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नये किसान कानूनों का दुष्प्रभाव : हिमाचल में अडानी के अच्छे दिन, किसानों को सेब पर 16 रुपए प्रति किलो का घाटा

वैसे तो खेती में निजी कंपनियों के हस्तक्षेप के चलते किसानों से ठगी के कई मामले आए हैं पर नया मामला हिमाचल प्रदेश का है, जिसमें अडानी ग्रुप की कंपनी ने सेब के रेट गत साल से 16 रुपये कम तय किये हैं।

नये किसान कानूनों का दुष्प्रभाव : हिमाचल में अडानी ने पिछले साल से 16 रुपये कम कीमत पर तय किये सेब के रेट

Effect of new farmer laws: Adani fixed apple rates in Himachal at Rs 16 less than last year

नई दिल्ली (चरण सिंह राजपूत) 27 अगस्त 2021। देश का किसान भले ही नये किसान कानूनों को वापस कराने के लिए नौ महीने से सड़कों पर है पर देश का एक बड़ा तबका किसानों को ही गलत साबित करने में लगा है। उसे लगता है कि मोदी सरकार ने ये कानून किसानों के भले के लिए बनाये हैं। इन कानूनों की आड़ में जब पूंजीपतियों के किसानों की खेती कब्जाने की बात की जाती तो यह तबका अडानी और अंबानी जैसे पूंजीपतियों का पैरोकार बना नजर आता है।

वैसे तो खेती में निजी कंपनियों के हस्तक्षेप के चलते किसानों से ठगी के कई मामले आए हैं पर नया मामला हिमाचल प्रदेश का है, जिसमें अडानी ग्रुप की कंपनी ने सेब के रेट गत साल से 16 रुपये कम तय किये हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार अडानी एग्री फ्रेश कंपनी (Adani Agri Fresh Company) ने अस्सी से 100 फीसदी रंग वाला एक्स्ट्रा लार्ज सेब 52 रुपये प्रति किलो जबकि लार्ज, मीडियम और स्मॉल सेब 72 रुपये प्रति किलो की दर पर खरीदने की घोषणा की है, जबकि पिछले साल एक्स्ट्रा लार्ज सेब 68, लार्ज, मीडियम और स्मॉल सेब 88 रुपये प्रति किलो तय किया गया था।

सेब का रेट कम कम तय करने से बागवानों में नाराजगी

अडानी की कंपनी के रेट कम कम तय करने से हिमाचल प्रदेश के बागवानों में नाराजगी देखी जा रही है। इस बार 60 से 80 फीसदी रंग वाला एक्स्ट्रा लार्ज सेब 37 रुपये किलो जबकि लार्ज, मीडियम और स्मॉल आकार का सेब 57 रुपये प्रति किलो की कीमत पर खरीदा जा रहा है। मतलब 60 फीसद से कम रंग वाले सेब की खरीद 15 रुपये प्रति किलो की कीमत तय की गई है जबकि बीते साल ऐसा सेब 20 रुपये किलो खरीदा गया था।

इतना ही नहीं अडानी एग्री फ्रेश के लिए बागवानों को अपना सेब क्रेटों में अडानी के कलेक्शन सेंटर तक लाना होगा। मतलब यहां तक लाने का खर्च अलग से। कंपनी ने ये रेट 29 अगस्त तक के लिए जारी किए हैं। 29 अगस्त के बाद हो सकता है कि रेट और भी कम हो जाएं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार हिमाचल में अडानी ग्रुप ने ठियोग के सैंज, रोहड़ू के मेहंदली और रामपुर के बिथल में कलेक्शन सेंटर बनाया है। अडानी एग्री फ्रेश के टर्मिनल मैनेजर पंकज मिश्रा ने इन रेटों को सही बताया है।

इस मामले में कृषि मामलों के विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का कहना है इसी वजह से किसान कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। इसलिए एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाए जाने की बात कही जा रही है।

यही सब कारण हैं कि कृषि बिल को लेकर किसानों का सरकार के साथ गतिरोध बरकरार है। किसान और सरकार अपने-अपने तर्क दे रहे हैं। केंद्र सरकार एक देश एक मंडीबनाने पर जोर दो रही है तो किसान हर कीमत पर कानूनों को वापस कराने पर अड़े हैं। सरकार का कहना है कि किसान इस कानून के जरिये अब एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों पर बेच पाएंगे। निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर पाएंगे।

दूसरी ओर किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार किसी विशेष वर्ग उद्योगपतियों के लिए व्यापार का सरलीकरण कर रही है, जिससे कि उन्हें इसका लाभ मिल सके। केंद्र ने नए कानून के जरिये एपीएमसी मंडियों को एक सीमा में बांध दिया है।  एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी के स्वामित्व वाले अनाज बाजार (मंडियों) को उन बिलों में शामिल नहीं किया गया है। इसके जरिये बड़े कॉर्पोरेट खरीदारों को खुली छूट दी गई है।

ये खरीदार बिना किसी पंजीकरण और बिना किसी कानून के दायरे में आए हुए किसानों की उपज खरीद-बेच सकते हैं।

सरकार ने आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक पास किया है। इस विधेयक के बाद यह कानून अनाज, दालों, आलू, प्याज और खाद्य तिलहन जैसे खाद्य पदार्थों के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण को विनियमित करता है। यानी इस तरह के खाद्य पदार्थ आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर करने का प्रावधान है। इसके बाद युद्ध व प्राकृतिक आपदा जैसी आपात स्थितियों को छोड़कर भंडारण की कोई सीमा नहीं रह जाएगी। किसानों का कहना है कि इससे जमाखोरी बढ़ जाएगी। मतलब कितना भी जमा करो कोई नहीं पूछेगा जब मर्जी हो तब बाजार में निकालो। ऐसे में कालाबाजारी बढ़ेगी।

सरकार ने कांट्रेक्ट फार्मिंग यानि कि संविदा खेती (contract farming) को लेकर भी नया कानून बनाया है। इस कानून का उद्देश्य अनुबंध खेती यानी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की इजाजत देना है। इसके तहत किसान की जमीन को एक निश्चित राशि पर एक पूंजीपति या ठेकेदार किराये पर लेगा और अपने हिसाब से फसल का उत्पादन कर बाजार में बेचेगा।

दूसरी ओर किसानों का कहना है कि परंपरा गत खेती की जगह संविदा खेती का मतलब बड़ी कंपनियों का सीधा हस्तक्षेप और ये ही कंपनियां खेती का फायदा उठाएंगी। किसानों का कहना है कि ये ही कंपनियां उन्हें बताएंगी कि उन्हें क्या बोना है। ये कंपनियां अपनी शर्तों पर फसल खरीदेंगी। इस कानून में किसान को कोर्ट जाने का भी अधिकार नहीं है। इस कानून के तहत कंपनी द्वारा संविदा की शर्तो का उल्लंघन किये जाने पर किसान अपनी शिकायत न्यायालय में दर्ज नहीं करा सकता है। हां एसडीएम के यहां शिकायत दर्ज करा सकता है।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि अडानी और अंबानी जैसे पूंजपीतियों के सामने एक एसडीएम बेचारे की क्या हिम्मत कि वह किसान के पक्ष में बोल जाए। 

आंदोलित किसानों का कहना है कि ये कानून किसान विरोधी हैं। कृषि के निजीकरण को प्रोत्साहन देने वाले हैं। इनसे किसानों को नहीं बल्कि होर्डर्स और बड़े कॉरपोरेट घरानों को फायदा होगा।

किसानों की मांग है कि एक विधेयक के जरिए किसानों को लिखित में आश्वासन दिया जाए कि एमएसपी और कन्वेंशनल फूड ग्रेन खरीद सिस्टम खत्म नहीं होगा। एमएसपी खरीद पर कानून लाया जाए। किसान संगठन कृषि कानूनों के अलावा बिजली बिल 2020 को लेकर भी विरोध कर रहे हैं।

केंद्र सरकार के बिजली कानून 2003 की जगह लाए गए बिजली (संशोधित) बिल 2020 का विरोध किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि इस बिल के जरिए बिजली वितरण प्रणाली का निजीकरण किया जा रहा है। इस बिल से किसानों को सब्सिडी पर या फ्री बिजली सप्लाई की सुविधा खत्म हो जाएगी।

किसानों की एक मांग एक प्रावधान को लेकर है, जिसके तहत खेती का अवशेष जलाने पर किसान को 5 साल की जेल और 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। पंजाब में पराली जलाने के चार्ज लगाकर गिरफ्तार किए गए किसानों को छोड़े जाने की भी मांग किसान कर रहे हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रदेश के पराली जलाने संबंधी मुकदमे वापस ले लिये हैं।

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