अच्छे दिन : अबकी बार नीतीश कुमार की “नीतीशकुमार-मुक्त” भाजपा सरकार

Nitish Kumar Bihar CM

और अंत में अकाली दल, शिव सेना आदि की तरह, जदयू को भी भाजपा एक दिन बाहर का दरवाजा दिखा ही देगी।

आखिरकार, मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार की लगातार चौथी पारी (Nitish Kumar‘s fourth consecutive innings as Chief Minister) शुरू हो गयी है। सोमवार को दोपहर बाद, उन्होंने सातवीं बार, पद और गोपनीयता की शपथ ली। इससे एक दिन पहले, जैसाकि व्यापक  रूप से अनुमान लगाया जा रहा था, एनडीए विधायकों की बैठक में नीतीश कुमार को नेता चुन लिया गया।

याद रहे कि विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद और खासतौर पर जदयू-भाजपा गठजोड़ में, जदयू की सीटें पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़े से काफी नीचे खिसक कर 43 सीटों पर ही सिमट जाने और दूसरी ओर, भाजपा की सीटें उसी अनुपात में बढ़कर 74 हो जाने की पृष्ठभूमि में, भाजपा में कम से कम अनौपचारिक रूप से तथा नेतृत्व में मंझले स्तरों तक, इसके चर्चे शुरू हो गए थे कि विधानसभा में उल्लेखनीय रूप से कम ताकतवाली पार्टी, गठबंधन सरकार में नेतृत्व कैसे संभाल सकती है! यानी नीतीश राज के प्रति जनता की नाराजगी की पृष्ठभूमि में, चिराग पासवान के जदयू-विरोधी अभियान की मदद से, सत्ताधारी गठजोड़ में जो इंजीनियरिंग की गयी थी, उस कामयाबी का सुफल भाजपा को बिहार की नयी सरकार में भी मिलना ही चाहिए!

         बेशक भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इन पुकारों और तथाकथित मांगों की जितनी उतावली का प्रदर्शन न करते हुए, नीतीश कुमार के ही गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री पद संभालने के एलान किए थे और नीतीश कुमार को लगातार चौथी पारी का मौका मिलने का भरोसा दिया था। फिर भी जाहिर है कि इस पूरे प्रसंग ने, जो वास्तव में गठजोड़ में ‘‘बड़ा भाई’’ बनने की खुशी में बहुत हद तक खुद भाजपा नेतृत्व द्वारा ही प्रायोजित किया गया था, इस सचाई को बलपूर्वक रेखांकित तो कर ही दिया कि इन हालात में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद सोंपा जाना, कोई सामान्य स्थिति नहीं है।

Nitish Kumar’s fourth innings as Chief Minister is being received by the BJP’s unusual generosity or “grace”.

नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में चौथी पारी, भाजपा की असामान्य उदारता या ‘‘कृपा’’ से ही मिल रही है। नीतीश कुमार ने भी एनडीए विधायक दल की बैठक में यह कहकर कि उन्होंने तो भाजपा के मुख्यमंत्री पद संभालने का सुझाव दिया था और उन्होंने अब भाजपा नेताओं के आग्रह पर ही मुख्यमंत्री पद संभालने के लिए हामी भरी है, कम से कम भाजपा की विशेष कृपा का उन्हें भी एहसास होने का तो सबूत दिया ही था।

         बहरहाल, शपथग्रहण के साथ ही भाजपा ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसकी विशेष कृपा की हद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद देने तक ही है। वर्ना गठबंधन सरकार में न सिर्फ आम तौर पर, घटक दलों की ताकतों के मौजूदा संतुलन का अभिव्यक्ति होना सुनिश्चित करना होगा बल्कि मुख्यमंत्री पद के त्याग के लिए, भाजपा की क्षतिपूर्ति भी करनी होगी। इसीलिए, नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद पर होने को प्रति-संतुलित करने के लिए, इस बार भाजपा ने दो-दो उपमुख्यमंत्री बनवाए हैं–तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी। इन दोनों का ही चुनाव, जो न तो विधानसभा में भाजपा के सबसे वरिष्ठ सदस्यों में थे और न  ही राज्य में पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं में थे, नीतीशोत्तर दौर के लिए सामाजिक समीकरणों को साधने के, भाजपा के हितों को ध्यान में रखकर किया गया है।

तारकिशोर प्रसाद, यादव-इतर अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं, जिस वर्ग से खुद नीतीश कुमार आते हैं। और रेणु देवी, अति-पिछड़ा वर्ग या ईबीसी से आती हैं, जिसे नीतीश कुमार द्वारा अपने लिए सचेत रूप से गढ़ा गया समर्थन आधार माना जाता है।

संक्षेप में यह कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में जदयू के साथ गठबंधन, भाजपा को बिहार में जिन तबकों के समर्थन तक पहुंच हासिल कराता आया है, अपने दो उपमुख्यमंत्रियों के जरिए भाजपा ने ठीक उन्हीं सामाजिक तबकों तक सीधे पहुंचने की तैयारियां नयी सरकार के गठन के साथ ही शुरू भी कर दी हैं।

फिर भी नीतीश कुमार के साथ सिर्फ दो-उपमुख्यमंत्रियों को ही शपथ नहीं दिलायी गयी है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्रियों के अलावा, भाजपा तथा जदयू के पांच-पांच और हम तथा वीआइपी पार्टी के एक-एक मंत्री को भी शपथ दिलायी गयी। इस तरह, पंद्रह सदस्यीय मंत्रिमंडल में, सबसे ज्यादा, सात मंत्री, भाजपा के हो गए हैं।

संख्या से भी बढ़कर यह इसका औपचारिक एलान है कि नीतीश कुमार भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हों, गठबंधन और उसकी सरकार का नेतृत्व, भाजपा के ही हाथ में रहेगा।

सरकार में विभागों के वितरण ने, भाजपा के गठबंधन का नेृतत्व संभाल लेने की पुष्टि ही की है। यह दूसरी बात है कि अतिवादी मांगों के विपरीत, विभागों के वितरण में फिलहाल कोई ज्यादा बड़े बदलाव नहीं किए गए हैं और मिसाल के तौर पर गृहमंत्री का पद अब भी नीतीश कुमार के ही पास है। जाहिर है कि संघ-भाजपा तुरंत ऐसा भी कुछ नहीं करना चाहेंगे, जिससे गठजोड़ सरकार की स्थिरता पर ही सवाल उठने लगें।

फिर भी, इस शपथ ग्रहण में एक अनुपस्थिति ने, सत्ताधारी गठबंधन में संतुलन में आए इस बदलाव के संकेतों को और गाढ़े रंग से रेखांकित किया है। शपथ लेने वालों में यह अनुपस्थिति थी, नीतीश कुमार की भाजपा के साथ गठबंधन सरकारों में बराबर उप-मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाले आए, सुशील मोदी की।

सुशील मोदी को संभवत: पदोन्नति देकर, बिहार की राजनीति से ही वनवास पर भेजा जा रहा है। यह व्यवहार में, गठबंधन में संतुलन के भाजपा के पक्ष में बदल जाने को और विस्तारित करने का ही काम करता है।

अनेक राजनीतिक प्रेक्षकों की राय में सुशील मोदी को गठबंधन सरकार से हटाकर, भाजपा ने नीतीश कुमार को शुरू में ही आगाह कर दिया है कि इस पारी में उन्हें भाजपा का मुंह देखकर चलना होगा। करीब डेढ़ दशक तक नीतीश कुमार के साथ, उपमुख्यमंत्री के रूप में काम करने के चलते ही नहीं, खुद को जदयू के साथ गठजोड़ कायम करने तथा इतने अर्से तक उसे चलाने तथा डेढ़-दो साल के ब्रेक के बाद उसे दोबारा कायम कराने का मुख्य कर्ताधर्ता मानने के चलते भी, सुशील मोदी ने, नीतीश कुमार के साथ काफी अच्छी आपसी समझदारी विकसित कर ली थी। लेकिन, देश के पैमाने पर भाजपा के सत्ता में आने तथा उसकी बढ़ती ताकत की पृष्ठभूमि में और खासतौर पर बिहार के मौजूदा विधानसभाई चुनाव के बाद गठजोड़ में बदले हुए सत्ता संतुलन को देखते हुए, भाजपा-संघ की नजरों में सुशील मोदी का रवैया, गठजोड़ में भाजपा-संघ के हितों पर अगर समझौता नहीं भी करने जा रहा था, तब भी कम से कम उनके लिए पर्याप्त जोर नहीं लगाने वाला था। इसीलिए, बदले हुए संतुलन के अनुरूप भाजपा-संघ के हितों को आगे बढ़ाने के लिए और जाहिर है कि जदयू की कीमत पर भी आगे बढ़ाने के लिए, सुशील मोदी समेत गठबंधन सरकार में भाजपा की लगभग पूरी की पूरी टीम ही बदल दी गयी है।

और जैसा हमने पहले ही कहा, इस बदलाव की दिशा बिहार में संघ-भाजपा को, अंतत: नीतीश कुमार पर निर्भरता से मुक्त कराने की ही दिशा है। बेशक, नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते-रहते भी, उनकी सरकार बहुत बदल चुकी है।

जिस सरकार में भाजपा की हैसियत जूनियर पार्टनर की थी और नीतीश कुमार अपनी शर्तें मनवाते थे, उसमें अब भाजपा अपनी शर्तें लादने की स्थिति में होगी और नीतीश कुमार उसकी मुंहदेखी करने पर मजबूर होंगे।

फिर भी यह रास्ता अंतत: तो नीतीशकुमार-मुक्त सरकार के लक्ष्य की ओर ही जाता है, जिसके लिए सुशील मोदी को उनकी अपनी ही पार्टी ने उपयुक्त नहीं माना है। बहरहाल, फिलहाल तो भाजपा, नीतीश कुमार से ही ज्यादा से ज्यादा भगवाई होती सरकार चलवाएगी।

         याद रहे कि इसकी धमाकेदार शुरूआत भी हो गयी है। उत्तर प्रदेश की ही तर्ज पर, बिहार में भी पहली बार ऐसी सरकार बनी है, जिसके विधायक मंडल में राज्य के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय का, जो राज्य की करीब 16 फीसद आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, कोई प्रतिनिधि ही नहीं है। अचरज की बात नहीं है कि नीतीश कुमार के साथ शपथग्रहण करने वाले, उनके 14 मंत्रिमंडलीय सहयोगियों में भी, अल्पसंख्यक समुदाय का कोई प्रतिनिधि नहीं है। बेशक, भाजपा तो खासतौर पर मुसलमानों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मौका नहीं देने के लिए कुख्यात है। इसलिए, उसके किसी मुसलमान को उम्मीदवार ही नहीं बनाने में किसी को अचरज नहीं होगा। लेकिन, यह कोई संयोग ही नहीं है कि जदयू के सभी 11 मुस्लिम उम्मीदवार, इस चुनाव में हार गए। जदयू का राजनीतिक कद छोटा करने के लिए, चिराग पासवान को उस पर लहका देने का मास्टरस्ट्रोक आजमाने वाली भाजपा से, उन 11 सीटों पर जदयू के मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए सहयोगी पार्टी के नाते पूरा जोर लगाने की उम्मीद, कौन कर सकता था?

         लेकिन, यह किस्सा इतने पर ही खत्म नहीं हो जाता है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान और खासतौर पर प्रचार के आखिरी चरणों में, प्रधानमंत्री समेत भाजपा नेताओं ने सचेत रूप से मतदाताओं का सांप्रदायिक धु्रवीकरण किया था और सत्ताधारी गठजोड़ के ध्रुव पर हिंदुत्ववादी गोलबंदी की कोशिश की थी। मतदान के पहले दो चरणों में चुनावी हवा साफतौर पर महागठबंधन के पक्ष में रहने को देखते हुए, जो चुनाव के नतीजों में भी साफ तौर पर देखने को मिला है, आखिरी चरण में ये कोशिशें खासतौर पर उग्रता से की गयी थीं। खुद प्रधानमंत्री ने सीमांचल क्षेत्र की अपनी चुनाव सभाओं में ‘जय श्रीराम’ के नारे ही नहीं लगवाए थे, उन्होंने अपने मोर्चे के चुनावी प्रतिद्वंद्वियों को भारत माता विरोधी से लेकर राम मंदिर विरोधी तक साबित करने की कोशिशें की थीं। और यह सब उस इलाके में किया जा रहा था, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत ज्यादा है, जो 25 से 40 फीसद तक जाती है। भाजपा पूरे गठबंधन को हिंदुत्व के रास्ते पर धकेल रही थी और नीतीश कुमार को भी, एक मौके पर योगी आदित्यनाथ की ‘घुसपैठियों को निकाल बाहर करने’ की घोषणा से खुद को अलग करने के अलावा, इस सब का विरोध करने की कोई जरूरत महसूस नहीं हुई या विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई। इस तरह, चुनाव प्रचार के आखिर तक सत्ताधारी गठजोड़ का वैचारिक नेतृत्व खिसक कर पूरी तरह से संघ-भाजपा के हाथों में जा चुका था, सरकार में संतुलन तो अब बदला है।

         सीमांचल तथा उसके गिर्द के इलाकों में, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत ज्यादा है, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के इस खेल को सत्ताधारी गठजोड़ के पक्ष में और धारदार बनाया, ओवैसी की पार्टी की मौजूदगी और उसके संप्रदाय-आधारित चुनाव अभियान ने। यहां हिंदू और मुस्लिम, दोनों सांप्रदायिकताओं ने एक-दूसरे के ध्रुवीकरण के प्रयासों के लिए खाद-पानी मुहैया कराने का काम किया और जैसाकि होना था, इसकी मार पड़ी धर्मनिरपेक्ष विपक्षी गोलबंदी या महागठंधन पर और फायदा मिला भाजपा के नेतृत्व में सत्ताधारी गठजोड़ को। सत्ताधारी गठजोड़ को इस क्षेत्र में जैसी अप्रत्याशित कामयाबी मिली, जिसके बिना उसका बहुमत की देहरी पार करना संभव ही नहीं था। हां! दूसरे सिरे पर एमआइएम को भी पांच सीटें मिल गयीं। अब जहां तक हो सकेगा भाजपा, नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाकर सांप्रदायिक धु्रवीकरण के अपने एजेंडा को आगे बढ़ाएगी यानी नीतीश कुमार से भाजपा सरकार चलवाएगी। और अंत में अकाली दल, शिव सेना आदि की तरह, जदयू को भी एक दिन बाहर का दरवाजा दिखा देगी।    

0 राजेंद्र शर्मा

Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।
Rajendra Sharma राजेंद्र शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं। वह लोकलहर के संपादक हैं।

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