अब और लॉकडाउन नहीं, गरीबों को भुखमरी में न धकेला जाये, सोशलिस्ट पार्टी इंडिया की मुख्यमंत्री को चिट्ठी

No more lockdown, poor should not be pushed into starvation, letter to Chief Minister of Socialist Party India

भोपाल, 29 अप्रैल 2020. सोशलिस्ट पार्टी इंडिया की मध्य प्रदेश  इकाई ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर गुजारिश की है कि लॉकडाउन के कारण गरीब लोग भुखमरी के कगार पर आ गए हैं। ऐसे में लॉकडाउन की अवधि बढ़ाकर  मेहनतकश ओं को भूख से मर मरने को मजबूर ना करें।

पढ़िए पूरा पत्र…….

श्रीमान शिवराज सिंह जी

मुख्यमंत्रीमध्य प्रदेश  सरकार,

भोपाल

 विषय: 3 मई के बाद तालाबंदी यानि कि लॉकडाउन आंशिक रूप से ही होना चाहिए।

 महोदय,

21 मार्च से शुरू हुआ  मध्यप्रदेश  में lockdown (तालाबंदी) अब 37 दिन पूरे कर चुका है। इन 37 दिनों में गरीब बहुत ही ज्यादा परेशान रहा है। प्रदेश में हजारों प्रवासी मज़दूर अपने घरों से दूर या तो शेल्टर होम में मुश्किल परिस्थितियों में रह रहे हैं और बस्तियों में बिना खाना-पानी या रसोई गैस के बगैर, हर किल्लत में जीवन जीने को मजबूर हैं, वैसे इसे क्या जीवन कहेंगे। यही हाल सभी गरीबों का है। आजीविका का साधन किसी के पास नहीं है। खाने के लिए भी राशन और जरुरत की चीजें खरीदने के लिए लोगों के पास पैसे नहीं हैं। शहरी इलाके में तो स्थिति बहुत दयनीय है।

 केंद्र व राज्य सरकारों ने बहुत देर से और बहुत अपर्याप्त राहत की घोषणा की है और अनेक वंचित परिवार इस राहत के दायरे में भी नहीं आते। हमारा मानना है कि तालाबंदी ज़ारी रही तो भुखमरी की स्थिति बढ़ेगी। हम जो लम्बे समय से मांग करते आ रहे हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सभी को राशन दिया जाये मतलब खाध्य सुरक्षा को सार्वभौमिक किया जाये. कम से कम सितम्बर 2020 तक हर इच्छुक व्यक्ति को 10 किलो अनाज, 1.5 किलो दाल और 800 ग्राम खाद्य तेल दिया जाये ( यह प्रति व्यक्ति को मिले )।

 लॉकडाउन (तालाबंदी) के कारण आवागमन पर रोक के कारण लोग अस्पताल नहीं पहुँच पा रहे है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में लोगों को देखा नहीं जा रहा है, बाहर से ही मरीजों को रवाना किया जा रहा है। इसका मतलब है कि कोरोना के अलावा जितने भी मरीज हैं वे भयंकर पीड़ा में हैं. जिला अस्पतालों में भी OPD का काम चल नहीं रहा है. चिकित्सा स्टाफ कोरोना के मरीज के लिए बैठा हुआ है. NON- COVID बीमारियों, जैसे मधुमेह के मरीज़ के साथ dialysis तक नहीं किया जा रहा है। किसी अन्य बीमारी के गंभीर मरीज आते भी हैं तो पहले COVID टेस्ट के लिए कहा जाता है और जब तक कोविड टेस्ट का परिणाम नहीं आ जाता है तब तक उसका इलाज शुरू ही नहीं किया जाता है. कोविड test में अभी भी 6 से 7 दिन लगते हैं। कई जगह गर्भवती महिलाओं को भी जाँच या अन्य स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं दी जा रही हैं और समुदाय के आधार पर भेद भाव किया जा रहा है।

 मध्यप्रदेश  में गर्मी के मौसम को देखते हुए, तालाबंदी के दौरान गाँव व कच्ची बस्तियों में लोगों के लिए पानी लाना बहुत मुश्किल हो रहा है क्योंकि इन इलाकों में पानी के सरकारी स्रोत तो हैं ही नहीं लोग पहले किसी और जगह से पानी भरकर लाते थे लेकिन अब पुलिस घर से निकलने ही नहीं देती है तो पानी कैसे लायें और उसके बिना जीयें कैसे? सरकारी टैंकर नहीं पहुँच रहे हैं। लोग अपना बन्दोबस्त खुद ब खुद सालों से करते आयें हैं. इस स्थिति में लोगों का आना-जाना शुरू करना होगा या उन सभी कच्ची बस्ती और मोहल्लों में पानी की आपूर्ति आवश्यक रूप से करनी होगी।

 तालाबंदी के दौरान शासन का लोगों पर दमन बहुत अधिक बढ़ा है. कई जगहों पर भोजन की तलाश में घर से निकले लोगों पर पुलिस ने हिंसा की है. आम लोगों का पानी के लिए निकलने पर अपराधीकरण बहुत अफ़सोस जनक है। जन स्वास्थ्य संकट डंडे के जोर पर हल नहीं किया जा सकता उसके लिए लोगों को समझाना पड़ेगा।

 कोविड 19 एक नया वाइरस है। इसके बारे में विशेषज्ञों के बीच भी जानकारी सीमित है, इसके कारण जनता में भी अफ़वाह, भय और संदेह का माहौल बन गया है जो सतर्कता की सीमाएँ लाँघ कर एक उन्माद की तरह हो गया है। इसके कारण  प्रशासन भी जूझ रहा है और लोगों के साथ सख़्ती का इस्तेमाल कर रहा है । लॉकडाउन की स्थिति में कई जगहों पर सामान्य लोगों को सिर्फ़ छींकने या खाँसने पर भी पीटा गया है जिससे कई जगह लोगों की मृत्यु भी हुई है। कई कोलोनियों, गाँवों और बस्तियों के बाहर लोगों के झुंड, जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, लाठियाँ लेकर गश्त और पहरा दे रहे हैं, और मनमर्ज़ी से लोगों को धमका रहे हैं और मारपीट भी कर रहे हैं।

 मध्यप्रदेश  सरकार की ज़िम्मेदारी है कि जो प्रवासी मजदूर अपने घर जाने के इच्छुक हैं उनके लिए तुरंत सुरक्षित यातायात का प्रबंध किया जाये और उन्हें घर भेजा जाये. दूसरी तरफ मध्ययप्रदेश  के मजदूर जहाँ भी अन्य राज्यों में फंसे हुए हैं वहां से उन्हें सुरक्षित  उनके घर वापस लाया जाये।

 आशा है कि 3 मई तक चलने वाले, 45 दिन के लॉकडाउन में मध्ययप्रदेश सरकार ने  कोरोना वायरस के फैलाव को रोकने के लिए स्वास्थ्य प्रणाली को दुरुस्त किया होगा।

 अब सरकार को पहचान, जांच, आइसोलेशन व रोकथाम की रणनीति अपनानी चाहिए. जिन जगहों पर केवल एक कोविड का मरीज़ पाया गया है, ऐसी जगहों को भी “हॉटस्पॉट” घोषित कर उन्हें सील कर दिया गया है. ऐसे कई लोग जिनका लॉकडाउन के शुरूआती दिनों में गुज़ारा चल रहा था, वे अब संकट की स्थिति में हैं. तालाबंदी को जारी रखने की सामाजिक और आर्थिक कीमत बहुत अधिक है, जिसका कोई औचित्य नहीं है. लोगों के सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार को किसी भी समय जोखिम में नहीं डाला जा सकता.

 राज्य से तुरंत धारा 144 को हटाया जाये इसे केवल हॉटस्पॉट और कन्टेनमेंट जोन में ही रखा जाये.

 इस लॉकडाउन की बजह से आर्ह्तिक संकट बहुत अधिक गहरा गया है जो 6 से 9 महीने तक बरक़रार रहेगा इसी के साथ केंद्र सरकार से निम्न बिन्दुओं पर प्रमुखता से पैरवी की जानी चाहिए।

 10 किलो गेहूं, 1.5 किलो दाल और 800 ग्राम तेल प्रति व्यक्ति सबको दिया जाये।

 MGNREGA में कम से कम 200 दिन का रोज़गार दिया जाये।

 गरीब के लिए आय सहयोग, 2500 का का विस्तार हो और अगले 6 महीने तक प्रत्येक महीने दिया जाये।

 राज्य में शहरी रोज़गार गारंटी कानून बनाये जाने को लेकर राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय समितियां गठित की जाये। राज्य व राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी कानून बनाया जाये।

 लॉकडाउन के दौरान पुलिस द्वारा दर्ज मामले वापस लिए जाये।

 बंदियों की संख्या जेलों में लगातार कम रखी जाये जैसे कि उच्चतम न्यायलय के कैदियों के सम्बन्ध में निर्देश हैं.

श्रम कानूनों को सख्ती से लागू किया जाएं। सभी उद्योगों से मजदूरों की बकाया मजदूरी दिलवाई जाये।

 COVID 19 में किसी भी एक समुदाय को दोषी ठहराना और चिन्हित करना बंद किया जाए, सांप्रदायिक राजनीति बंद हो.

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उपाध्याय अमलेन्दु:
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