मौसम बदल गया है, हमेशा के लिए

भारत विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील क्यों है? भारत का भूगोल ऐसा है कि यह तीनों तरफ हिंद महासागर के गर्म उष्णकटिबंधीय पानी और उत्तर में हिमालय से घिरा हुआ है। यह देश की खूबी हुआ करती थी लेकिन अब समुद्र और पहाड़ बदल गए हैं। चक्रवातों की आवृत्ति में 50% से अधिक की वृद्धि हुई है, और मानसून की अत्यधिक बारिश में तीन गुना वृद्धि हुई है। 
 
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Dr. Roxy Mathew Koll is a Climate Scientist at the Indian Institute of Tropical Meteorology. He did his PhD in Ocean and Atmospheric Dynamics from Hokkaido University, Japan. Roxy is currently leading research on climate change—how it extends to the rapid warming in Indo-Pacific oceans—and impacts the global rainfall pattern, the monsoon and the marine ecosystem. He is the Chair of the CLIVAR Indian Ocean Region Panel, and a Lead Author of the IPCC Reports.


रॉक्सी मैथ्यू कोल

लगभग हर सात साल में, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) द्वारा इसपर एक रिपोर्ट जारी की जाती है कि कैसे मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन की रफ्तार बढ़ रही है और इसकी वजह से चरम मौसम की घटनाएं हमारे दरवाजों पर दस्तक दें रही हैं। तो, 9 अगस्त 2021 को जारी IPCC की छठी असेसमेंट रिपोर्ट में नया क्या है?

इस रिपोर्ट से मुख्य निष्कर्ष यह है कि पेरिस समझौते के माध्यम से राष्ट्रों द्वारा प्रस्तुत मिटिगेशन रणनीतियाँ वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C या 2°C भी की सीमा के भीतर रखने के लिए अपर्याप्त हैं। यह भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि विश्व स्तर पर, हम उत्सर्जन पर प्रतिबद्ध प्रतिबंधों के क़रीब भी पहुंचने में विफल रहे हैं। यह इस भयानक तथ्य की ओर इशारा करता है कि हम निकट भविष्य में और अधिक चुनौतीपूर्ण जलवायु चरम स्थितियों का सामना करने जा रहे हैं। IPCC रिपोर्ट हमें बताती है कि इनमें से कुछ बदलाव अपरिवर्तनीय हैं, और यदि भविष्य में कुछ हज़ार साल तक नहीं तो सदियों तक तो रहेंगे।

तापमान वृद्धि को 1.5°C के भीतर सीमित करना क्यों आवश्यक है? वर्तमान में, वैश्विक औसत तापमान वृद्धि 1.1°C है और भारत जैसे देश एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं जहां हम पहले से ही चक्रवात, बाढ़, सूखा और हीट-वेव जैसी गंभीर मौसम की घटनाओं की बढ़ती संख्या का सामना कर रहे हैं। भारत विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील क्यों है? भारत का भूगोल ऐसा है कि यह तीनों तरफ हिंद महासागर के गर्म उष्णकटिबंधीय पानी और उत्तर में हिमालय से घिरा हुआ है। यह देश की खूबी हुआ करती थी लेकिन अब समुद्र और पहाड़ बदल गए हैं।

चक्रवातों की आवृत्ति में 50% से अधिक की वृद्धि हुई है, और मानसून की अत्यधिक बारिश में तीन गुना वृद्धि हुई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये घटनाएं ऊर्जा और नमी का स्रोत महासागरों से प्राप्त करती हैं—और महासागर गर्म हो गए हैं। दरअसल, ग्लोबल वार्मिंग से 93 प्रतिशत से अधिक गर्मी महासागरों में चली गई है, और हिंद महासागर सबसे तेज़ दर से गर्म हो रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण हिमालय के ग्लेशियर भी तेज़ी से पिघल रहे हैं, जिससे डाउनस्ट्रीम समुदायों के जीवन और कृषि को खतरा है।

यह सिर्फ भारत में ही नहीं; हम दुनिया भर में अभूतपूर्व स्तरों से भी बड़े पैमाने पर बाढ़ और हीट-वेव झेल रहे हैं। चीन और जर्मनी में भी इतनी बाढ़ अभूतपूर्व और विनाशकारी थी कि जर्मन चांसलर एंजेल मर्केल ने कहा कि उनके पास मौसम की घटना की मात्रा का वर्णन करने के लिए शब्द नहीं हैं। पश्चिमी कनाडा और अमेरिका ने जून 2021 में चिलचिलाती हीटवेव दर्ज की, जिसमें ब्रिटिश कोलंबिया के एक स्टेशन में 49.6°C का आंकड़ा देखा गया जो औसत तापमान से 5°C अधिक था। अनुसंधान दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन के बिना ये घटनाएँ असंभव थीं।

जलवायु मॉडल दिखाते हैं कि ये सभी गंभीर मौसम की स्थिति वैश्विक तापमान बढ़ने के साथ-साथ और लगातार, तीव्र और व्यापक हो जाएगी। कई कारक जलवायु संकट को बदतर कर रहे हैं। हमारे शहर और पहाड़ियाँ और नदियाँ अनियोजित और निरंतर विकास देख रही हैं, जो पर्यावरण को एक ऐसी स्थिति में बदल रहा है जो अब बाढ़ के पानी या गर्मी को अवशोषित नहीं कर सकता है। दुनिया भर में और विशेष रूप से भारत में, जहां अनियोजित भूमि-उपयोग परिवर्तन व्यापक हैं, भूस्खलन में वृद्धि हुई है।

हमें एक देश-व्यापी असेसमेंट की आवश्यकता है जो जलवायु में परिवर्तन के आधार पर जोखिमों का तत्काल मानचित्रण करे। इन जोखिमों के असेसमेंट के आधार पर ही किसी भी तरह के विकास की योजना बनाई जानी चाहिए—चाहे वह सार्वजनिक बुनियादी ढांचा हो, या फिर खेत या घर हो। हमें अपने शहरों को नया स्वरूप देना पड़ सकता है। हमें भारत के हर जिले को डिज़ास्टर प्रूफ़ (आपदा को रोकने लायक) करने की आवश्यकता है क्योंकि हलाकि जलवायु परिवर्तन वैश्विक है, चुनौतियां हमेशा स्थानीय होती हैं। हमारे पास किसी भी क्षेत्र के लिए जोखिमों की मॉनिटरिंग और मात्रा निर्धारित करने के लिए डाटा और उपकरण हैं—ऐसा करने से हमें क्या रोक रहा है? हमें विशेष रूप से बाढ़ और चक्रवात जैसी गंभीर मौसम की घटनाओं के बढ़ते खतरे का अध्ययन करने के लिए एक शोध केंद्र की भी आवश्यकता है—हमारे पास अभी यह नहीं है।

एक जलवायु वैज्ञानिक के रूप में, मैं अक्सर ग्रह की उस डरावनी छवि को बार-बार बनाने में शर्म महसूस करता हूं। कुछ आशावादी शब्दों को अंत में फेंकने से मदद नहीं मिलती है। मुझे खेद है, मैं ऐसा नहीं कर सकता हूँ। जबकि कोविद वक्र टीकाकरण और सावधानियों के साथ समतल हो सकता है, जलवायु परिवर्तन एक ऊपर की ओर जाने वाली ढलान पर है जो निकट भविष्य में समतल नहीं होगा। हमें उत्सर्जन पर अंकुश लगाना चाहिए, सस्टेनेबल विकास और प्राकृतिक सुरक्षा को अपनाना चाहिए—और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें पर्यावरण के साथ कुछ भी करने से पहले जोखिम का असेसमेंट करने की आवश्यकता है।

- रॉक्सी मैथ्यू कोल भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान में एक जलवायु वैज्ञानिक और हालिया IPCC रिपोर्टों के प्रमुख लेखक, योगदानकर्ता और समीक्षक हैं।

(Dr. Roxy Mathew Koll is a Climate Scientist at the Indian Institute of Tropical Meteorology. He did his PhD in Ocean and Atmospheric Dynamics from Hokkaido University, Japan. Roxy is currently leading research on climate change—how it extends to the rapid warming in Indo-Pacific oceans—and impacts the global rainfall pattern, the monsoon and the marine ecosystem. He is the Chair of the CLIVAR Indian Ocean Region Panel, and a Lead Author of the IPCC Reports.)

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