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नेपाल डायरी : नेपाल की जनगणना में बहुजन

नेपाल में पहली जनगणना कब हुई?

नेपाल में आजकल जनगणना चल रही है. देश भर से हजारों की संख्या में सरकारी या ठेके पर अथवा संविदा में काम करने को मजबूर कर्मचारी नेपाल सरकार देश के कोने- कोने तक परिचालित किये जा रहे हैं. वैसे तो जनगणना हरेक दस बरस में होने वाली एक सामान्य सी परिघटना है. नेपाल में सबसे पहले जनगणना सन 1911 में हुई थी, जबकि उस समय राज्यसत्ता की बागडोर राणा शासकों के हवाले थी. नेपाल उस दौर में ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का एक संरक्षित राज्य हुआ करता था.

1911 की जनगणना का मुख्य मकसद देश की कुल जनसँख्या का पता लगाना नहीं वरन देश की नौजवान युवा शक्ति का मापन करना था जिससे कि ब्रिटेन हजारों की संख्या में वीर गोरखाली सिपाहियों को अपने विश्वव्यापी साम्राज्य विस्तार के अभियान में खपा सके !

नब्बे के दशक में व्यापक जनविरोध के बाद पंचायत शासन का पतन हो गया और लोकतंत्र नाम की परिघटना के फिर से पुनर्स्थापित होने के बाद 1991 में फिर से जनगणना हुई थी. इस जनगणना ने नेपाली समाज की जातिगत बुनावट को अपेक्षाकृत विस्तृत रूप से संबोधित किया था. मसलन नेपाल में कितनी जातियाँ, जनजातियाँ, हिन्दुओं से इतर समुदाय और उनकी मातृभाषायें और कितने धर्म पाए जाते हैं.

गैर हिन्दुओं से अलग तमाम समुदायों द्वारा किये गए देशव्यापी विरोध के बावजूद राजतंत्र के साए तले पल रही तत्कालीन लोकतांत्रिक सरकार ने अपनी विचारधारा महेंद्रीय राष्ट्रवाद के हवाले से जनगणना का परिणाम घोषित करते हुए कहा था कि नेपाल की बहुसंख्यक जातियाँ/समुदाय हिन्दू हैं, धर्म हिन्दू है और उसकी मातृभाषा नेपाली. अर्थात नेपाल घोषित रूप में एक हिन्दू राज्य है.

सन 2011 में जनगणना के अनुसार नेपाल की जनसंख्या

पिछली बार नेपाल में सन 2011 में जनगणना हुई थी. इस तथ्यांक के अनुसार यहाँ की कुल जनसँख्या 2 करोड़ 65 लाख थी. वहीं उससे ठीक दस साल पहले 2001 की जनगणना के मुताबिक जनसँख्या 2 करोड़ 32 लाख थी. लेकिन अभी वहां चल रही इस जनगणना का ख़ास महत्व है, क्यूंकि यह परिघटना 2008 में हिन्दू राजतन्त्र के शांतिपूर्ण अवसान और 2015 में नेपाल का नया संबिधान घोषित होने के ठीक बाद घटित हो रही है. इस नए संबिधान के अनुसार नेपाल अब एक संघीय राज्य है, साथ ही गणतंत्र भी और सेक्युलर भी.

बाँदा के भारत से नेपाल को देखना बिलकुल नाको चने चबाना जैसा है. यहाँ हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में नेपाल पर खबरें तभी छपती हैं, जबकि फलाने ढेकाने महामहिम प्रधानमंत्री की गद्दी पर आसीन होते हैं या साउथ ब्लाक की अनुकम्पा से सत्ता से बाहर होते हैं, या कि नेपाली सेना के चीफ साहेब भारतीय सेना के मानार्थ जनरल का औपनिवेशिक तमगा हासिल करने के लिए दिल्ली भ्रमण करते हैं. कभी प्राकृतिक विपदा से सम्बन्धित ख़बरें पढ़ने को मिलती हैं अथवा नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत रंजित रे की किताब के बहाने इस बात पर चर्चा कि क्या चीन आजकल काठमांडू में पैर पसार रहा है ???

बहरहाल मेरे बीते अतीत के मानस पटल में नेपाल ही छाया रहा है. भले ही मैं वर्तमान जीवन की इस विशिष्ट परिस्थिति के कारण बरसों से नेपाल नहीं जा पाया हूँ. पर फेसबुक के आभासी नेपाली संसार के साथ जुड़कर पता लगता है कि नेपाल की जनसँख्या में लगभग पचास प्रतिशत के आसपास हिस्सेदारी करने वाले विभिन्न जनजाति समुदायों के बारे में सही जानकारी इकट्ठा करने के सवाल पर राज्य फिर से वही पुरानी परिपाटी अपना रहा है कि नेपाल की बहुसंख्यक जनता हिन्दू है !!!

नेपाल के बहुजन कौन हैं?

नेपाली समाजविज्ञान की कृतियों को सरसरी तौर से पलटने पर पता चलता है कि नेपाली समाज में हिन्दू समुदाय से अलग किरात-मंगोल सभ्यताओं से निकली कई दर्जन जनजातियाँ पायी जाती है, जिनका हिन्दू संस्कृति से अपना एक अलग इतिहासबोध, धर्म, संस्कृति, व रीतिरिवाज हैं. नेपाल के बहुजन यही तो हैं, जो सदियों से ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता के दमन के शिकार रहे हैं. चाहे वो बौद्ध धर्म अनुयायी हों या लिम्बू जनजाति के गुरु फाल्गुनानन्द लिंगदेन द्वारा स्थापित धर्म के अनुयायी इत्यादि.

नेपाल में चल रही जनगणना की यह पूरी कवायद [हिन्दू] “राज्य की पुनर्संरचना” की माया को भी उजागर कर देता है. और साथ ही इस माया से रचित संविधान नाम के कागज के टुकड़े पर उकेरे गए सेक्युलर गणतंत्र की वास्तविकता को भी कि इसका आधार कितना खोखला है.

डॉ पवन पटेल

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डॉ पवन पटेल नेपाली समाजशास्त्र के एक स्वतंत्र भारतीय अध्येता व कवि हैं. नेपाल पर दो पुस्तकें प्रकाशित; “द मेकिंग ऑफ़ ‘कैश माओइज्म’ इन नेपाल” (2019) और “एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी” (2021). सम्प्रति बाँदा में रहकर खेतीबाड़ी करते हैं.

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