Home » Latest » नौ महीने शेष हैं : क्या हम एड्स-संबंधित 2020 लक्ष्य को पूरा कर पाएंगे? दुनिया की एक-चौथाई आबादी को लेटेंट टीबी है
AIDS

नौ महीने शेष हैं : क्या हम एड्स-संबंधित 2020 लक्ष्य को पूरा कर पाएंगे? दुनिया की एक-चौथाई आबादी को लेटेंट टीबी है

Nine months left: will we be able to meet the AIDS-related 2020 target?

यदि अन्य स्वास्थ्य मुद्दों से तुलना की जाये तो यह सही है कि एचआईवी/एड्स कार्यक्रम (HIV / AIDS program) ने पिछले अनेक सालों में अद्वितीय सफलता हासिल की है. एचआईवी रोकथाम (HIV prevention) के लिए बेमिसाल अभियान चले, नि:शुल्क जांच और विश्व में लगभग 2 करोड़ लोगों को जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवा (Life-saving antiretroviral drug) मिली, वैज्ञानिक शोध के जरिये बेहतर दवाएं मिली, मानवाधिकार के अनेक जटिल मुद्दे उठे (जैसे कि, लिंग-जनित और यौनिक समानता), आदि.

सबसे महत्वपूर्ण है कि आज यदि मानक के अनुसार जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवा और अन्य देखभाल मिले, तो एचआईवी के साथ जीवित व्यक्ति का वायरल लोड नगण्य रहेगा, वह एक सामान्य ज़िन्दगी जी सकता है, और उससे किसी को भी एचआईवी संक्रमण नहीं फैलेगा. परन्तु नए एचआईवी संक्रमण दर अभी भी अत्याधिक चिंताजनक है. एक ओर एचआईवी के साथ जीवित लोगों को स्वस्थ रखने की दिशा में सराहनीय प्रयास हुए, वहीं दूसरी ओर, विराट चुनौतियाँ अभी भी हैं.

The progress made in AIDS control is not the same everywhere

एड्स नियंत्रण में जो प्रगति हुई है वह भी सब जगह एक समान नहीं है, किसी देश में अधिक तो किसी में कम, या किसी समुदाय-विशेष में कम. जैसे कि, जिन समुदाय को एचआईवी संक्रमण का खतरा (Risk of HIV infection) ज्यादा है उनमें अक्सर एचआईवी कार्यक्रम की सेवाएँ असंतोषजनक रही हैं.

पिछले चंद सालों में एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र में, नए एचआईवी संक्रमण दर में, अपेक्षित गिरावट नहीं आई है. बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस में तो नए एचआईवी संक्रमण दर में बढ़ोतरी हो रही है. 2010 से एड्स-मृत्यु दर में 24% गिरावट आई है क्योंकि जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवा अधिक लोगों तक पहुँच रही है. परन्तु चंद देशों में मृत्यु दर में बढ़ोतरी हो गयी है जैसे कि अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और फिलीपींस.

जिनेवा-स्थित इंटरनेशनल एड्स सोसाइटी-International AIDS Society (आईएएस) की अध्यक्षीय समिति में एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र से निर्वाचित डॉ ईश्वर गिलाडा, एपीसीआरएसएचआर-10 (APCRSHR10) डायलॉग्स में प्रमुख वक्ता थे. यह ऑनलाइन सेमिनार, कोरोना वायरस की चुनौती के बावजूद, 10वें एशिया पैसिफिक कांफ्रेंस ऑन रिप्रोडक्टिव एंड सेक्सुअल हेल्थ और राइट्स (APCRSHR10) और सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित था.

संयुक्त राष्ट्र के एड्स कार्यक्रम (यूएन-एड्स) के मुताबिक, एशिया पैसिफिक क्षेत्र में तीन-चौथाई नए एचआईवी संक्रमण उन समुदाय में हो रहे हैं जिनमें एचआईवी संक्रमण का खतरा ज्यादा है जैसे कि, ट्रांसजेंडर (हिजरा) और समलैंगिक समुदाय, यौन-कर्मी, नशा करने वाले लोग, घुमंतू मेहनतकश मजदूर, आदि. हर देश को प्रयास करना चाहिए कि विधिक और अन्य नीतियां, स्वास्थ्य नीतियों के अनुकूल हों जिससे कि ज़रूरतमंद लोग स्वास्थ्य सेवा का लाभ उठा सकें जिनमें एचआईवी सेवाएँ भी शामिल हैं.

डॉ ईश्वर गिलाडा ने कहा कि

“2020 तक, विश्व में नए एचआईवी संक्रमण दर और एड्स मृत्यु दर को 5 लाख से कम करने के लक्ष्य से हम अभी दूर हैं. 2018 में नए 17 लाख लोग एचआईवी संक्रमित हुए और 7.7 लाख लोग एड्स से मृत. दुनिया में 3.79 करोड़ लोग एचआईवी के साथ जीवित हैं. भारत में अनुमानित है कि 21.4 लाख लोग एचआईवी के साथ जीवित हैं, जिनमें से 13.45 लाख लोगों को जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवा प्राप्त हो रही है. एक साल में 88,000 नए लोग एचआईवी से संक्रमित हुए और 69,000 लोग एड्स से मृत.”

34 साल पहले जब भारत में पहले एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई थी, तब डॉ ईश्वर गिलाडा, देश के उन चिकित्सकों में शामिल थे जिन्होंने आगे बढ़ कर, एचआईवी के चिकित्सकीय देखभाल पर कार्य आरम्भ किया था.

डॉ ईश्वर गिलाडा, एड्स सोसाइटी ऑफ़ इंडिया AIDS Society of India (एचआईवी चिकित्सकों एवं शोधकर्ताओं की राष्ट्रीय संस्था) के अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने कहा कि भारत सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (Government of India National Health Policy 2017) और संयुक्त राष्ट्र के एड्स कार्यक्रम (UNAIDS) दोनों के अनुसार, 2020 तक एचआईवी का 90-90-90 का लक्ष्य पूरा करना है और सिर्फ 9 महीने शेष रह गए हैं:

2020 तक 90% एचआईवी पॉजिटिव लोगों को यह पता हो कि वे एचआईवी पॉजिटिव हैं; जो लोग एचआईवी पॉजिटिव चिन्हित हुए हैं उनमें से कम-से-कम  90% को एंटीरेट्रोवायरल दवा मिल रही हो; और जिन लोगों को एंटीरेट्रोवायरल दवा मिल रही है उनमें से कम-से-कम 90% लोगों में वायरल लोड नगण्य हो. वायरल लोड नगण्य रहेगा तो एचआईवी संक्रमण के फैलने का खतरा भी नगण्य रहेगा, और व्यक्ति स्वस्थ रहेगा.

डॉ गिलाडा ने बताया कि विश्व में 79% एचआईवी पॉजिटिव लोगों को एचआईवी टेस्ट सेवा मिली, जिनमें से 62% को एंटीरेट्रोवायरल दवा मिल रही है और 53% लोगों में वायरल लोड नगण्य है.

एशिया पैसिफिक क्षेत्र में, 59 लाख लोग एचआईवी के साथ जीवित हैं जिनमें से 69% को एचआईवी पॉजिटिव होने की जानकारी है, 78% को जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवा मिल रही है और 49% का वायरल लोड नगण्य है.

एचआईवी पॉजिटिव लोगों में सबसे बड़ा मृत्यु का कारण क्यों हैं टीबी? | Why is TB the leading cause of death among HIV positive people?

टीबी से बचाव मुमकिन है और इलाज भी संभव है. तब क्यों एचआईवी पॉजिटिव लोगों में टीबी सबसे बड़ा मृत्यु का कारण बना हुआ है?

सीएनएस निदेशिका शोभा शुक्ला ने बताया कि 2018 में 15 लाख लोग टीबी से मृत हुए जिनमें से 2.5 लाख लोग एचआईवी से भी संक्रमित थे (2017 में 16 लाख लोग टीबी से मृत हुए जिनमें से 3 लाख लोग एचआईवी से संक्रमित थे).

हर नया टीबी रोगी, पूर्व में लेटेंट टीबी से संक्रमित हुआ होता है। और हर नया लेटेंट टीबी से संक्रमित रोगी इस बात की पुष्टि करता है कि संक्रमण नियंत्रण निष्फल था जिसके कारणवश एक टीबी रोगी से टीबी बैक्टीरिया एक असंक्रमित व्यक्ति तक फैला।

लेटेंट टीबी, यानि कि, व्यक्ति में टीबी बैकटीरिया तो है पर रोग नहीं उत्पन्न कर रहा है। इन लेटेंट टीबी से संक्रमित लोगों में से कुछ को टीबी रोग होने का ख़तरा रहता है। जिन लोगों को लेटेंट टीबी के साथ-साथ एचआईवी, मधुमेह, तम्बाकू धूम्रपान का नशा, या अन्य ख़तरा बढ़ाने वाले कारण भी होते हैं, उन लोगों में लेटेंट टीबी के टीबी रोग में परिवर्तित होने का ख़तरा बढ़ जाता है।

दुनिया की एक-चौथाई आबादी को लेटेंट टीबी है। पिछले 60 साल से अधिक समय से लेटेंट टीबी के सफ़ल उपचार हमें ज्ञात है पर यह सभी संक्रमित लोगों को मुहैया नहीं करवाया गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2018 मार्गनिर्देशिका के अनुसार, लेटेन्ट टीबी उपचार हर एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को मिले, फेफड़े के टीबी रोगी, जिसकी पक्की जांच हुई है, उनके हर परिवार सदस्य को मिले, और डायलिसिस आदि करवा रहे लोगों को भी दिया जाए.

सीएनएस निदेशिका शोभा शुक्ला ने कहा कि

“यह अत्यंत आवश्यक है कि एचआईवी से संक्रमित सभी लोगों को उनके संक्रमण के बारे में जानकारी हो, उन्हें एआरटी दवाएं मिल रही हों, और उनका वायरल लोड नगण्य रहे तथा वह टीबी से बचें, अन्यथा एचआईवी रोकधाम में जो प्रगति हुई है वो पलट सकती है, जो नि:संदेह अवांछनीय होगा.”

डॉ गिलाडा ने कहा कि आज एचआईवी संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित अनेक नीति और कार्यक्रम हमें ज्ञात हैं। हमें यह भी पता है कि कैसे एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति भी एक स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सकते हैं। परन्तु जमीनी हकीकत भिन्न है. यदि हम प्रमाणित नीतियों और कार्यक्रमों को कार्यसाधकता के साथ लागू नहीं करेंगे तो 2030 तक एड्स-मुक्त कैसे होंगे?

विश्व टीबी दिवस 2020 | World TB Day 2020

विश्व टीबी दिवस, 24 मार्च 2020 को है. टीबी से बचाव मुमकिन है. टीबी की पक्की जांच और पक्का इलाज मुमकिन है और सरकारी स्वास्थ्य सेवा में नि:शुल्क उपलब्ध है. परन्तु आज भी टीबी क्यों एचआईवी पोसिटिव लोगों में सबसे बड़ा मृत्यु का कारण बना हुआ है? इमानदारी से मूल्याङ्कन की ज़रूरत है जिससे कि स्वास्थ्य सुरक्षा सभी को मिल सके, संक्रमण दर पर अंकुश लग सके और सतत विकास लक्ष्य पर हम सब खरे उतर सकें.

बॉबी रमाकांत – सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस)

(विश्व स्वास्थ्य संगठन महानिदेशक द्वारा पुरुस्कृत, बॉबी रमाकांत, सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) और आशा परिवार से जुड़े हैं.

हमारे बारे में hastakshep

Check Also

पलाश विश्वास जन्म 18 मई 1958 एम ए अंग्रेजी साहित्य, डीएसबी कालेज नैनीताल, कुमाऊं विश्वविद्यालय दैनिक आवाज, प्रभात खबर, अमर उजाला, जागरण के बाद जनसत्ता में 1991 से 2016 तक सम्पादकीय में सेवारत रहने के उपरांत रिटायर होकर उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर में अपने गांव में बस गए और फिलहाल मासिक साहित्यिक पत्रिका प्रेरणा अंशु के कार्यकारी संपादक। उपन्यास अमेरिका से सावधान कहानी संग्रह- अंडे सेंते लोग, ईश्वर की गलती। सम्पादन- अनसुनी आवाज - मास्टर प्रताप सिंह चाहे तो परिचय में यह भी जोड़ सकते हैं- फीचर फिल्मों वसीयत और इमेजिनरी लाइन के लिए संवाद लेखन मणिपुर डायरी और लालगढ़ डायरी हिन्दी के अलावा अंग्रेजी औऱ बंगला में भी नियमित लेखन अंग्रेजी में विश्वभर के अखबारों में लेख प्रकाशित। 2003 से तीनों भाषाओं में ब्लॉग

नरभक्षियों के महाभोज का चरमोत्कर्ष है यह

पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की …