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दरारें : प्यार करना और जीना उन्हें कभी नहीं आएगा जिन्हें ज़िंदगी ने बनिया बना दिया

धूल, धुआं, धूसरित करती दरारें

हरियाणवी फिल्म दरारेंकी समीक्षा | विजेता दहिया की फिल्म ‘दरारें’ को लेकर आपकी क्या समीक्षा है?

प्यार करना और जीना उन्हें कभी नहीं आएगा जिन्हें ज़िंदगी ने बनिया बना दिया।पंजाबी भाषा के सुप्रसिद्ध कवि की लिखी इन पंक्तियों के साथ शुरू होने वाली ताजा तरीन एम एक्स प्लेयर पर रिलीज़ हुई हरियाणवी फिल्म दरारेंहमारे भारत देश के गांवों की हक़ीक़तों को क़ायदे से बयां करती है।

फिल्मों और साहित्य में गांव

हम फिल्मों में और साहित्य में गांवों के बारे में काफी कुछ अच्छा-अच्छा देख, सुन और पढ़ चुके हैं लेकिन ऐसा बहुधा होता नहीं है कि हमें गांवों की हकीकत भी सिनेमा दिखाए। इससे पहले मुझे याद आती है तो रुई का बोझहिंदी सिनेमा में कुछ इसी तरह की कहानी पर बनी फ़िल्म थी।

हालांकि यहां कहानी थोड़ा अलग है लेकिन उससे मिलती जुलती कहें या कहें उसकी याद दिलाती है बार-बार तो कहना गलत नहीं होगा।

खैर तीन भाई हैं, हरियाणा के किसी गांव में रहते हैं। नाम है दिलबाग, सुनील, रमेश। दिलबाग ने जैसे-तैसे पेट काटकर छोटे भाईयों को काबिल बनाया। उनके हर सुख-दुःख में साथ निभाया, लेकिन एक दिन जरा सी बात पर घर में बड़े दो भाईयों की लुगाई में झड़प हो गई। बात बंटवारे तक आ गई। मंझले भाई ने घर की खाट, बिस्तर, बर्तन, चमचे तक बांट लिए। इधर छोटा भाई शहर से गांव आया मिलकर चला गया लेकिन साथ ही एक चिठ्ठी छोड़ गया।

क्या है उस चिठ्ठी में, क्या छोटे भाई ने भी अपना हिस्सा लिया? या क्या छोटे भाई ने बड़े भाई का साथ दिया या वह भी मंझले जैसा निकला? जिसने घर में रिश्तों को धूल, धूसरित कर धुआं-धुआं कर दिया। या क्या मंझले का भी दिल मोम हुआ? बड़े भाई और भाभी के त्याग, समर्पण, प्रेम का सिला उन्हें कितना और किस तरह मिला? ये सब आपको इस भावुक करने वाली हरियाणवी फिल्म में देखने को मिलता है।

हरियाणा में एक खास बात है इसकी रागनियां, कुश्ती, खेतों में बहने वाले खाले और बोरिंग का पाणी, नदी, तलाब। फ़िल्म में जब-जब ये सीन आते हैं तो ग्रामीण इलाकों के ये दृश्य तथा उस समय की कहानी प्यारी लगने लगती है। और दर्शक सोचते हैं कि काश ये सब ऐसा ही चलता रहता तो कितना सही रहता। लेकिन दुःखों में उलझती यह कहानी बीच में जब सुकून के पल आपको परोसती है थाली में आपके तो, आपकी जो आंखें नम होती हैं इस फ़िल्म को देखते हुए, दरअसल उन्हें ही पोंछने का मौका देती है।

घर बंट गया, बँटगी जमीन

फ़िल्म में लोकगीत ल्यादे ऊंटणी‘ , ‘सास मेरी मटकणी नैबेहद प्यारे, कर्णप्रिय लगते हैं। तो वहीं भर कै आया जी‘ , घर बंट गया, बँटगी जमीन आपको भावुक करता है, आखों में पानी आ जाए ऐसे गीतों को सुनकर, देखकर तो गीत लिखने वालों और उसे गाने वालों की सार्थकता पूरी हो जाती है।

एक्टिंग के मामले में बड़ी भाभी के रूप में स्वाति नांदल‘, भाई दिलबाग के रूप में नरेश चाहरसबसे ज्यादा बेहतर अभिनय करते नजर आए। मंझले भाई सुनील के रूप में विजय दहिया‘, मंझली भाभी के रूप में ज्योति मानतथा सबसे छोटे भाई के रूप में निर्देशक स्वयं प्रभावी लगे लेकिन इक्का, दुक्का जगहों पर ये सभी मिलाजुला असर छोड़ते हैं। 

लेखक, निर्देशक, एडिटर, सिनेमैटोग्राफर, कलरिंग सभी डिपार्टमेंट जब निर्देशक ने अपने हाथ में ले रखे हों तो उसमें होने वाली छोटी-मोटी गलतियां भी अखरती हैं। कैमरामैन कैमरे से खूबसूरत दृश्य तो कैद करते हैं लेकिन कुछ जगहों पर कैमरा भी सुधार की गुंजाईश छोड़ता है। बैकग्राउंड स्कोर बढ़िया रहा थोड़ा सा लेकिन उसका स्तर और बढ़ाया जाता, हंसाने वाले दृश्य में और आंखें नम करने वाले हिज्जों में यह थोड़ा और उठा होता तो फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी। कहानी तथा एडिटिंग के लिहाज से फ़िल्म कसी हुई लगती है। कुलमिलाकर निर्देशक अपनी पहली ही फ़िल्म के साथ एक सार्थक सिनेमा परोसते हैं। तथा भारत के ग्रामीण इलाकों की हक़ीक़त एवं उनमें घटने वाली कहानी को भी कायदे से दिखा पाने में सफल होते हैं।

तेजस पूनियां

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हमारे बारे में तेजस पूनियां

तेजस पूनियां लेखक फ़िल्म समीक्षक, आलोचक एवं कहानीकार हैं। तथा श्री गंगानगर राजस्थान में जन्में हैं। इनके अब तक 200 से अधिक लेख विभिन्न राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। तथा एक कहानी संग्रह 'रोशनाई' भी छपा है। प्रकाशन- मधुमती पत्रिका, कथाक्रम पत्रिका ,विश्वगाथा पत्रिका, परिकथा पत्रिका, पतहर पत्रिका, जनकृति अंतरराष्ट्रीय बहुभाषी ई पत्रिका, अक्षरवार्ता अंतरराष्ट्रीय मासिक रिफर्ड प्रिंट पत्रिका, हस्ताक्षर मासिक ई पत्रिका (नियमित लेखक), सबलोग पत्रिका (क्रिएटिव राइटर), परिवर्तन: साहित्य एवं समाज की त्रैमासिक ई-पत्रिका, सहचर त्रैमासिक पीयर रिव्यूड ई-पत्रिका, कनाडा में प्रकाशित होने वाली "प्रयास" ई-पत्रिका, पुरवाई पत्रिका इंग्लैंड से प्रकाशित होने वाली पत्रिका, हस्तक्षेप- सामाजिक, राजनीतिक, सूचना, चेतना व संवाद की मासिक पत्रिका, आखर हिंदी डॉट कॉम, लोक मंच, बॉलीवुड लोचा सिने-वेबसाइट, साहित्य सिनेमा सेतु, पिक्चर प्लस, सर्वहारा ब्लॉग, ट्रू मीडिया न्यूज डॉट कॉम, प्रतिलिपि डॉट कॉम, स्टोरी मिरर डॉट कॉम, सृजन समय- दृश्यकला एवं प्रदर्शनकारी कलाओं पर केन्द्रित बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय द्वैमासिक ई- पत्रिका तथा कई अन्य प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स, वेबसाइट्स, पुस्तकों आदि में 300 से अधिक लेख-शोधालेख, समीक्षाएँ, फ़िल्म एवं पुस्तक समीक्षाएं, कविताएँ, कहानियाँ तथा लेख-आलेख प्रकाशित एवं कुछ अन्य प्रकाशनाधीन। कई राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में पत्र वाचन एवं उनका ISBN नम्बर सहित प्रकाशन। कहानी संग्रह - "रोशनाई" अकेडमिक बुक्स ऑफ़ इंडिया दिल्ली से प्रकाशित। सिनेमा आधारित संपादित पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य -अमन प्रकाशन (कानपुर) अतिथि संपादक - सहचर त्रैमासिक पीयर रिव्यूड पत्रिका

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