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इस साल की जुलाई पिछले सवा लाख साल में सबसे गर्म होगी

बीते सवा लाख सालों में, इस साल की जुलाई महीना दुनिया के लिए सबसे गर्म महीना साबित हो सकता है। जर्मनी की लाइपजिग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल की जुलाई का औसत तापमान पिछले सबसे गर्म जुलाई के 0.2°C ऊपर है।

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hastakshep
28 Jul 2023
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इस साल की जुलाई पिछले सवा लाख साल में सबसे गर्म होगी

2019 की जुलाई को पछाड़ा 2023 की जुलाई ने 

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बीते सवा लाख सालों में, इस साल की जुलाई महीना दुनिया के लिए सबसे गर्म महीना साबित हो सकता है। जर्मनी की लाइपजिग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल की जुलाई का औसत तापमान पिछले सबसे गर्म जुलाई के 0.2°C ऊपर है। वैज्ञानिकों ने इस वृद्धि को मानव गतिविधियों के प्रभाव के लिए जिम्मेदार ठहराया है। लाइपजिग यूनिवर्सिटी के विश्लेषण के मुताबिक, यह इतनी गर्मी सवा लाख सालों में पहली बार हो रही है। 

भारत को भी इस बदलती जलवायु का प्रभाव महसूस हो रहा है। भूस्खलन, बाढ़, और अन्य अप्रत्याशित मौसमी घटनाएं देश भर में हो रही हैं। उत्तर भारत में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, और असम में भूस्खलन और बाढ़ से कई लोगों को मौत का सामना करना पड़ा। राज्यों में बारिश के कारण फसलों को नुकसान हुआ और कई इलाके पानी में डूब गए। बारिश के प्रभाव से बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय भी लिया गया।

नई दिल्ली, 28 जुलाई 2023. जर्मनी की लाइपजिग यू‍नीवर्सिटी में हुए ताज़ा शोध की मानें तो इस साल, बीते लगभग सवा लाख साल बाद जुलाई का महीना सबसे गर्म रहेगा।

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अब तक साल 2019 की जुलाई सबसे गर्म जुलाई का महीना थी। मगर इस साल, जुलाई का औसत तापमान 2019 के मुक़ाबले 0.2°C बढ़ा गया है और वैज्ञानिकों की मानें तो गर्मी की ऐसी मार के लिए मानव गतिविधियां सीधे तौर पर ज़िम्मेदार हैं। इस बात के लिए वैज्ञानिकों ने भी चेताया कि आने वाले समय में स्थितियाँ और भी गंभीर हो सकती हैं।

दरअसल, लाइपजिग यू‍नीवर्सिटी में कार्यरत जलवायु वैज्ञानिक डॉक्‍टर कास्‍टन हौशटाइन द्वारा प्रकाशित एक विश्‍लेषण के मुताबिक एक लाख 20 हजार वर्षों में इस साल जुलाई का महीना सबसे गर्म माह होगा। ऐसा इसलिये है क्‍योंकि मौजूदा औसत तापमान कोयला, तेल और गैस को जलाने तथा प्रदूषण फैलाने वाली अन्‍य इंसानी गतिविधियों के कारण पैदा हालात के मुकाबले करीब डेढ़ डिग्री सेल्सियस ज्‍यादा है।

हाल के वर्षों में वैश्विक तापमान में वृद्धि के बावजूद ला नीना (ठंड) के प्रभाव के कारण दुनिया पर इसका असर अपेक्षाकृत कम ही रहा। अब, जब दुनिया अल नीनो (गर्मी) के दौर में दाखिल हो रही है, तब ग्‍लोबल वार्मिंग के नयी ऊंचाईयों पर पहुंचने के आसार प्रबल हो जाएंगे।

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जुलाई ने आग लगाई

जुलाई के महीने में वैश्विक स्‍तर पर हुई चरम मौसमी घटनाओं और उनके बुरे नतीजों की एक सूची यहां देखी जा सकती है। इस महीने तापमान में डेढ़ डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने का यह मतलब नहीं है कि दुनिया की सरकारें पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लक्ष्‍य को हासिल करने में स्‍थायी रूप से नाकाम हो चुकी हैं। ऐसा इसलिये क्‍योंकि वैश्विक स्‍तर पर औसत वार्मिंग को दीर्घकालिक समय मापदंड पर नापा जाता है। ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी एक महीने में तापमान में पूर्व-औद्योगिक औसत के मुकाबले डेढ़ डिग्री सेल्सियस से ज्‍यादा इजाफा हुआ हो। इससे पहले वर्ष 2016 और 2020 में भी ऐसा हो चुका है। यह अलग बात है कि उत्‍तरी गोलार्द्ध में गर्मी के दौरान ऐसा पहली बार हुआ है। मगर जो ख़ास बात है वो ये है कि इस महीने तापमान में हुई वृद्धि सहमत अधिकतम दीर्घकालिक स्तर पर है। यह इस तथ्य को जाहिर करता है कि हालांकि सीमा अभी तक नहीं टूटी है मगर एमिशन में कटौती की कार्रवाई अब भी नाकाफी है और दुनिया पेरिस समझौते के लक्ष्‍य को हासिल करने में नाकाम होने की तरफ बढ़ रही है। अन्‍य जलवायु वैज्ञानिकों ने इस बात के लिये आगाह किया था कि जुलाई अब तक का सबसे गर्म महीना होने वाला है लेकिन डॉक्‍टर हौशटाइन के विश्‍लेषण में इसकी पुष्टि सबसे पहले की गयी थी और इस महीने के औसत तापमान का पूर्वानुमान पेश किया गया था।

भारत पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

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बारिश की तीव्रता और हीटवेव की आवृत्तियों में बढ़ोत्‍तरी सीधे तौर पर समुद्र और सतह के तापमान में वृद्धि का प्रभाव हैं। बात सीधे तौर पर भारत की करें तो जलवायु परिवर्तन की वजह से पैदा होने वाली वार्मिंग के कारण भारत में मानसून जानलेवा आफत बन गया है और बारिश की तर्ज में बदलाव की वजह से जगह-जगह बाढ़ का खतरा भी बढ़ गया है। गर्मी ज्‍यादा होने की वजह से वातावरण में और अधिक नमी भर जाती है। इसकी वजह से मौसम सम्‍बन्‍धी अप्रत्‍याशित घटनाएं होती हैं, जैसा कि उत्‍तर-पश्चिमी भारत में हुआ भी है। बढ़ती गर्मी की वजह से न सिर्फ मानसून की परिवर्तनशीलता बढ़ी है बल्कि बारिश को लेकर सही पूर्वानुमान लगाना भी पहले से ज्‍यादा मुश्किल हो गया है।

नीति स्तर पर कार्यवाही हुई बेअसर?

जहां एक ओर बदलती जलवायु डराने वाले स्वरूप ले रही है, वहीं इस दिशा में वैश्विक नीति निर्माण में नीति निर्माता सहमति नहीं बना पा रहे हैं। कुछ दिन पहले गोवा में खत्म हुई जी20 की ऊर्जा क्षेत्र की बैठक में जलवायु कार्यवाही को लेकर आम सहमति नहीं बन पाई।

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फिलहाल चेन्नई में जी 20 की पर्यावरण और जलवायु से जुड़े वर्किंग ग्रुप की बैठक चल रही है। इसके नतीजे पर सबकी नज़र बनी हुई है। ध्यान रहे, इस बीच अमरीकी सरकार के जलवायु दूत जॉन केरी भी जलवायु कार्यवाही से जुड़ी वार्ताओं के लिए दिल्ली में हैं। साल के अंत में, नवंबर में संयुक्त राष्ट्र की सालाना जलवायु वार्ता दुबई में होनी है। जी 20 बैठकों के नतीजे दुबई में होने वाली जलवायु वार्ता की दशा और दिशा निर्धारित करेंगे।  

एक नजर जुलाई के चरम मौसम घटनाक्रम पर

· 25 जुलाई: कावेरी नदी उफान पर रही और यमुना 13 जुलाई को दिल्‍ली में अब तक सर्वोच्‍च स्‍तर पर पहुंचने के बाद फिर खतरे के निशान से ऊपर रही। हवेरी जिले में बाढ़ के कारण गिरे मकान के मलबे में दबने से तीन साल के एक बच्‍चे की मौत हो गयी। तेलंगाना के वारंगल में सड़कें लबालब हो गयीं। गंगा नदी हरिद्वार में खतरे के निशान से ऊपर रही। फरीदकोट में सैलाब का मंजर था, हिमाचल प्रदेश में एक बांध क्षतिग्रस्‍त हुआ और ओवरफ्लो करने लगा, मकान और फसलें तबाह हो गईं, दो पुल पूरी तरह बह गये हैं, मवेशी मारे गये, कुछ सड़कें भी क्षतिग्रस्‍त हो गईं, बिजली की आपूर्ति व्‍यवस्‍था को नुकसान हुआ, कर्नाटक में चार लोगों की मौत हुई, हैदराबाद में जगह-जगह जलभराव हो गया और उत्‍तराखण्‍ड में भूस्‍खलन से अनेक सड़कों पर रास्‍ता बंद हो गया।

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· 24 जुलाई : उत्तर प्रदेश में सात लोगों की मौत, गुजरात में मकान ढहने से दो बच्चों सहित चार की मौत, उडपी में तीन लोग डूबे, हिमाचल प्रदेश में घर नष्ट हो गए और मवेशी मारे गये, महाराष्ट्र में 13,000 हेक्टेयर फसल बर्बाद हो गई, वहीं राज्य में स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए, मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर भूस्खलन हुआ, कर्नाटक में निचले इलाकों में बाढ़ आ गई, राज्य में स्कूल बंद कर दिये गये, सड़क क्षतिग्रस्त होने से कमेरा में तीर्थयात्रा बाधित, केरल में तीन युवाओं की मौत, स्कूल भी हुए बंद, गुजरात में 24 घंटे में नौ लोगों की मौत, उत्तराखंड में भूस्खलन से सड़कें अवरुद्ध हो गईं, दिल्ली में ट्रेनों का मार्ग बदला गया, यमुनोत्री राजमार्ग और अन्य मार्ग अवरुद्ध हो गए, दिल्ली में घर में भरे पानी में डूबने से तीन साल के बच्चे की मौत हो गई।

· 20 जुलाई : सरकार ने बारिश की वजह से उत्पादन में कमी की आशंका के कारण गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की, जिससे घबराकर लोगों ने इसकी खरीदारी शुरू कर दी और कीमतें बढ़ गईं।

· 19 जुलाई : महाराष्‍ट्र में भूस्‍खलन के भारी मलबे में दबकर कम से कम 16 लोगों की मौत हो गयी। स्‍थानीय बचावकर्ताओं का अनुमान है कि इस घटना में 60 से 70 लोगों की मृत्‍यु हुई है।

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· 16 जुलाई: कम से कम 15 लोग मारे गये हैं; 11,543 लोगों को निकालकर सुरक्षित स्‍थानों पर भेजा गया और 126,305 लोग प्रभावित हुए (ज्यादातर असम और उत्तर प्रदेश में)

· 12-16 जुलाई: दिल्ली में गैर-जरूरी सरकारी कार्यालय, स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए और लोगों को घर से काम करने की सलाह दी गई।

· 13 जुलाई : पिछले दो हफ्तों के दौरान उत्तर भारत के बड़े हिस्से में 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई - खासतौर से हिमाचल प्रदेश में। भारी बारिश और भूस्खलन से लगभग 170 घर ढह गए और अन्य 600 आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए। इसके अलावा, जल आपूर्ति में एक चौथाई की गिरावट आई क्योंकि ट्रीटमेंट प्‍लांट्स में पानी भर गया था। टमाटर जैसी फसलें भी प्रभावित हो रही हैं, प्रमुख उत्पादक राज्यों में चरम मौसम की घटनाओं के कारण कीमतों में 400% की वृद्धि हो रही है।

· 12 जुलाई : देश के नौ राज्‍यों में 460 इमारतें आंशिक रूप से या पूरी तरह क्षतिग्रस्‍त हो गयीं।

· 7-10 जुलाई: व्‍यास नदी उफान पर आ गई। इससे नई दिल्ली के उत्तर में आसपास के इलाकों में बाढ़ आ गई, जिससे वाहन तैरने लगे। बाढ़ के कारण कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई।

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