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अभिनय का वट वृक्ष या प्रशांत महासागर दिलीप कुमार

भारत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के निधन पर त्वरित प्रतिक्रिया !

Quick reaction to the demise of Dilip Kumar, the acting emperor of India!

स्वाधीनता की पचासवीं वर्षगांठ पर मुझे यह कहने में कोई कुंठा नहीं कि आजादी की आगामी दो सौंवी वर्षगाँठ तक भारत माता की कोख से शायद ही युसूफ खान जैसा कोई अभिनय सपूत जन्म ले सकेगा. सिर्फ अभिनय के जोर से राज कपूर जैसे प्रतिभाधर के साथ नाम उच्चारित करवाने वाला कोई दिलीप ही हो सकता है. इनकी क्या तारीफ करूँ, अल्फाज़ नहीं सूझते. अभिनय का वट वृक्ष कहूं या प्रशांत महासागर!

स्वर्गीय बलराज साहनी ने कहा है, ’जब किसी भारतीय अभिनेता के लिए मुश्किल क्षण आता है तो वह दिलीप साहब की कॉपी करता है’.

राजेन्द्र, मनोज, जीतेंद्र, अमिताभ वगैरह दिलीप साहब की कॉपी कर कहाँ से कहाँ चले गए. और तो और राजेश खन्ना जैसे निराले स्टाइलिश अभिनेता तक कई बार दिलीप साहब की कॉपी करने के लिए विवश रहे. मैं खुद भी नाटकों से लेकर टीवी, सिनेमा के कैमरे का जितना भी मौका पाया दिलीप साहब की कॉपी कर आत्म-विश्वास संचित कर सका.

भारत वर्ष के अभिनय सम्राट ने ‘दाग’ में शराबी, ‘देवदास’ में मायूस प्रेमी, ‘आदमी’ में शक्की इन्सान, ‘शक्ति’ के कर्तव्यनिष्ठ पुलिस ऑफिसर से लेकर ‘विधाता’ के डॉन का जो भी चरित्र किया, मील का पत्थर बन गया.

किन्तु अभिनय की खड़ी पाई ट्रेजडी किंग के महान करियर में एक दाग है. उन्होंने अमानवीय जाति भेद-भाव व्यवस्था द्वारा गले में थूकदानी और कमर में झाड़ू बांधे सौ-सौ हाथ दूर से बात करने के लिए बाध्य किसी मानवेतर बहुजन नायक का चरित्र निर्वाह कर, संगदिल मनुवादियों को इस अमानवीय व्यवस्था के प्रति दो बूँद आंसू बहाने के लिए मजबूर नहीं किया. यदि दिलीप साहब चाहते तो ऐसा कैरेक्टर उनके लिए जरुर लिख दिया जाता.

इतना ही नहीं महान दिलीप कुमार ने ‘गंगा-जमुना’ नामक एक मात्र फिल्म बनाकर ग्राम्य भारत को सम्मान दिया. उर्दू जुबान के मास्टर और शहरी संस्कृति में पले-बढ़े दिलीप साहब ने गंगा-जमुना में ग्रामीण संवाद अदायगी का जो अंदाज़ पेश किया, उसकी असफल कॉपी भारत के तमाम अभिनेता आज तक करते रहे हैं. उनकी अविस्मर्णीय गंगा-जमुना में जाति-भेद की दरिया में डूबा कोई मानवेतर बहुजन नहीं है.

उनके जैसा पर्फेक्शनिष्ट कैसे भूल गया कि भारतवर्ष चार वर्ण से छः हजार मानव गोष्ठियों में विभक्त: विश्व के दूसरे श्रेणी समाजों की तरह अमीर-गरीब की दो श्रेणियों में बंटा समाज नहीं.’

एच.एल.दुसाध

उपरोक्त टिप्पणी सन 2000 में प्रकाशित एच.एल. दुसाध की 674 पृष्ठीय पुस्तक ‘आदि भारत मुक्ति : बहुजन समाज’ के पृष्ठ 453-54 का अंश है.

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