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नेपाल डायरी : हमाम में सब नंगे क्या कांग्रेस क्या कम्युनिस्ट और माई लॉर्ड भी

Nepal Bar Association announces sit-in protest demanding Chief Justice Rana’s resignation.

समकालीन नेपाल के सार्वजनिक जीवन (पब्लिक स्पेस) में एक अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित है. करीबन एक महीने से नेपाल की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (Chief Justice of the Supreme Court of Nepal’s highest judicial body) के खिलाफ देश भर के वकीलों का संगठन नेपाल बार एसोसिएशन (Nepal Bar Association) आन्दोलनरत है.

यह मंजर अभूतपूर्व इसलिए भी बन जाता है क्यूँकि वकीलों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश और भूतपूर्व चीफ जस्टिस भी अब उनके कंधे से कन्धा मिला रहे हैं. देश भर की अदालतों में कामकाज ठप्प पड़ा है और वे भी सयुंक्त रूप में माननीय चीफ जस्टिस महोदय चोलेंद्र शमशेर जबरा का इस्तीफ़ा मांग रहे हैं. और यदि वे इस्तीफ़ा देने में आनाकानी करते हैं, तो संसद में उनके खिलाफ महाभियोग लगाकर उन्हें पद से बर्खास्त करने की माँग कर रहे हैं.

बीते गुरुवार से लेकर करीब दो हफ़्तों के बीच ऐसे कई दृश्य उपस्थित हुए हैं, जिनमें पुलिस के जवान काठमांडू स्थित सुप्रीम कोर्ट परिसर में वकीलों को जबरदस्ती घसीटते हुए उन्हें पीट रहे हैं.

जस्टिस जबरा के खिलाफ वकीलों का रोष

जस्टिस जबरा के खिलाफ देश भर के वकीलों का रोष तब शुरू हुआ, जबकि हाल ही में उन्होंने नवनियुक्त प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के मंत्रिमंडल विस्तार के समय उसमें शामिल मंत्रियों के नाम पर सार्वजनिक तौर से असंतोष जाहिर किया.

गौरतलब है कि देउबा के पहले केपी ओली सरकार द्वारा 2015 में बने संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल के नए संविधान में लिखित धाराओं की धज्जियाँ उड़ाकर संसद को विघटन कर देने और फिर से आम चुनाव कराने के इस असंवैधानिक कदम के खिलाफ महीनों चले नागरिक आन्दोलन व जनदबाव के बीच यह चोलेंद्र शमशेर जबरा (Chief Justice Cholendra Shumsher Rana) ही थे, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इस मसले की सुनवाई करते हुए नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा को देश का अगला प्रधानमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त किया था.

सुप्रीम कोर्ट के इसी आदेश में उन्होंने केपी ओली की पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) और प्रचंड नेतृत्व की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) की 2017 में हुई पार्टी एकता को अवैध घोषित कर दिया था. इसके बाद केपी ओली प्रधानमंत्री की कुर्सी गँवा बैठे थे और नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में पाँच दलीय गठबन्धन सत्ता में आया. इसलिए वे इनाम में देउबा सरकार से अपने पारिवारिक स्वजातियों (अपनी पत्नी के बड़े भाई; इत्तफाक से ये जनाब सांसद तक नहीं हैं) को नेपाली कांग्रेस कोटे से मन्त्री बनाने की माँग कर बैठे. साथ ही में वे पांच दलीय सत्ता गठबंधन में साझेदार दो पूर्व कम्युनिस्ट प्रधानमंत्रियों माधव कुमार नेपाल और डॉ बाबूराम भट्टाराई के काल में उनके द्वारा रियल स्टेट भू माफियायों के साथ मिलकर खरबों रुपयों की प्रधानमंत्री निवास बालुवाटार की जमीन औने पौने में बेच देने में हुए व्यापक भ्रष्टाचार से सम्बंधित केस की सुनिवाई करने से आनाकानी कर रहे थे.

नेपाल की अदालतों में व्यापक स्तर में घूसखोरी होती है. क्या न्यायाधीश, क्या वकील, क्या अदालत का अदना सा चपरासी पैसा लिए बिना काम नहीं करता है.

नेपाल में जो भी राजनीतिक पार्टी सत्ता में आती है, वह अपने लोगों को अदालतों से लेकर राजसत्ता के हरेक हिस्से में बैठाती है. और यह परंपरा आज की नहीं है. राणा काल से लेकर राजा महेंद्र द्वारा स्थापित निरंकुश पञ्चायती व्यवस्था और 1990 के दशक में स्थापित बहुदलीय प्रजातंत्र (Multi-Party Democracy) के समय में भी यह संरचनागत विकृति जड़ जमा कर बैठी रही. आज जबकि नेपाल संघीयता और गणतंत्र के युग में प्रवेश कर गया है, इसीलिए इस सवाल पर बहस होनी लाज़िमी है.

गुजरे जमाने के नेपाली समाजशास्त्री डोर बहादुर बिष्ट (Dor Bahadur Bista) ने नव्वे के दशक में लिखी गयी अपनी बहुचर्चित किताब “फैटलिज्म एंड डेवलपमेंट: नेपाल्स स्ट्रगल फॉर मॉडर्नाइजेशन” (Fatalism and Development: Nepal’s Struggle for Modernization) में इसी विकृति की ओर इशारा करते हुए कहा था कि नेपाली राजसत्ता के सर्वेसर्वा जब तक “आफ्नो मान्छे” (अपने आदमी) वाली प्रवत्ति से मुक्त नहीं होते, तब तक नेपाली समाज का समुन्नत विकास असंभव है.

राजसत्ता के तीन अंग हुआ करते हैं, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका. इसके बेहतर ढंग से कामकाज के लिए इन तीनों अंगों का एक दूसरे के साथ समन्वय जरुरी है. जस्टिस जबरा को लेकर उठे देशव्यापी सवाल ने यह सिद्ध कर दिया है कि नेपाल का संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र कितना निरीह और पंगु है. जस्टिस जबरा प्रकरण पर नेपाल के तमाम राजनैतिक दलों (क्या कांग्रेस और क्या कम्युनिस्ट) की चुप्पी यह बताती है कि हमाम में सब नंगे हैं.

डॉ पवन पटेल

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(लेखक नेपाली समाजशास्त्र के एक स्वतंत्र भारतीय अध्येता व कवि हैं. नेपाली वामपंथी आन्दोलन पर दो पुस्तकें प्रकाशित; “द मेकिंग ऑफ़ ‘कैश माओइज्म’ इन नेपाल: ए थाबांगी पर्सपेक्टिव” (2019) और “एक स्वयं भू कवि की नेपाल डायरी” (2021). सम्प्रति बाँदा में रहकर खेतीबाड़ी करते हैं.)

Web title – Nepal diary: in the hammam everyone is naked, what is Congress, what is communist and even My lord

Bar ups the ante as court crisis deepens. Lawyers not to let Rana enter office

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