फैटी लीवर उपचार के लिए कुटकी पौधे के अर्क से निर्मित नई दवा

फैटी लीवर उपचार के लिए कुटकी पौधे के अर्क से निर्मित नई दवा

नई दिल्ली, 03 मार्च : यकृत सिरोसिस और यकृत कैंसर के लिए जिम्मेदार नॉन अल्कोहोलिक फैटी लीवर रोग (एनएएफएलडी) एक महामारी की तरह फैल रहा है। पूरी दुनिया के शोधकर्ता इस रोग के लिए बेहतर उपचार खोजने में जुटे हुए हैं।

कुटकी के अर्क से विकसित हुई है नई दवा | What is Kutki called in English? (कुटकी को अंग्रेजी में क्या कहते हैं?)

भारतीय शोधकर्ताओं ने कुटकी (Picrorhiza Kurroa) पौधे के अर्क से ‘पिक्रोलिव’ नामक एक नई दवा विकसित की है, जिससे फैटी लीवर रोगियों का उपचार (treatment of fatty liver patients) किया जा सकेगा।

शोधकर्ताओं का कहना है कि पिक्रोलिव’ दवा लीवर में वसा की मात्रा और उसके बाद की जटिलताओं को कम कर सकती है।

वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की लखनऊ स्थित घटक प्रयोगशाला सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआई) के शोधकर्ताओं द्वारा ड्रग कंट्रोलर जनरल इंडिया (डीसीजीआई) के फाइटोफार्मास्युटिकल मोड के अंतर्गत यह मानकीकृत दवा विकसित की गई है।

इस संबंध में जारी एक वक्तव्य में संस्थान के निदेशक डॉ. डी. श्रीनिवास रेड्डी ने कहा है कि सीएसआईआर-सीडीआरआई को गैर-अल्कोहोलिक फैटी लीवर रोग (एनएएफएलडी) से ग्रस्त रोगियों में ‘पिक्रोलिव’ के तृतीय चरण के नैदानिक ​​परीक्षण की नियामक अनुमति मिल गई है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के सहयोग से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली; यकृत और पित्त विज्ञान संस्थान (आईएलबीएस), नई दिल्ली; स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़; किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल (केईएम), मुंबई; निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (निम्स), हैदराबाद; और किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), लखनऊ समेत छह अस्पतालों के मरीजों पर इस दवा का परीक्षण किया जाएगा।

एनएएफएलडी क्या है?

नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग (non-alcoholic fatty liver disease एनएएफएलडी) शराब (अल्कोहल) का सेवन नहीं करने वाले लोगों में अतिरिक्त चर्बी जमा होने से होता है।

एनएएफएलडी; मानव इतिहास में जिगर (यकृत) की सबसे अधिक प्रचलित की बीमारी है। अनुमान है कि यह रोग विश्व स्तर पर लगभग दो अरब लोगों को प्रभावित करता है। भारत में सामान्य जनसंख्या के लगभग 25-30% हिस्से में इस रोग के होने की आशंका है।

साइलेंट किलर है एनएएफएलडी (NAFLD is the silent killer)

सीएसआईआर-सीडीआरआई के चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. विवेक भोसले ने बताया कि मोटे व्यक्तियों या मधुमेह से ग्रस्त लोगों में यह समस्या आमतौर पर देखी जाती है। उनका कहना है कि इस रोग के कोई विशेष लक्षण नहीं होते हैं, जिसकी वजह से इसे साइलेंट किलर भी कहते हैं। हालांकि, कुछ मरीजों में सामान्यतः पेट में दर्द हो सकता है, जो पेट के मध्य या दाहिने ऊपरी हिस्से में केंद्रित हो सकता है। इसके अलावा, थकान और कमजोरी भी हो सकती है। कुछ मामलों में लीवर बड़ा हो सकता है।

यकृत पर फैटी जमाव निदान कैसे करें? (How to diagnose fatty deposits on the liver?) | जिगर पर फैटी जमा का निदान कैसे करें? |

पेट का अल्ट्रासाउंड यकृत पर फैटी जमाव को दिखा सकता है और निदान की पुष्टि कर सकता है। रक्त परीक्षण में यकृत एंजाइमों, जैसे- एस्पार्टेट ट्रांसएमिनेस (एएसटी) और एलानिन ट्रांसएमिनेस (एएलटी) की हल्की अधिकता पायी जाती है। हालांकि, कई मामलों में रक्त परीक्षण भी सामान्य हो सकता है। इनमें से कुछ लोगों को नॉन-अल्कोहलिक स्टीटोहेपेटाइटिस, या एनएएसएच – जो फैटी लीवर बीमारी का विकसित रूप है, हो सकता है, जिसमें लीवर में लगातार बढ़ने वाली सूजन एवं घाव के निशान बन जाते हैं, जो आगे चलकर लीवर कैंसर में भी बदल सकते हैं।

सीडीआरआई द्वारा पिक्रोलिव के हेपेटोप्रोटेक्टिव सक्रियता हेतु पूर्व में किए गए नैदानिक ​​​​परीक्षण सफल रहे हैं। इन परीक्षणों में प्लेसीबो की तुलना में क्लीनिकल रिकवरी में तेजी देखी गई है एवं बिलीरुबिन और एसजीपीटी के स्तर में गिरावट पायी गई है।

वर्तमान परीक्षण में एमआरआई द्वारा लीवर में वसा की मात्रा का आकलन किया जा रहा है। परीक्षण के दौरान मरीजों को छह महीने तक दिन में दो बार पिक्रोलिव 100 मि.ग्रा. कैप्सूल दिया जाएगा।

​परीक्षण में लीवर एंजाइम, रोगी की भूख और जीवन की गुणवत्ता का भी मूल्यांकन किया जाएगा। यह दवा तीसरे चरण के क्लिनिकल परीक्षण के पूरा होने के बाद व्यापक उपयोग के लिए उपलब्ध होगी।

फाइटोफार्मास्युटिकल दवा क्या है? (What is a phytopharmaceutical drug?)

किसी औषधीय पौधे अथवा उसके किसी हिस्से से प्राप्त परिष्कृत और मानकीकृत अंश, जिसमें न्यूनतम चार जैव-सक्रिय या फाइटोकेमिकल यौगिक उपस्थित हों; तथा जिसका उपयोग किसी रोग के निदान, उपचार, शमन, या विकार की रोकथाम के लिए आंतरिक या बाह्य रूप से होता है, उसे एक फाइटोफार्मास्युटिकल औषधि के रूप में परिभाषित किया जाता है।

पिक्रोलिव एक फाइटोफार्मास्युटिकल दवा है और पिक्रोराईजा कुरोआ (कुटकी) का एक मानकीकृत अर्क है, जिसमें चार मार्करों की पहचान की गई है।

प्रयोगशाला जंतुओं में हेपेटोप्रोटेक्टिव प्रभाव के लिए मार्करों का भी परीक्षण किया गया है। फैटी लीवर के जन्तु मॉडल में दवा ने उत्कृष्ट परिणाम दिखाए हैं। वसा की मात्रा में कमी देखी गई है और लीवर एंजाइम में भी सुधार देखा गया है। यह दवा अतिरिक्त इन्फ्लेमेटरी गतिविधियों के साथ एंटी-ऑक्सीडेंट तंत्र पर काम करती है।

यह वसा संचय के लिए जिम्मेदार यकृत के विभिन्न मार्गों को भी प्रभावित करती है। इस उत्पाद को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया द्वारा फाइटोफार्मास्युटिकल दवा के रूप में अनुमोदित किया गया है।

कुटकी क्या होती है?

पिक्रोराईजा कुरूआ (कुटकी) का पौधा एक छोटी बारहमासी जड़ी-बूटी है, जो उत्तर पश्चिम भारत में हिमालय की ढलानों पर 3000 से 5000 मीटर के बीच उगती है। इस पौधे की खेती हिमाचल प्रदेश के चंबा और शिमला जिले के खेतों में किए जाने की योजना है। पालमपुर स्थित राष्ट्रीय प्रयोगशाला सीएसआईआर-आईएचबीटी पौधे की जड़ों की कैप्टिव खेती और प्रसंस्करण करेगा। जबकि, मार्क फार्मास्यूटिकल्स, लखनऊ नैदानिक ​​परीक्षण के लिए जीएमपी शर्तों के तहत कैप्सूल बनाएगा।

इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं में सीएसआईआर-सीडीआरआई के डॉ विवेक भोसले, डॉ कुमारवेलु जे., डॉ मनीष चौरसिया, डॉ जिया उर गाईन, डॉ शशिधर, डॉ शरद शर्मा एवं डॉ एस.के. रथ; और सीएसआईआर-आईएचबीटी के शोधकर्ता डॉ. दिनेश शर्मा एवं डॉ. अमित कुमार शामिल हैं।

इसके अलावा, आईएलबीएस के निदेशक डॉ शिव कुमार सरीन एवं डॉ मनोज कुमार शर्मा; एम्स के शोधकर्ता डॉ शालीमार; केजीएमयू के डॉ सत्येंद्र सोनकर एवं डॉ अजय कुमार; निम्स, हैदराबाद की शोधकर्ता डॉ उषा रानी एवं ​​डॉ बी. सुकन्या; केईएम के शोधकर्ता डॉ भास्कर कृष्णमूर्ति, डॉ आकाश शुक्ला; पीजीआईएमईआर से डॉ नुसरत शफीक, और केएचएस-एमआरसी, मुंबई से डॉ अजय दुसेजा, डॉ अश्विन राउत एवं जयश्री जोशी अध्ययन में शामिल हैं।

(इंडिया साइंस वायर)

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