पिघलते ग्‍लेशियर और जलवायु परिवर्तन की मार, कर रही है तीसरे पोल पर वार

Melting glaciers and climate change हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रंखलाओं में जलवायु परिवर्तन के फुटप्रिंट बिल्कुल खुलकर ज़ाहिर हो गये हैं। इस क्षेत्र को तीसरा पोल भी कहा जाता है और यहां ग्लेशियर पिघल रहे हैं, नुकसानदेह परिघटनाएं हो रही हैं, बर्फबारी की तर्ज में बदलाव हो रहे हैं। ये उन देशों के लिये बुरी …
पिघलते ग्‍लेशियर और जलवायु परिवर्तन की मार, कर रही है तीसरे पोल पर वार

Melting glaciers and climate change

हिमालय और काराकोरम पर्वत श्रंखलाओं में जलवायु परिवर्तन के फुटप्रिंट बिल्‍कुल खुलकर ज़ाहिर हो गये हैं। इस क्षेत्र को तीसरा पोल भी कहा जाता है और यहां ग्‍लेशियर पिघल रहे हैं, नुकसानदेह परिघटनाएं हो रही हैं, बर्फबारी की तर्ज में बदलाव हो रहे हैं। ये उन देशों के लिये बुरी खबर है जो पानी की आपूर्ति के लिये इन पर्वत श्रंखलाओं से निकलने वाली नदियों पर निर्भर करते हैं। साइंस नामक जर्नल में आज प्रकाशित ताजा अध्‍ययन ‘ग्‍लेशियो-हाइड्रोलॉजी ऑफ द हिमालया-काराकोरम’ में इस बात पर जोर दिया गया है कि वर्ष 2050 के दशक तक पिघलने वाले ग्‍लेशियर के कुल क्षेत्र और प्रवाह के मौसमीपन में बढ़ोत्‍तरी होने का अनुमान है। इसमें कुछ अपेक्षाएं और बड़ी अनिश्चितताएं शुमार होंगी।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान में असिस्‍टेंट प्रोफेसर और इस अध्‍ययन के मुख्‍य लेखक डॉक्‍टर फारूक आजम ने कहा,

‘‘हिमालय-काराकोरम पर्वत श्रंखलाओं के ग्‍लेशियर पिघलने से एक बिलियन से ज्‍यादा लोगों की पानी सम्‍बन्‍धी जरूरतें पूरी होती हैं। अगर इस पूरी सदी के दौरान ग्‍लेशियर का एक बड़ा हिस्‍सा पिघल जाता है और जरूरी मात्रा में पानी की आपूर्ति में धीरे-धीरे कमी हो जाती है तो इस आबादी पर गहरा असर पड़ेगा। हर साल जलापूर्ति पर पड़ने कुल असर में क्षेत्रवार बदलाव होता है। ग्‍लेशियर पिघलने से बना पानी और ग्‍लेशियर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, मुख्‍य रूप से मानसूनी बारिश के पानी से पोषित होने वाले गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन के मुकाबले सिंधु बेसिन पर पड़ने वाले असर कहीं ज्‍यादा अहम हैं। बारिश की तर्ज में बदलाव की वजह से इन दो नदी बेसिनों पर जलवायु परिवर्तन का असर ज्‍यादा पड़ता है।’’

हाल के वर्षों में किये गये विभिन्‍न अध्‍ययनों का विश्‍लेषण कर तैयार किये गये इस शोध पत्र में हिमालय-काराकोरम पर्वत श्रंखलाओं में जमे ग्‍लेशियर पर जलवायु सम्‍बन्‍धी विविध स्थितियों के पड़ने वाले प्रभावों को जाहिर किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि इसका नीचे बहने वाली नदियों पर क्‍या प्रभाव पड़ता है।

इस शोध पत्र के सह-लेखक और अमेरिका के प्‍लैनेटरी साइंस इंस्‍टीट्यूट से जुड़े जेफ कारगेल ने कहा

‘‘अधिक सटीक समझ तक पहुंचने के लिये अनुसंधान टीम ने 250 से अधिक अध्‍ययन पत्रों के निष्‍कर्षों को एकत्र किया। जो कुछ हद तक पर्यावरण के गर्म होने, उसके कारण बारिश की तर्ज में होने वाले बदलावों तथा ग्‍लेशियर के सिकुड़ने के बीच आपसी सम्‍बन्‍धों को लेकर एक आमराय पर पहुंचते दिखते हैं।’’

यह अध्‍ययन हमें एक बड़े फलक पर उभरी तस्‍वीर की बेहतर समझ मुहैया कराता है। साथ ही हमें यह भी बताती है कि कौन से ऐसे क्षेत्र हैं जहां क्षेत्रीय, दूर संवेदी तथा मॉडेलिंग शोध की जरूरत है। शोधकर्ताओं ने जानकारी के जिन अंतरों को पहचाना, उनमें ग्‍लेशियर की कुल मात्रा के सटीक निरूपण (रिप्रेजेंटेशंस) की कमी, क्षेत्र में वर्षा प्रवणता की विस्‍तृत समझ और पर्माफ्रॉस्‍ट, सबलाइमेशन, ग्लेशियर की गतिकी (डायनेमिक्‍स), ब्लैक कार्बन और मलबे के आवरण की भूमिका पर महत्वपूर्ण अध्ययन की विस्‍तृत समझ शामिल है।

शोधकर्ताओं ने इन अंतरों को पाटने के लिये बहुस्‍तरीय रवैया अपनाने का सुझाव दिया है। स्‍तर-1 में एक विस्‍तृत पर्यवेक्षण नेटवर्क शामिल है जिसके तहत चुनिंदा ग्‍लेशियरों पर पूर्ण स्‍वचालित मौसम केन्‍द्र स्‍थापित किये जाएंगे।

उन्‍होंने ग्‍लेशियर (Glaciers) के क्षेत्र और मात्रा, ग्‍लेशियर डायनेमिक्‍स, पर्माफ्रॉस्‍ट  के पिघलने और बर्फ तथा हिम के सबलाइमेशन के परीक्षण के लिये तुलना करने वाली परियोजनाएं विकसित करने का भी सुझाव दिया है। इस बीच, स्‍तर-2 के तहत भविष्‍य में होने वाले बदलावों के अनिश्चितताओं को कम करने के लिये ग्‍लेशियर हाइड्रोलॉजी के विस्‍तृत मॉडल बनाने के लिये इस ज्ञान को अमली जामा पहनाने की सिफारिश की गयी है।

हिमालय-काराकोरम नदी बेसिन 27 लाख 50 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। इसमें 577000 वर्ग किलोमीटर का सबसे बड़ा कृषि क्षेत्र है जो दिल्‍ली, ढाका, कराची, कोलकाता और लाहौर जैसे पांच महानगरों को पोषित करता है। इन नगरों की आबादी 9 करोड़ 40 लाख से ज्‍यादा है और इसी क्षेत्र में 26,432 मेगावॉट वाली दुनिया की सबसे बड़ी पनबिजली क्षमता स्‍थापित है।

डॉक्‍टर आजम ने कहा,

‘‘जहां जलवायु परिवर्तन के कारण ग्‍लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिनसे हिमालय-काराकोरम पर्वत श्रंखलाओं में नदियों के प्रवाह पर फर्क पड़ा, वहीं इसकी वजह से पर्वतों से सम्‍बन्धित हानिकारक घटनाएं पहले से ज्‍यादा हो रही हैं। चमोली जिले में हाल में आयी प्राकृतिक आपदा चीख-चीखकर कह रही है कि हिमालय के कमजोर हो चुके पहाड़ों पर अब और विकास परियोजनाएं न बनायी जाएं।’’

डॉक्‍टर आजम ने एक अन्‍य शोध पत्र ‘अ मैसिव रॉक एण्‍ड आइस एवेलांच कॉज्‍ड द 2021 डिजास्‍टर ऐट चमोली, इंडियन हिमालय’ का भी सह लेखन किया है। साइंस जर्नल में आज इसे भी प्रकाशित किया गया है। इस शोध पत्र में बताया गया है कि गढ़वाल हिमालय क्षेत्र स्थित चमोली में फरवरी 2021 में आयी उस आपदा का क्‍या कारण था, जिसमें 200 से ज्‍यादा लोग लापता हुए या मारे गये और दो हाइड्रोपॉवर परियोजनाओं को गम्‍भीर क्षति पहुंची।

शोधकर्ताओं ने सेटेलाइट चित्रों, भूकम्‍प सम्‍बन्‍धी अभिलेखों, मॉडेलिंग के नतीजों तथा चश्‍मदीद लोगों के वीडियो के आधार पर खुलासा किया है कि चट्टान और ग्‍लेशियर की बर्फ का 27X106 घन मीटर का एक टुकड़ा टूटने से बहुत भारी मात्रा में मलबा बह निकला, जो घाटी की दीवारों को 220 मीटर तक रगड़ता हुआ अपने साथ बहुत भारी पत्‍थरों को बहा लाया। खतरे के प्रतिच्‍छेदन (इंटरसेक्‍शन) और नीचे घाटी पर बने ढांचे की अवस्थिति ने आपदा की तीव्रता को और बढ़ा दिया। इससे इन क्षेत्रों में पर्याप्‍त मॉनीटरिंग (जिसमें इन बढ़ते हुए खतरों को विचार के दायरे में शामिल किया जाता है) और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के आकलन को ध्‍यान में रखते हुए सतत विकास की जरूरत का एहसास होता है।

शोध पत्र के मुख्‍य लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी से जुड़े डैन शुगर ने इस बात की पुष्टि की है कि किसी भी आकार की कोई भी ग्‍लेशियल झील नहीं है जो स्‍थल के नजदीक कहीं पर भी बाढ़ लाने के लिये काफी हो।

उन्‍होंने कहा

‘‘आपदा की शुरुआत वाली सैटेलाइट से प्राप्‍त हाई रिजॉल्‍यूशन वाली तस्‍वीरें घटना को लगभग सजीव रूप में समझने में हमारी मदद करती हैं। हमने एक खड़ी ढलान की ऊंचाई पर स्‍पष्‍ट रूप से जाहिर हो रहे धूल और पानी के ढेर को देखा। यह विकराल भूस्‍खलन का मुख्‍य स्रोत था जिसकी वजह से आपदा का सिलसिला शुरू हुआ, जो भारी जनहानि और विध्‍वंस का कारण बना।’’

दोनों ही शोधपत्रों से सम्‍बन्धित वैज्ञानिकों में एक आमराय है कि जानकारी के चिह्नित अंतरों को पाटने के लिये रिमोट सेंसिंग और मॉडेलिंग अनुसंधान को और बेहतर बनाने की जरूरत है। इस बेहद नाजुक क्षेत्रों में आपदा के खतरे बढ़ने के अनुमान हैं। चाहे वह नदी में जल आपूर्ति में विभिन्‍नताओं की बात हो या फिर चमोली जैसी आपदाओं की, नीति निर्धारकों को विकास और जल सम्‍बन्‍धी मंसूबे बनाते वक्‍त इससे जुड़ी अनिश्चितताओं को भी ध्‍यान में रखना होगा।

यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न ब्रिटिश कोलम्बिया में असिस्‍टेंट प्रोफेसर और हिमालय-काराकोरम अध्‍ययन के सह-लेखक जोसेफ शे कहते हैं,

‘‘इस क्षेत्र की प्रमुख पर्वत श्रंखलाएं मानसून और सर्दियों के तूफानों के साथ आने वाली नमी को रोकने के लिये विशाल अवरोधक की तरह काम करती हैं। एक-दूसरे से सटे बेसिन भी दरअसल पर्यावरण में होने वाली इन तीव्र विविधताओं के कारण अलग-अलग प्रतिक्रिया दे सकते हैं।”

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान में पीएचडी की छात्रा और हिमालय-काराकोरम शोध पत्र की सह-लेखक स्‍मृति श्रीवास्‍तव  कहती हैं,

“21वीं सदी में नदी अपवाह की मात्रा और मौसमीपन के अनुमानित रुझान, जलवायु परिवर्तन परिदृश्‍यों की एक पूरी श्रंखला में निरन्‍तरता लिये हुए हैं। वर्ष 2050 के दशक तक नदी के कुल अपवाह, ग्‍लेशियर के पिघलने की रफ्तार और प्रवाह के मौसमीपन में बढ़ोत्‍तरी का अनुमान है। इसमें कुछ अपवाद और बड़ी अनिश्चितताएं भी होंगी।”

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