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स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास समझने के लिए साहित्य आवश्यक

Liberation Struggle 1917-1947 in Hindi Political Novels : Phanish Singh Memorial Lecture

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Literature is necessary to understand the history of the freedom movement.

पटना, 26 सितम्बर। अखिल भारतीय शांति व एकजुटता संगठन‘ ( ऐपसो) की ओर से माध्यमिक शिक्षक संघ जमाल रोड में प्रथम फणीश सिंह स्मृति व्याख्यानका आयोजन किया गया। व्याख्यान का विषय था हिंदी के राजनीतिक उपन्यासों में मुक्ति संघर्ष 1917-1947’ ( राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में इतिहास व साहित्य का संबन्ध) पर बोलने के लिए रवींद्र भारती विश्विद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर हितेंद्र पटेल मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद थे। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए राज्य भर से साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता आये हुए थे।।

ऐप्सो के महासचिव ब्रजकुमार पांडेय ने कहा “फणीश सिंह साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता थे। ऐप्सो को फिर से खड़ा करने में फणीश सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका है। दुनिया में युद्ध की विभीषिका के बाद लोगों ने यह महसूस किया कि दुनिया तो ऐसे चल नहीं सकती तब लोगों ने शान्ति और एकजुटता के लिए ऐप्सो का निर्माण किया।”

उन्होंने जोड़ा कि फ्रांसीसी क्रांति को समझने के लिए बाल्जाक को पढ़ना जरूरी है।

अध्यक्ष मंडल के सदस्य विधान पार्षद व माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष केदारनाथ पांडेय ने कहा कि “यह नया विषय है। नई दृष्टि से समझने के लिए साहित्य व इतिहास के आपसी सन्दर्भ को समझना आवश्यक है।”

मुख्य वक्ता रवींद्रभारती विश्विद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर हितेंद्र पटेल ने कहा “राजनीतिक उपन्यासों में मुक्ति का मतलब सिर्फ देश की आजादी ही नहीं बल्कि दूसरे सवाल भी थे। भारत की आजादी में कई धाराएं हैं। लेव टॉलस्टॉय कहते हैं भारत में एक वर्ग है जो अंग्रेजों के साथ चलने वाले हैं। आजादी के आंदोलन बाघा जतिन जैसे कई लोग लड़ रहे थे। उनके शिष्य थे एम.एन राय। कई चीजें जो राजनीति में नहीं दिखती हैं वो उपन्यासों में आती हैं। गाँधी ने लोगों को आंदोलन से जोड़ा। गांधी जनता के नायक बने रहे।”

किसानों मजदूरों की लड़ाइयों से भरा है बिहार का इतिहास

हितेंद्र पटेल ने आगे कहा “हालाँकि 1942 आते-आते उनके अपने लोगों ने भी उन्हें छोड़ दिया। यशपाल लिखते हैं सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ सबसे ज्यादा विधानचंद्र राय बोल रहे थे। मैला आंचल में बामन दास है जो जनता का प्रकटीकरण है। बाभन दास कांग्रेसी था उसकी हत्या भी उन्हीं लोगों द्वारा की गई। हमें किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती की पीड़ा को समझना है। वैसा उपन्यास लिखा जाना है जिसमें स्वामी सहजानन्द की तकलीफ समाहित हो। उस पीड़ा की चर्चा महान अभिनेता बलराज साहनी भी अपने नाटक में करते हैं। अमृतलाल नागर, यशपाल, नवेन्दु घोष आदि के उपन्यासों में जनता की पीड़ा है। अज्ञेय कहते हैं कि अब आँख में आँख डालकर बात करने की जरूरत है। बिहार का इतिहास किसानों मजदूरों की लड़ाइयों से भरा है।”

हितेंद्र पटेल ने बिहार को स्वाधीनता आंदोलन से संबंधित दस्तावेज़ों की खान बताते हुए कहा “बिहार में बहुत सारे दस्तावेज हैं जिसे खंगालने की जरूरत है। गांधी के भारत आने पहले ही गांधी के बारे में अच्छी बातें कही जारही थी। साहित्य सिर्फ साहित्य ही नहीं है। साहित्य में इतिहास भी है।”

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए नीरज सिंह ने कहा “समूचा इतिहास अपनी जटिलताओं के साथ हमारे सामने आता है। प्रेमचंद और रेणु ने समाज और राजनीति के सवालों को उठाया है। कर्मभूमि एक महत्वपूर्ण उपन्यास है।”

कार्यक्रम का संचालन संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर जबकि धन्यवाद ज्ञापन रंगकर्मी जयप्रकाश ने किया

कार्यक्रम में ऐपसो अध्यक्ष मण्डल के सदस्य सर्वोदय शर्मा, रामबाबू कुमार, चंद्रप्रकाश सिंह, के साथ साथ प्रख्यात कवि आलोकधन्वा, सीपीआई के राज्य सचिव रामनरेश पांडेय, शैलेन्द्र राकेश, सीताराम आश्रम ट्रस्ट बिहटा के सचिव डॉ सत्यजीत, स्वामी सहजानन्द सरस्वती के अध्येयता राघव शरण शर्मा, गोपाल, तंजीम-ए-इंसाफ के इरफान अहमद फातमी, पत्रकार सीटू तिवारी, कुलभूषण गोपाल, सुनील सिंह, एटक नेता गजनफर नवाब, प्राच्य प्रभा के संपादक विजय कुमार सिंह, डॉ अर्चना त्रिपाठी, चन्द्रकान्ता खान, गोपाल शर्मा, ज्ञानेंद्र सिंह टुनटुन सिंह, तृप्तिनाथ सिंह, कौशल किशोर झा, रोशनाई पत्रिका की संपादक सुनीता गुप्ता, प्रलेस के राजकुमार शाही, आनंद आशुतोष द्विवेदी, इरफान अहमद फातमी, सुनील सिंह, सुमन्त शरण, मृत्युंजय शर्मा, वरिष्ठ रंगकर्मी क्षितिज प्रकाश, सत्यनारायण, कुणाल सिकंद, अमृत आदि।

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