देश के लिए खतरनाक है सार्वजनिक उपक्रमों की उपेक्षा और उनका निजीकरण

Hastakshep new

Neglect and privatization of PSUs is dangerous for the country

सार्वजनिक उपक्रमों की उपेक्षा और निगमीकरण के रास्ते पर देश

Country on the path of neglect and corporatisation of PSUs

(सार्वजनिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार (Corruption in the public sector), लालफीताशाही, नौकरशाही, अफसरशाही, भाई-भतीजावाद, फिजूलखर्ची को रोकने और इस पर नियंत्रण लगाने के बजाए उसका निजीकरण एवं निगमीकरण करना देशहित में कतई नहीं है, बल्कि देश के लिए खतरनाक भी है)

अब भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) निजीकरण से एक कदम आगे बढ़ते हुए निगमीकरण के रास्ते पर सरपट दौड़ेने के लिए तैयार हो रही है। देश के करोड़ों गांवों, देहातों, किसानों, श्रमिकों, दिहाड़ी मजदूरों, कामगारों, दलितों, पिछड़ों, गरीबों, निर्धनों को निजीकरण एवं निगमीकरण के रास्ते पर रोजी-रोटी, रोजगार एवं उनके आजीविका के साधन उपलब्ध कराने को लेकर सरकार काम कर रही है।

सरकार के पिछले दिनों के फैसलों को देखने से यही लग रहा है, कि अब देश के लिए, देश की जनता के लिए और देश की अर्थव्यवस्था के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों की अधिक उपयोगिता नहीं रह गई है।

स्वतंत्रता के बाद ’मिश्रित अर्थव्यवस्था’ की महत्वपूर्णं नीतियों के तहत एक समाजवादी लोक-कल्याणकारी राज्य की संकल्पनाओं को साकार करने के उद्देश्य की पूर्ति के लिए स्थापित एवं विकसित की गई सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों (PSUs) की, शायद अब देश को अधिक जरूरत नहीं रह गई है, इसलिए सरकार लगातार इनके विनिवेश के निर्णय को सरपट आगे बढ़ाते जा रही है।

छः-सात साल पहले सत्ता में आने के पूर्व यह सरकार नीजिकरण, उदारीकरण, वैश्विकरण, बाजारीकरण, विदेशी निवेश जैसे जिन नीतियों की आलोचना एवं विरोध करती थी, आज धड़ल्ले से उसी रास्ते पर सरपट चलने लगी है। एक कदम और आगे चलकर अब तो देश की आर्थिक नीतियों को निजीकरण से आगे निगमीकरण के द्वारा आगे ले जाना चाहती है। देश की महत्वपूर्णं आर्थिक एवं औद्योगिक कार्य गतिविधियों को निजी क्षेत्रों को सौंपने का विरोध करने वाली सरकार अब देश को ’कार्पोरेट क्षेत्र-घरानों’ को सौंपने को तैयार हो गई है। सरकार का यह कदम देश के लिए एवं देशहित के लिए कितना सही, कितना गलत साबित होगा यह तो वक्त बतलायेगा, बहरहाल सरकार के इस निर्णय को लेकर देश में तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर चल पड़ा है।

सरकार के इस फैसले को लेकर सवाल इसलिए भी उठाया जा रहा है कि अभी देश में कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी के साथ बढ़ रहा है, और ऐसे समय में सरकार कोरोना महामारी से लड़ने, निपटने के बजाय गुपचुप तरीके से अपने छिपे एजेंडे को लागू करने पर काम कर रही है।

How can the government’s decision to privatize be said in the national interest?

वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों में सरकार का निजीकरण का फैसला इसलिए अनुचित, अनुपयोगी एवं अहितकारी है, क्योंकि भारत में आज भी एक-तिहाई जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवननिर्वाह करती है। सरकार के ही विभिन्न एजेंसियों एवं संस्थाओं के अनुसार देश की दो-तिहाई ग्रामीण आबादी का प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति जीवननिर्वाह खर्च 50 रूपए से कम और एक-तिहाई शहरी आबादी का प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति जीवननिर्वाह खर्च 100 रूपए से कम है। ऐसे हालात में सरकार का यह निर्णय देशहित में कैसे कहा जा सकता है ?

विपक्ष का कहना है कि सरकार के पास निजीकरण के रास्ते पर चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है ?

इसका मतलब साफ है कि सरकार कार्पोरेट घरानों के आगे पूरी तरह झुक चुकी है, और सारे निर्णय कार्पोरेट घरानों के इशारे पर किए जा रहे हैं। यह बहुत ही चिंतनीय, निंदनीय है, साथ ही साथ 139 करोड़ जनता के साथ छलावा है। क्या देश की जनता ने इतना बड़ा बहुमत लोकतंत्र को कार्पोरेट घरानों के हाथों गिरवी रखने के लिए दिया था ? सरकार को आने वाले समय में इसका जवाब देना होगा और इसका घोर विरोध होना चाहिए। विपक्ष के अनुसार कोरोना संकट की आड़ में सरकार लगातार जनविरोधी, लोकतंत्र विरोधी निर्णय ले रही है। कोरोना संकट से निपटने में अपनी असफलता को छुपाने के लिए ऐसे फैसले ले रही है, जिनकी इस समय कोई जरूरत नहीं है। 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज के बारे में जो बातें देश को बताई जा रहीं है उसकी तात्कालिक या फौरी तौर से कोरोना संकट या कोविड-19 महामारी से निपटने के रूप में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है। इनकी चर्चा एवं इस पर फैसला बाद में किया जा सकता है। अभी प्रवासी मजदूरों की समस्या का निपटारा करना अधिक जरूरी है।

बहुत महत्वपूर्णं सवाल कि क्या देश के सभी क्षेत्रों का निजीकरण ही एकमात्र रास्ता है ? इसका जवाब है – बिल्कुल नहीं।

सरकार अपने पहले कार्यकाल में निजीकरण को लेकर इतनी मुखर नहीं रही। इस कार्यकाल में निजीकरण को लेकर इतना उतावला होना भारी बहुमत के दुरूपयोग का संकेत है, सरकार की तानाशाही है।

कोरोना संकटकाल में इस तरह की राजनीति सरकार की मंशा पर सवाल करने को विवश करते हैं, कि अभी देश को निजीकरण एवं निगमीकरण की इतनी जरूरत क्यों है ? जबकि कोयला, डिफेंस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में निजीकरण एवं विदेशी पूंजीनिवेश की सीमा बढ़ाने की आवश्यकता ही नहीं है। इससे अडानी, वेदांता, टाटा-पावर, रिलायंस को बड़ा फायदा मिलना तय है। टाटा-पावर, जेएसडब्ल्यू स्टील, जीवीके, हिंडाल्को और जीएमआर जैसी कंपनियों के अलावा अडानी, रिलायंस ग्रुप, वेदांता, हिंडाल्को और कल्याणी जैसे कारोबारी समूह को कोयला, खनिज, रक्षा, बिजली वितरण क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए सरकार निजीकरण कर रही है। औद्योगिक आधारभूत संरचनाओं एवं ढांचों के अपग्रेडेशन, कोयला, खनिज, रक्षा उत्पादन, एयरस्पेस मैनजमेंट, एयरपोर्ट्स, एमआरओ (मेंटनेंस, रिपेयर-ओवरहॉल), केंद्रशासित प्रदेशों में बिजली वितरण कंपनियां, अंतरिक्ष क्षेत्र और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सुधारों के नाम पर निजीकरण एवं निगमीकरण देशहित में सर्वथा अनुचित होगा।

इन सभी क्षेत्रों में हमारी आधारभूत संरचनाएं एवं ढांचे पहले से विकसित हैं, ऐसे में इन क्षेत्रों में निजीकरण एवं निगमीकरण से देश को कुछ मिलने वाला नहीं है, बल्कि इसका पूरा फायदा निजी हाथों को जायेगा। सड़क परिवहन में पीपीपी मॉडल से 4-6-8 लेन सड़कें बनाने से टोल टैक्स का भार किस पर पड़ रहा है ? कौन-कौन इन नाकों में टेक्स देते हैं ? देश में कभी इस पर विचार नहीं किया गया, जबकि इसका सारा बोझ मध्यमवर्ग पर पड़ता है। इन सभी क्षेत्रों में निजीकरण एवं निगमीकरण से बोझ किस वर्ग पर बढ़ेगा या पड़ेगा ? केवल मध्यमवर्ग पर, असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कामगारों, युवाओं पर।

भारत जैसे अर्थव्यवस्था वाले देश, जहां आज भी दो-तिहाई लोग गांव में रहते हैं; के लिए निजीकरण एवं निगमीकरण के रास्ते अपनाने का अर्थ है दो-तिहाई लोगों के साथ पक्षपात करना। याद रहे निजी एवं कार्पोरेट क्षेत्र केवल उन्हीं क्षेत्रों में रूचि लेते हैं जहां उन्हें भारी मुनाफे की उम्मीद होती है।

शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निजीकरण को प्रोत्साहन और बढ़ावा से देश को क्या हासिल हुआ ?

आज कारेाना संकट कालखण्ड में देशहित में कौन सा निजी क्षेत्र काम कर रहा है ? कृषि जमीनों का अधिग्रहण करके ’सेज’ बनाने से कितने किसानों को फायदा हुआ है ? कृषि में निजी कंपनियों को बीज, बीमा, कृषि-उपकरण आपूर्ति का ठेका देने से कितने किसानों का कितना भला हुआ और हो रहा है ? और सबसे बड़ा सवाल कि अभी निजी क्षेत्र की कितने कंपनियों और औद्योगिक कारखानों एवं घरानों ने प्रवारी मजदूरों को लाॅकडाउन कालखण्ड का वेतन भुगतान किया है ? क्यों करोड़ों अंतरराज्जीय प्रवासी मजदूर इस तरह बदहवास अपने घर की ओर भाग रहे हैं ? कितने सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों का लॉकडाउन कालखण्ड का वेतन कटा ? इन सवालों को सरकार से पूछने की जरूरत है। अपने आप समझ आ जायेगा कि निजीकरण एवं निगमीकरण तथा सार्वजनिक क्षेत्र में क्या फर्क है।

इस समय देश की अर्थव्यवस्था के समाधान के लिए सार्वजनिक एवं निजी दोनों क्षेत्रों को साथ लेकर ही चलने की जरूरत है, जैसे कि अभी तक देश मिश्रित अर्थव्यवस्था के साथ चलकर विकास किया है। सार्वजनिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, नौकरशाही, अफसरशाही, भाई-भतीजावाद, फिजूलखर्ची को रोकने, इस पर नियंत्रण लगाने के बजाए उसका निजीकरण एवं निगमीकरण करना बेहद निरर्थक एवं खतरनाक कदम है।

इन कदमों एवं उपायों पर सरकार यदि नियंत्रण कर लेती है तो देश के सार्वजनिक क्षेत्रों के निजीकरण का कोई औचित्य ही नहीं रह जायेगा। कोयला-लौहअयस्क जैसे प्राकृतिक संपदा, साधन एवं संसाधन; रक्षा, सुरक्षा, प्रतिरक्षा; बीमा, बैंकिग, सड़क, रेलपरिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुसंधान, अंतरिक्ष-परमाणु विकास जैसे अतिसंवेदनशील एवं जनसरोकारी क्षेत्रों को निजी एवं कार्पोरेट क्षेत्रों को सौंपना भविष्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

इस समय कृषि क्षेत्र के साथ सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को संभालने एवं पुर्नजीवित करने की आवश्यकता है। कृषि क्षेत्र अकेले 27-30 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। एमएसएमई जिसे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम कहा जाता है, लगभग 13-15 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। मतलब इन दोनों क्षेत्रों में 40-45 करोड़ लोग अपनी आजीविका एवं जीवननिर्वाह के लिए निर्भर हैं। इसलिए इन दोनों क्षेत्रों को सबसे पहले मजबूत करने की आवश्यकता है। आज देश के 8-10 करोड़ अंतरराज्यीय अप्रवासी श्रमिक केवल इसी क्षेत्र में खप सकते हैं। इसके लिए कृषि एवं एमएसएमई के आधारभूत ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है, जो निजी एवं कार्पोरेट क्षेत्र कभी नहीं कर सकता है। यदि सरकार इस क्षेत्र को ध्यान नहीं देगी तो आगामी खरीफ सीजन के बाद देश में बेरोजगारी का संकट गंभीर स्वरूप ले लेगा। इसलिए इस समय सरकार को कृषि और एमएसएमई सेक्टर पर ही पूरा ध्यान फोकस करना चाहिए। इससे बाजार एवं अर्थव्यवस्था में तरलता, खपत एवं मांग बढ़ेगी, तभी अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट सकेगी।

डॉ. लखन चौधरी

Dr Lakhan Choudhary, Sr Professor of Economics Hemchand Yadav University Durg-Chhattisgarh

पाठकों से अपील

“हस्तक्षेप” जन सुनवाई का मंच है जहां मेहनतकश अवाम की हर चीख दर्ज करनी है। जहां मानवाधिकार और नागरिक अधिकार के मुद्दे हैं तो प्रकृति, पर्यावरण, मौसम और जलवायु के मुद्दे भी हैं। ये यात्रा जारी रहे इसके लिए मदद करें। 9312873760 नंबर पर पेटीएम करें या नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑनलाइन भुगतान करें

 

Leave a Reply