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अर्टिका डाइओका : बिच्छूमार पौधा या बिच्छू घास

बिच्छू घास को अंग्रेजी में नेटल कहा जाता है। इसका बॉटनिकल नाम अर्टिका डाइओका – Urtica dioica in Hindi है। कुमाऊंनी में इसे सिसूण और गढ़वाल में कंडाली कहते हैं

Urtica dioica in Hindi : Ordinary Plants with Extraordinary Properties

बिच्छू घास को अंग्रेजी में नेटल कहा जाता है। इसका बॉटनिकल नाम अर्टिका डाइओका है। कुमाऊंनी में इसे सिसूण और गढ़वाल में कंडाली कहते हैं

बात थोड़ी पुरानी है। मैं उत्तराखंड की वादियों में घूमने गया था। मैं हरी वादियों में खोया हुआ था। कभी ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों को देखता तो कभी नीचे सर्पीलाकार सड़कों व घाटियों को। तभी मैंने सोचा कि जरा जमीं पर देखा जाए। तभी मैं एक ऐसे पौधे से रूबरू हुआ जो बेतहाशा खुजली मचाता है। मैंने जब इसे छुआ तो चमड़ी पर जलन होने लगी और दाने उभर आए। मैंने हाथ को धोया मगर खुजली नहीं गई। अब एक स्थानीय निवासी की हंसने की बारी थी। उन्होंने सुझाया कि खुजली ऐसे नहीं जाएगी। उन्होंने आसपास से कोई पालकनुमा पौधे की पत्ती मुझे थमाते हुए कहा- इसको जलन वाली जगह पर मसल कर रगड़ लो।’ मैंने वैसा ही किया और खुजली रफूचक्कर हो गई व जान में जान आई।

खुजली पैदा करने वाले पौधे के बारे में और जानने की उत्सुकता उफान पर थी। अब तो क्या था। एक बार फिर से मैंने उस खुजली पैदा करने वाले पौधे की पत्ती को फिर से हाथ पर छुआया। फिर से जलन मच गई। जलन को शांत करने के लिए उसी पालकनुमा पौधे की पत्ती को लगा लेता।

वह स्थानीय कहने लगे- इसका डंक खतरनाक होता है। पहले जब बच्चे ऊधम मचाते थे उनको सजा देने के लिए इस पौधे को छुआया जाता था। बच्चे तड़प उठते थे। इतना ही नहीं सजा के रूप में और लोगों के शरीर पर इस पौधे को रगड़ दिया जाता था।’

खुजली पैदा करने वाले पौधे और खुजली से निजात दिलाने वाले पौधे

मैं खुजली पैदा करने वाले और खुजली से निजात दिलाने वाले पौधे को ध्यान से देखने लगा। खुजली पैदा करने वाले पौधे के बारे में और भी लोगों से बातचीत की। लोग इस पौधे के बारे में काफी कुछ जानते हैं। इस पौधे को बिच्छू, बिच्छूबुटी, बिच्छूघास, बिच्छूमार आदि नामों से जानते हैं।

बिच्छूमार एक झाड़ीनुमा पौधा है जो उत्तराखंड की पहाड़ियों में बहुतायत से मिलता है।

बिच्छूमार पौधा कहां उगता है

यह एक खरपतवार, जमीनी पौधा है जो बेकार पड़ी जमीन पर जहां मिट्टी हो, वहां पाया जाता है। पत्थरों पर व पथरीली जमीन पर भी यह पौधा नहीं उगता। बिच्छूमार ज्यादातर ऐसे स्थानों पर उगता है जहां थोड़ी नमी हो। जहां पानी का स्रोत हो उसके आसपास इस पौधे की भरमार होती है।

बिच्छूमार पूरी तरह से कांटों से लदा होता है। पत्तों, शाखाओं व तनों पर कांटे ही कांटे होते हैं। नई पत्तियों व शाखाओं पर कांटे मुलायम होते हैं। जो पत्तियां व शाखाएं कड़ी हो चुकी हैं उन पर कांटे अपेक्षाकृत कठोर होते हैं।

मैंने एक बात और देखी कि बनिस्बत दूसरे पौधों के यह पौधा व इसकी पत्तियां साबूत हैं। चरने वाले पशु इसकी ओर फटकते भी नहीं। न ही इसके आसपास लोग-बाग जाते हैं। सही कहा है- बुरे से इंसान तो क्या भगवान भी डरते हैं।

आखिर बिच्छूमार पौधे में ऐसा क्या है कि जलन मचती है?

इसका जवाब पाने की उत्कंठा मुझमें जग गई। पौधे के बारे में पता चला कि इसका अंग्रेज़ी नाम स्टिंगिंगनेटल- याने कि दंश मारने वाला बिच्छू है। इसका वनस्पति वैज्ञानिक नाम है- अर्टिकाडायोसा।

Urtica dioica, often known as common nettle, stinging nettle or nettle leaf, or just a nettle or stinger, is a herbaceous perennial flowering plant in the family Urticaceae.

बिच्छूमार, बिच्छू या बिच्छूबूटी नाम के अनुसार यह वैसी ही जलन मचाता है जैसे बिच्छू के दंश से मचती है। इसके जो कांटे होते हैं वे पोले याने कि खोखले, वैसे ही जैसे इंजेक्शन की सुई होती है। कांटे इतने पैने होते हैं कि मात्र छुअन भर से ही ये चमड़ी में चुभ जाते हैं और भयंकर जलन होती है।

पहले बात करें कि आखिर खुजली व जलन की वजह क्या है? क्या कोई रसायन होता है इसके कांटों में?

जब पता किया गया तो पाया कि इसमें एसिटायलकोलिन, हिस्टेमाईन व फार्मिक एसिड जैसे रसायन होते हैं जो खुजली व जलन के लिए जिम्मेदार हैं।

है न दिलचस्प बात! अपने को सुरक्षित रखने के लिए इस पौधे ने यह युक्ति ईज़ाद कर डाली। इन जहरीले रसायनों के होने से यह पौधा अपने आपको जंतुओं के द्वारा होने वाले खतरों से बचा पाता है।

मैंने काफी खोजने की कोशिश की कि कहीं कोई ऐसे साक्ष्य मिले कि किसी जीव ने इनकी पत्तियों को खाया हो या कीड़ा लगा हो। मगर मुझे एक भी ऐसा पौधा नहीं मिला जिस पर कोई जीव मिला हो।

मगर इसी जहरीले गुण का फायदा भी है।

अल्मोड़ा में एक पहाड़ी महिला से जब बातचीत की तो उसने बताया कि इसका घुटनों व जोड़ों के दर्द में इस्तेमाल किया जाता है। लोग-बाग दर्द वाले स्थान पर पत्तियों को लगाते हैं।

ऐसा उल्लेख मिलता है कि उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ में होने वाले बग्वाल मेले में पत्थर से खेले जाने वाले खेल में घायल लोग अपना इलाज बिच्छूमार से ही करते हैं।

मेरे एक मित्र जो कि मूलत: उत्तरकाशी क्षेत्र के रहने वाले हैं, उन्होंने बताया कि इसकी नरम-नरम पत्तियों की सब्जी भी खाई जाती है। इसमें विटामिन जैसे कि ए, बी, डी तथा कैल्शियम व मैगनीज प्रचुर मात्रा में होते हैं।

अब हम आते हैं इस खुजली के इलाज पर।

अगर आप जंगल में हैं और बिच्छूमार से छू जाएं तो एक ही इलाज है वहां पर। वह है बिच्छूमार के पास में ही एक पौधा अमूमन उगता है। इसकी पत्तियां पालक के जैसी होती हैं। इसे रूमेक्स के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड में इस पौधे का कोई देसी नाम मुझे पता नहीं चल पाया। जलन वाली जगह पर इस पालकनुमा रूमेक्स पौधे की पत्तियों को मसल कर देर तक रगड़ दें। जलन व दर्द छूमंतर हो जाएगा।

रूमेक्स पौधे में एंटिहिस्टेमाइन होते हैं जो जलन व दर्द को कम या खत्म कर देते हैं। ऐसा ही मैंने करके देखा। हाथ के पंजे के एक हिस्से में बिच्छूमार की पत्तियों को छुआया। अब उसी पंजे पर एक जगह पर पत्तियों को छुआया तथा रूमेक्स पौधे की पत्तियों को मसलकर एक भाग पर रगड़ दिया। जिस भाग पर पत्तियों को रगड़ा वहां जलन खत्म हो गई। बिच्छूमार की पत्तियों से जो दाने-दाने आ गए थे वे भी कुछ मिनटों में खत्म हो गए। मगर जिस पर उस रूमेक्स को नहीं रगड़ा वहां कई घंटों (लगभग 12-14 घंटों) तक जलन होती रही। मैंने यहां तुलना करके देखने की कोशिश की थी कि वाकई में क्या रूमेक्स का कोई असर होता भी है या नहीं।

तो कहा जा सकता है कि कुदरत दर्द के साथ दवा भी देती है।’ यह कहावत इस मामले में खरी उतरती है।

हमारी संस्कृति व लोक जीवन का हिस्सा तो है ही ये पौधे मगर अफसोस कि ये हमारी शिक्षा का हिस्सा नहीं बन पाए।

जब हम कहते हैं कि शिक्षा समाज व अपने परिवेश से जुड़ें तो फिर इन पौधों व ऐसी और भी बातों को शामिल करने के बारे में विचार किया जायेगा।

कालूराम शर्मा

(देशबन्धु में प्रकाशित लेख का संपादित रूप साभार )

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