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अगले 6 महीनों में दक्षिण एशिया में 4 लाख बच्चों की मौत होगी जिसमें 3 लाख अकेले भारत के होंगे : शोध

कोविड-19 के दौर में नवजात शिशुओं की मौत

Newborns died in COVID-19 era

कोविड-19 का नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर कोई व्यापक प्रभाव (COVID-19’s Comprehensive Effect on Health of Newborns,) पड़ रहा है क्योंकि लगभग हरेक देश की स्वास्थ्य सेवा पूरी तरह से इस समय कोविड-19 के मरीजों पर केन्द्रित हो गई है, और गर्भवती महिलाओं की देखभाल, नवजात शिशुओं की देखभाल और इनका टीकाकरण कार्यक्रम भी पूरी तरह से उपेक्षित हो गया है. यूनिसेफ के अनुसार केवल इस लापरवाही के कारण इस समय दुनिया में पांच वर्ष से कम उम्र के 6000 बच्चे प्रतिदिन मर रहे हैं. यह संख्या इस आयुवर्ग के बच्चों की सामान्य मृत्युदर से अलग है. यूनिसेफ के अनुसार यदि स्वास्थ्य सेवाएं कोविड-19 पर ऐसे ही केन्द्रित रहीं तो बच्चों के मौतों का यह सिलसिला अगले 6 महीने तक जारी रहेगा.

4 lakh children will die in South Asia in the next 6 months of which 3 lakh will be from India alone: Research

लांसेट ग्लोबल हेल्थ नामक जर्नल के हाल के अंक में यह शोधपत्र प्रकाशित किया गया है, और इसे जॉन होपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ के वैज्ञानिकों ने लिखा है. इसके अनुसार फेमिली प्लानिंग, प्रसव, नवजात शिशु की देखभाल और टीकाकरण की स्वास्थ्य सेवाओं द्वारा उपेक्षा के कारण अगले 6 महीनों के दौरान पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सामान्य मृत्यु दर के अतिरिक्त दुनियाभर में लगभग 12 लाख बच्चों की मृत्यु होगी.

शोधपत्र के अनुसार शिशु की देखभाल के मामले में दुनिया एक दशक पीछे पहुँच जायेगी, और यह नवजात शिशुओं के सन्दर्भ में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सबसे बुरा दौर है. कई देशों में इसका असर भी दिखने लगा है, इंग्लैंड में नवजात शिशुओं में खसरा (Measles in newborns) तेजी से फैलने लगा है.

शोधपत्र के अनुसार बच्चों की सबसे अधिक बदहाली बांग्लादेश, ब्राज़ील, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, पकिस्तान और यूगांडा जैसे गरीब या मध्य आय वाले देशों में है.

अगले 6 महीनों में केवल दक्षिण एशिया में 4 लाख बच्चों की मौत होगी जिसमें 3 लाख बच्चे अकेले भारत के होंगे. दक्षिण एशिया के देशों में सम्मिलित तौर पर केवल लापर्वाहेई और उपेक्षा के कारण लगभग 2400 बच्चो की मौत प्रतिदिन होगी.

इस शोधपत्र में स्वास्थ्य सेवाओं द्वारा गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में लापरवाही और उपेक्षा का अलग-अलग स्तर पर भी आकलन किया गया है.

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महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
महेंद्र पाण्डेय Mahendra pandey लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

गरीब और माध्यम आय वाले देशों में यदि गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में 15 प्रतिशत तक लापरवाही बरती जाती है, तब पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 9.8 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो जायेगी और महिलाओं की प्रसवकालीन मृत्यु में 8.3 प्रतिशत की बृद्धि होगी. यदि स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा का स्तर 45 प्रतिशत तक पहुँच जाए तब बच्चों की मृत्यु दर में 44.7 प्रतिशत और गर्भवती महिलाओं की मृत्यु दर में 38.6 प्रतिशत तक बृद्धि हो जायेगी.

इस दौर में गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं का पोषण भी प्रभावित हो रहा है, क्योंकि अधिकतर सेवायें ठप्प हैं, और लॉकडाउन के कारण कहीं आना-जाना कठिन है. सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम रोक दिया गया है, और प्राइवेट अस्पतालों में भी कोविड-19 के दौर में लोग अपनी सामान्य समस्याओं को लेकर जाने से बच रहे हैं क्योंकि संक्रमण का डर है. जाहिर है कोविड-19 केवल इस पीढ़ी को ही नहीं बल्कि भावी पीढ़ी को भी बुरी तरीके से प्रभावित कर रहा है.

महेंद्र पाण्डेय

 

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