Home » हस्तक्षेप » आपकी नज़र » नया साल, कई सवाल
Welcome New Year 2020

नया साल, कई सवाल

New year many questions

सन‍् 2019 इतिहास हो गया है और नया साल शुरू हो चुका है। अक्सर नये साल की शुरुआत से पहले हम अपने आप से नये वायदे करते हैं और यह तय करते हैं कि नये साल में हम नया क्या करना चाहते हैं। नये साल के लिए अपने सपने तय करना इसलिए आवश्यक है ताकि हम अपने लक्ष्य निर्धारित कर सकें और यह तय कर सकें कि वे लक्ष्य पाने के लिए हमें किस दिशा में आगे बढ़ना है, कितनी गति से आगे बढ़ना है ताकि हम निश्चित समय सीमा के भीतर उन सपनों को सच कर सकें। आज हमारे सामने कई चुनौतियां दरपेश हैं। समाज में विषमता बढ़ती जा रही है और अब यह केवल एक स्थान पर आर्थिक विषमता तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि भौगोलिक रूप से भी यह एक नई समस्या के रूप में उभर रही है जिस पर शायद किसी का ध्यान नहीं जा रहा है।

दक्षिणी राज्यों ने बहुत बार यह शिकायत की है कि उत्तरी राज्यों में प्रति व्यक्ति आय के मुकाबले वहां प्रति व्यक्ति आय अधिक है और इसी कारण से उन्हें केंद्र से सहायता राशि कम मिलती है जिसका अर्थ यह है कि उन्हें अच्छा काम करने की सज़ा मिल रही है। हालांकि केंद्र में एनडीए की सरकार आने के बाद इस स्थिति में कुछ बदलाव आया है लेकिन दक्षिणी राज्यों की प्रगति को समझे बिना हम अब सामने आ रही समस्या की विकरालता को नहीं समझ पायेंगे।

पूर्वी और उत्तरी राज्यों की जनसंख्या अधिक है जबकि वहां रोज़गार नहीं हैं, दक्षिणी राज्यों में रोज़गार हैं लेकिन जनसंख्या कम है, यानी, जहां श्रम-शक्ति है वहां रोज़गार नहीं हैं और जहां नये रोज़गार उत्पन्न हो रहे हैं वहां की जनसंख्या कम है। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश और बिहार से बहुत से लोग कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों में जाकर बस रहे हैं। केरल की स्थानीय आबादी कम है। उत्तर प्रदेश और बिहार से लोग वहां पलायन कर रहे हैं। उन्हें वहां रोज़गार मिल रहा है। समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार आदि राज्यों से दक्षिणी राज्यों में पलायन करने वाले बहुसंख्य लोग पुरुष हैं।

उत्तर प्रदेश और बिहार से पढ़े-लिखे कुंआरे युवक रोज़गार की तलाश में दक्षिणी राज्यों में जाकर बस रहे हैं और उनमें से बहुत से युवक स्थानीय युवतियों से शादी कर रहे हैं। इसके दो परिणाम हैं। पहला, दक्षिणी राज्यों में धीरे-धीरे हिंदी बोलने-समझने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है, दूसरा अन्य प्रदेशों से आये लोग दक्षिणी राज्यों में रोज़गार प्राप्त कर रहे हैं और धीरे-धीरे वहां उनका वर्चस्व बढ़ रहा है। इससे भविष्य में एक सांस्कृतिक संघर्ष की आशंका घर कर रही है।

Why did terrorism come in Assam

असम में आतंकवाद इसलिए आया क्योंकि स्थानीय लोगों के पास रोज़गार नहीं था। चाय के बागान और काला सोना माने जाने वाले खनिज पेट्रोल पर बाहरी लोगों का अधिकार था, रोज़गार में बंगालियों की बहुतायत थी और बंगाली लोग स्वयं को उनसे श्रेष्ठ मानते थे। ऐसा ही मुंबई में हुआ जहां शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने अन्य राज्यों से आये लोगों का विरोध करना शुरू किया। मुंबई में चूंकि धन का प्रवाह अधिक है और स्थानीय लोगों में अमीरों की भी कमी नहीं है, इससे वे लोग काम धंधे में मसरूफ रहे और आंदोलन अपेक्षाकृत सीमित होता चला गया, लेकिन दक्षिणी राज्यों में अन्य राज्यों के लोगों की संख्या बढ़ते जाने से धीरे-धीरे सांस्कृतिक संघर्ष की आशंका घनी होती जा रही है।

यह हैरानी की बात है कि इस महत्वपूर्ण बदलाव की ओर न बुद्धिजीवी, न मीडिया और न ही सरकार ध्यान दे रही है।

केंद्र सरकार इस बदलाव से पूरी तरह अनजान नज़र आती है और ऐसा नहीं लग रहा है कि जब तक यह समस्या विकराल रूप धारण करके आग बन जाए, तब तक इसके समाधान के लिए प्रशासन कुछ सोचेगा। समस्या यह है कि जब प्रशासन नींद से जागेगा तब तक यह समस्या इतनी विकराल हो चुकी होगी कि इसका समाधान आसान नहीं रह जाएगा।

हम आपसी संघर्ष में इस कदर उलझे हुए हैं कि अपने ही जीवन को संकट में डाल रहे हैं।

एक ओर जहां पुरानी कांग्रेस सरकारों ने वोट की खातिर अल्पसंख्यक समुदाय को आवश्यकता से अधिक अधिमान देकर बहुसंख्यक वर्ग को निराश और नाराज़ किया, वहीं वर्तमान भाजपा सरकार दक्षिणपंथी नीतियों के कारण अल्पसंख्यकों में भय की भावना भर रही है। बहुसंख्यक समाज अपना अधिकार वापिस लेने के लिए उतावला है और अल्पसंख्यक समाज अपनी सुविधाओं को छोड़ने को तैयार नहीं है। यह खेद का विषय है कि हम नीति कथाओं की शिक्षा भुलाए दे रहे हैं। कठिनाई भरे दिनों में एक-दूसरे का साथ देकर ही हम जिंदा रह सकते हैं। दूरियां और अविश्वास दोनों समुदायों के लिए घातक हैं।

किसी भी समाज की उन्नति का तरीका यही है कि वह भविष्य की संभावनाओं ही नहीं, समस्याओं को भी ध्यान में रखे और तद‍्नुसार नीतियां तय करे।

जो समाज भविष्य के लिए तैयार नहीं होता है उसका हश्र डायनासोर जैसा हो जाता है जो अपनी असीम शारीरिक ताकत के बावजूद इतिहास हो गये।

समाज में होने वाले इन बदलावों के प्रति सचेत रह कर आवश्यक कदम उठाने में ही हमारी भलाई है। समाज की विषमताओं पर चर्चा आवश्यक है। बुद्धिजीवी, मीडिया, सामाजिक संस्थाएं और सरकार मिल कर इस दिशा में विमर्श करेंगे तो समस्या भी अवसर बन जाएगी और यदि हम इन बदलावों की उपेक्षा करेंगे तो ये किसी दिन ज्वालामुखी बन जाएंगे और समाज को जला डालेंगे।

एक दूसरे की क्षमताओं से लाभान्वित होना और आपसी विषमताओं से तालमेल बैठाना ही इसका उपाय है, इसके लिए हमें अपने दृष्टिकोण का विस्तार करना होगा, खुद को ज़्यादा सहनशील बनाना होगा और सिर्फ अपने लिए सोचने के बजाए समूचे समाज के लिए सोचना होगा। एक सभ्य संस्कृति और उन्नत देश के रूप में हम तभी फल-फूल सकते हैं यदि हम प्रकृति के इस मूलभूत नियम को समझें और उसे जीवन में उतारें वरना हमारा हाल भी कृष्ण की उस यादवी सेना जैसा होगा जो आपस में ही लड़ मरी और समाप्त हो गई।

हमारा देश अतीत में लंबे समय तक आतंकवाद का दंश झेल चुका है। जनता की नाराज़गी आंदोलन बन जाए और फिर वह हिंसक हो जाए, इससे अच्छा है कि उसे शुरू में ही सुलझा लिया जाए। सामाजिक संस्थाएं इसमें बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। आशा करनी चाहिए कि नये साल में इस पर चर्चा होगी, सहमति बनेगी और नये साल के इस सवाल का हल निकलेगा।  ***

पी. के. खुराना

“दि हैपीनेस गुरू” के नाम से विख्यात, पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वे मीडिया उद्योग पर हिंदी की प्रतिष्ठित वेबसाइट “समाचार4मीडिया” के प्रथम संपादक थे।

सन् 1999 में उन्होंने नौकरी छोड़ कर अपनी जनसंपर्क कंपनी “क्विकरिलेशन्स प्राइवेट लिमिटेड” की नींव रखी, उनकी दूसरी कंपनी “दि सोशल स्टोरीज़ प्राइवेट लिमिटेड” सोशल मीडिया के क्षेत्र में है तथा उनकी एक अन्य कंपनी “विन्नोवेशन्स” देश भर में विभिन्न राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों के लिए कांस्टीचुएंसी मैनेजमेंट एवं जनसंपर्क का कार्य करती है। “दि हैपीनेस गुरू” के अपने नाम को चरितार्थ करते हुए उन्होंने अपनी नई कंपनी “फ्लाई अनलिमिटेड वर्ल्डवाइड” के माध्यम से खुश रहने और तनावमुक्त जीवन जीने की कला सिखाना आरंभ किया है, इसके लिए वे नियमित रूप से कार्यशालाओं का आयोजन करते हैं। एक नामचीन जनसंपर्क सलाहकार, राजनीतिक रणनीतिकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर होने के साथ-साथ वे स्तंभकार भी हैं और लगभग हर विषय पर कलम चलाते हैं।  v

 

हमारे बारे में hastakshep

Check Also

How many countries will settle in one country

पलायन – एक नयी पोथेर पाँचाली

नदी में कटान बाढ़ में उफान डूब गया धान भारी है लगान आए रहे छोर …

Leave a Reply