भारत में दोपहिया वाहनों के विद्युतीकरण के लिए एक नियामक मार्ग

अगर दोपहिया ईंधन की खपत का मानक 2030 के लिए 20gCO2/km पर या उससे कम पर सेट किया जाता है, तो इससे यह सुनिश्चित होने की संभावना है कि उस वर्ष कम से कम 60% नए दोपहिया वाहनों की बिक्री इलेक्ट्रिक हो।
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renewable energy

 A regulatory route for electrification of two-wheelers in India

भारत में दोपहिया वाहनों के विद्युतीकरण पर कई चीजें सही चल रही हैं। सबसे पहले, भारत सरकार ने इलेक्ट्रिक दोपहिया (E2W) के लिए FAME-II प्रोत्साहन को बढ़ाकर INR 15000 / kWh कर दिया। दूसरे, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे अधिक राज्यों ने अपनी राज्य EV नीतियों के हिस्से के रूप में आकर्षक राज्य स्तरीय EV प्रोत्साहन की घोषणा की है। तीसरे, कई स्टार्टअप (या ऑटो उद्योग में नये आनेवालों के लिए  ) नए इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर मॉडल लॉन्च कर रहे हैं।

नतीजतन, भारत में E2W की बिक्री 2020 के स्तर की तुलना में 2021 में कम से कम दोगुनी होने की संभावना है। अगर ऐसा होता है तब भी, तो नए दोपहिया वाहनों की बिक्री में E2Ws की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम होगी। यह थोड़ा बहुत इस वजह से है क्योंकि उद्योग के नेता (हीरो मोटोकॉर्प, हौंडा, टीवीएस, बजाज, सुज़ूकी, रॉयल एनफील्ड और यामाहा), जो भारत में बेचे जाने वाले सभी दोपहिया वाहनों का लगभग 99% बेचते हैं, कुल मिलाकर उनके बीच सिर्फ दो इलेक्ट्रिक मॉडल पेश करते हैं, और वो भी सिर्फ मुट्ठी भर शहरों में।

इलेक्ट्रिक वाहन बनाना और बेचना शुरू करने के लिए बाजार की अग्रणी कंपनियों की इस झिझक को दुनिया के सबसे सक्रिय व मुस्तैद EV बाजारों ने दो तरीक़ों से दूर किया है। एक तो शून्य उत्सर्जन वाहन (ZEV) क्रेडिट कार्यक्रम स्थापित करना है। रिन्यूएबिल परचेज़ ऑब्लिगेशन (रिन्यूएबिल खरीद कर्तव्य) (RPO) के समान, एक ZEV क्रेडिट कार्यक्रम के लिए वाहनों के बनानेवालों को यह सुनिश्चित करने की ज़रुरत होती है कि वे या तो उनकी बिक्री का एक निश्चित अंश ZEV हैं या फिर उन निर्माणकर्ताओं से ZEV क्रेडिट खरीदने की जिन्होंने क्रेडिट प्रोग्राम द्वारा ज़रुरत से ज़्यादा ZEV बेचे हैं। ऐसे कई संभावित नियामक दृष्टिकोण हैं जिनके द्वारा भारत ऐसा कार्यक्रम स्थापित कर सकता है। कैलिफ़ोर्निया और कई अमेरिकी राज्यों के साथ-साथ चीन ने इलेक्ट्रिक वाहनों की मॉडल उपलब्धता को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के दृष्टिकोण का इस्तेमाल किया है।

दूसरा तरीक़ा ईंधन दक्षता/CO2 उत्सर्जन मानक को इतना कड़ा बनाकर लागू करना है कि शून्य उत्सर्जन वाहन बनाकर और बेचकर ही इसे सबसे अच्छे ढंग से पूरा किया जा सके शायद सिर्फ इस ही ढंग से पूरा किया जा सके। जैसा कि यूरोपीय संघ की यात्री कार CO2 मानकों के उदाहरण से पता चलता है, अगर CO2 मानक पर्याप्त रूप से कड़े हैं तो मुख्यधारा के निर्माता इलेक्ट्रिक वाहनों को सार्थक संख्या में पेश करते हैं।

हाल के एक ब्रीफिंग पेपर में मेरे सहकर्मियों का तर्क है कि भारत वास्तव में इस तरह के दृष्टिकोण का बहुत प्रभाव से उपयोग कर सकता है। अगर FY2025-26 के लिए 2W CO2 मानक 25gCO2/km (2020-21 में 38 gCO2/km की तुलना में) पर सेट किए जाते हैं, तो हमारे शोध से पता चलता है कि लागत प्रभावी बाजार हिस्सेदारी, कुल दोपहिया बाजार में 32% EV हिस्सेदारी के लिए, इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिलों के लिए 19% और इलेक्ट्रिक स्कूटरों के लिए 13% तक हो सकती है।

इसी तरह, अगर दोपहिया ईंधन की खपत का मानक 2030 के लिए 20gCO2/km पर या उससे कम पर सेट किया जाता है, तो इससे यह सुनिश्चित होने की संभावना है कि उस वर्ष कम से कम 60% नए दोपहिया वाहनों की बिक्री इलेक्ट्रिक हो।

इसके विपरीत, यदि 2025–26 के मानक ढीले-ढाले होते हैं, मान लीजिए कि 30gCO2/km जितने ऊंचे, तो ICE टेक्नोलॉजी का अनुपालन करना सस्ता पड़ेगा, और मानक E2Ws के लिए बाजार में कोई प्रोत्साहन नहीं पैदा करेंगे।

मुख़्तसर तौर पर, EV बाजार में तहे दिल से प्रवेश करने के लिए निर्माणकर्ताओं की अनिच्छा को दूर करने के दो विश्वसनीय तरीक़े हैं: एक जनादेश जो उन्हें EVsबनाने और बेचने के लिए मजबूर करता है, या फिर दक्षता मानकों को इतना कठोर/महत्वाकांक्षी बनाना कि EVS बनाना  और बेचना उनके लिए सबसे लाभदायक हो।

हम जानते हैं कि उदार राज्य और राष्ट्रीय प्रोत्साहन और 100 रुपये / लीटर से ऊपर पेट्रोल की कीमतों की वजह से E2W की टोटल कॉस्ट ऑफ़ ओनरशिप (स्वामित्व की कुल लागत) (TCO) पहले से ही पेट्रोल दोपहिया वाहनों की टक्कर में है। अब हमें यह पता चला है कि आज ख़रीदा गया E2W, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (GHG) में 34% -50% की पूर्ण कमी में योगदान देगा।

निष्कर्ष में, हम जानते हैं कि E2W आज स्वामित्व की कुल लागत के आधार पर लागत प्रभावी है, और इस दशक के अंत तक अपफ्रंट कॉस्ट पैरिटी (अग्रिम लागत समता) तक पहुंचने की संभावना रखते है। E2W GHG उत्सर्जन को कम करेगा और यदि टेलपाइप CO2 मानकों को कड़े स्तरों पर निर्धारित किया जाता है तो निर्माताकर्ताओं के लिए ऐसा करने के लिए एक लागत प्रभावी विकल्प होगा।

अब हमें ब्यूरो ऑफ़ एनर्जी एफिशिएंसी (ऊर्जा दक्षता ब्यूरो) (BEE) और मिनिस्ट्री ऑफ़ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाइवेज़ (सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय) (MoRTH) के 2025 में 25gCO2/km और 2030 में 20gCO2/km पर 2W ईंधन खपत मानकों को निर्धारित करने की आवश्यकता है। ऐसा करने से न केवल यह सुनिश्चित होगा कि 2025 में E2W का 30% शेयर और 2030 में E2W का 60% शेयर हो, बल्कि यह भारत के लिए 2035 तक सभी दोपहिया सेगमेंट में पूरी तरह से E2W में संक्रमण का मार्ग प्रशस्त करेगा।

अनूप बांदीवाडेकर

(लेखक अनूप बांदीवाडेकर यात्री वाहन कार्यक्रम और स्वच्छ परिवहन पर अंतर्राष्ट्रीय परिषद में भारत के निदेशक हैं)

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