल काबू से बाहर है क्यूबा के कुशल और सेवाभावी चिकित्सक बड़े मददगार हो सकते हैं। परन्तु कथित राष्ट्रवाद का लबादा ओढ़े हमारे आज के शासक नाक का प्रश्न बना कर इस मदद को लेने को शायद ही तैयार हों।

शिक्षा और स्वास्थ्य का क्षेत्र ही नहीं क्यूबा के प्रशिक्षित सैनिक प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और दुनियां के मुक्ति आंदोलनों की मदद के लिए सदैव उपस्थित रहे हैं। मानवता की सेवा में निरत ऐसा यह देश आज अनेक कठिनाइयों से जूझ रहा है। ये चुनौतियां आंतरिक कम, बाह्य अधिक हैं।

चीन को किये जाने वाले निर्यात में 40 प्रतिशत की कमी आ गयी है। वहां की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार पर्यटन उद्योग कोविड संकट के चलते पूरी तरह चौपट होगया है। कई देशों को मुहैया कराए जाने वाले चिकित्सकों की एवज में होने वाली आय में कमी आगयी है। चीनी का निर्यात भी घटा है। इससे उसकी अर्थव्यवस्था अच्छी- खासी कमजोर हुयी है। उससे भी ऊपर  अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने उस पर कई प्रतिबन्ध लगा दिये और जाते जाते उसे  आतंकवाद का स्रोत घोषित कर दिया। इससे क्यूबा की आर्थिक स्थिति और खराब हुयी है।

क्यूबाई नागरिकों का एक हिस्सा चाहता है कि उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया को तेज किया जाये। वे उदारीकरण और निजीकरण के जरिये अर्थव्यवस्था में सुधार का सपना देख रहे हैं। लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोग जिन्होंने 1959 से पहले का वह दौर देखा है जब क्यूबा के लोगों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जाता था, वे चाहते हैं कि क्यूबा में समाजवादी व्यवस्था कायम रहे। वे चाहते हैं कि उदारीकरण यदि हो तो धीमी रफ्तार और समाजवाद को बचाते हुए हो। वे आरोप लगाते हैं कि तेजी से उदारीकरण की बात मियामी में बैठे वे लोग कर रहे हैं जो तानाशाह बतिस्ता के साथ 1959 में वहां से भाग गये थे।

अमेरिका की इस घेराबंदी के बावजूद क्यूबा उससे संबंध सुधारने को उत्सुक है। ओबामाकाल में उसे कुछ छूटें मिली थीं तो उसकी अर्थव्यवस्था को कुछ स्वांश लेने का मौका मिला था। लेकिन मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अभी तक क्यूबा के ऊपर लगी पाबंदियां हटाने का कोई संकेत नहीं दिया है।

It is in the interest of humanity to maintain a socialist system in Cuba.

क्यूबा में समाजवादी व्यवस्था का कायम रहना मानवता के हित में है। दुनियां के उन अभावग्रस्त लोगों के हित में है जो स्वास्थ्य एवं जीवन- रक्षा के लिए आज भी गहरी जद्दोजहद कर रहे हैं एवं उच्च और तकनीकी शिक्षा जिन्हें आसानी से उपलब्ध नहीं है। कोविड काल में क्यूबा का समाजवादी बने रहना मानवता की रक्षा के लिए एक बड़ा सहारा हो सकता है। अतएव क्यूबा के समाजवाद की रक्षा होनी चाहिये। विश्वस्तर पर इसके लिए आवाज उठनी चाहिये।

क्यूबा के साथ भारत के रिश्ते बहुत प्रगाढ़ रहे हैं। भारत के लोग क्यूबा के लोगों का सम्मान करते हैं तो क्यूबा के लोग भारत के लोगों को भले लोग मानते हैं। एकदौर था जब क्यूबा अनाज के संकट से जूझ रहा था तो भारत के लोगों ने अनाज और खाद्य सामग्रियों से भरा एक जहाज क्यूबा की मदद के लिए भेजा था। आज ऐसी ही पहल की फिर जरूरत है और क्यूबा को नैतिक और भौतिक दोनों मदद की जरूरत है।

The people of India should raise their voice to protect Cuban socialism

कोविडकाल में हम हीनग्रंथि से बाहर निकल कर क्यूबा के विराट मेडिकल ढांचे का लाभ उठा सकते हैं। भारत जिसको अभी बड़े पैमाने पर  वैक्सीनेशन करना है क्यूबा की वैक्सीन उसके लिए मुफीद हो सकती है। भारत सरकार को इसके लिए कदम आगे बढ़ाने चाहिये। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि कई क्षेत्रों में क्यूबा ने समाजवाद के माध्यम से जिन ऊंचाइयों को छुआ है,  भारत के जनमानस को क्यूबा के समाजवाद की रक्षा के लिए आवाज उठानी चाहिए

डा. गिरीश

(लेखक भाकपा उप्र के सचिव हैं।)

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