डिजिटल मीडिया से घबराई सरकार अब कसना चाहती है नकेल !

Social Media

अब सोशल मीडिया और वेब पोर्टलों पर नियंत्रण की तैयारी

Now preparing to control social media and web portals

विगत दिनों सुदर्शन न्यूज चैनल पर ‘यूपीएससी जिहाद‘ कार्यक्रम के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई (Hearing in the Supreme Court on a petition filed against the ‘UPSC Jihad’ program on Sudarshan News Channel) से मीडिया की आजादी (Media freedom) और सरोकार तथा सरकार की भूमिका को लेकर नई बहस छिड़ गई है। इस बहस ने समाचार माध्यमों के सामाजिक सरोकार और दायित्वों (Social concerns and obligations of news media) को लेकर सरकार और मीडिया की जिम्मेदारियों पर कोर्ट ने स्पष्टीकरण मांगते हुए दोनों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं।

‘UPSC Jihad’ program broadcast on hold till next hearing

सुप्रीम कोर्ट ने सुदर्शन न्यूज चैनल की मंशा व नीयत पर सवाल उठाते हुए पर ‘यूपीएससी जिहाद’ कार्यक्रम के प्रसारण पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा है, ‘आप एक धर्म विशेष को टारगेट नहीं कर सकते किसी एक विशेष तरीके से।’ 

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मीडिया को किसी भी तरह का कार्यक्रम चलाने के लिए बेलगाम नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने सुर्दशन टीवी के कार्यक्रम को विषैला और समाज को बांटने वाला $करार दिया था। जस्टिस के एम जोसेफ ने कहा था, ‘मीडिया की आजादी बेलगाम नहीं हो सकती, मीडिया को भी उतनी ही आजादी हासिल है जितनी देश के किसी दूसरे नागरिक को।’

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार से भी जानना चाहा है कि मीडिया ख़ासकर टीवी मीडिया में चल रहे कार्यक्रमों के दौरान धर्म और किसी ख़ास संप्रदाय को लेकर होने वाली बातचीत का दायरा मर्यादित क्यों नहीं होना चाहिए।

आश्चर्य की बात ये है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने स्वयं कहा था कि टीवी चैनलों पर प्रसारित किसी भी कार्यक्रम पर प्रसारण से पूर्व रोक की व्यवस्था नहीं है, हालांकि इस बाबत मंत्रालय ने सुदर्शन चैनल से यह सुनिश्चित करने को कहा था कि उसका शो कार्यक्रमों के लिए निर्धारित संहिता का उल्लंघन नहीं करे।

Government is targeting digital media

अब भी सरकार सुदर्शन चैनल पर कुछ नहीं कह रही है। इसके विपरीत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बचाने की कोशिश कर रही है, और चिंताजनक बात यह है कि इसकी आड़ में डिजिटल मीडिया को निशाने पर ले रही है।

गौरतलब है कि सरकार कार्रवाई करने की बजाय सुदर्शन चैनल सहित अन्य सभी टेलीविजन चैनलों को बचाने की कोशिश करते हुए आम जनता में तेजी से विश्वास जमाते सोशल मीडिया एवं डिजिटल मीडिया को अपने नियंत्रण में लेने के प्रयास में लग गई है।

Web-based media more responsible for violence, hate than electronic media – Government

अपनी इन्हीं कोशिशों को अमली जामा पहनाने के इरादे से ही सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देते हुए सरकार ने कहा है, कि वेब-आधारित डिजिटल मीडिया (Web-based digital media) पर सरकार का कोई अंकुश नहीं है।  सरकार का कहना है कि यह वेब आधारित मीडिया हिंसा, नफरत और यहां तक कि आतंकवाद के लिए और लोगों को उकसाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। सरकार के हलफनामे के अनुसार डिजिटल मीडिया लोगों और संस्थानों की छवि खराब करने की क्षमता रखता है।

यह सब कुछ दरअसल नियंत्रण न होने की वजह से धड़ल्ले से हो रहा है।

This is the second affidavit of the central government on this issue

उल्लेखनीय है कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का यह दूसरा हलफनामा है। इसके पहले दिए गए हलफनामे में भी सरकार ने कहा था कि यदि उसे मीडिया के लिए दिशानिर्देश जारी करना ही है तो प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं बल्कि पहले डिजिटल मीडिया के लिए दिशानिर्देश जारी करे।

The media that was considered to be the watchdog, today it has become known as the official horn

यह बात अब किसी से छुपी नहीं रही कि देश के अधिकांश मीडिया संस्थान आमजन में तेजी से अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक, दोनों ही माध्यम सरकारपरस्ती और विज्ञापनों के दबाव के चलते जन सरोकार की पत्रकारिता से कोसों दूर हो चुके हैं। जो मीडिया वॉच डॉग माना जाता रहा आज वो सरकारी भोंपू की तरह जाना जाने लगा है, लोग पूरे मीडिया जगत को गोदी मीडिया से पुकारने लगे हैं। ऐसे में गैरपारंपरिक मीडिया के रूप में डिजिटल माध्यम में तेजी से जन भावनाओं और जनसरोकार को प्राथमिकता दी जाने लगी है जिसके कारण ही सूचना संचार का यह माध्यम तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। इसी कारण डिजिटल मीडिया सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती और चिंता का विषय (Digital media is a serious challenge and concern for the government) बनकर उभर रहा है।

आज देश का युवा वर्ग सूचना संचार के पारंपरिक माध्यमों से दूरी बना चुका है और वह तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध खबरों, सूचनाओं और विचारों का रुख कर चुका है। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को विज्ञापन (Advertising to print and electronic media) और अन्य लाभ के जरिए नियंत्रित कर अपना भोंपू बना लेने वाली सरकार अब तक सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के संचार प्लेटफॉर्म पर कोई नियंत्रण नहीं कर पा रही है। सामाजिक सरोकार, जनपक्षधर मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए भी डिजिटल प्लेटफॉर्म काफी मददगार साबित हो रहा है। डिजिटल माध्यम की न सिर्फ लोकप्रियता बल्कि विश्वसनीयता भी बहुत तेजी से बढ़ रही है। यही सरकार व सत्ता पक्ष के लिए चिंता का सबब होती जा रही है।

अब तक सरकार जनभावनाओं और जनमत को लुभाने, बहकाने या बरगलाने के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर विज्ञापन एवं अन्य प्रलोभनों के जरिए नियंत्रण को सशक्त औजार मानती रही। अब नए परिदृश्य और बदलते दौर में तकनीकी विकास और जनमानस में आते बदलाव के चलते डिजिटल मीडिया के प्रति लोगों का रुझान जिस तेजी से बढ़ रहा है उससे सरकार के माथे पर चिंता की रेखाएं साफ महसूस की जा रही हैं।

सुदर्शन चैनल पर दायर केस के बहाने सरकार डिजिटल मीडिया पर कंट्रोल करने की अपनी मंशा को पूरी करने का मौका बनाना चाह रही है।

निश्चित रूप से जनसंचार के किसी भी माध्यम में अच्छे-बुरे हर तरह की धारणाओं और धाराओं का समावेश होता है। डिजिटल मीडिया भी इससे मुक्त नहीं है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि डिजिटल व सोशल मीडिया भी घृणा, नफरत के साथ-साथ अफवाहों और गैरजिम्मेदाराना समाचारों, अभिव्यक्तियों की भरमार से अछूता नहीं है। कई मौकों पर डिजिटल मीडिया की पोस्ट से सांप्रदायिक दंगों,भीड़ द्वारा हिंसा, मारपीट व बलवे के दुष्परिणाम सामने आ चुके हैं जिसके प्रमाण भी सोशल मीडिया पर ही मौजूद हैं।

Curbing digital media in the name of reform is completely unconstitutional and unethical

यह भी मानना होगा कि डिजिटल मीडिया में सुधार की गुंजाइश (Scope for improvement in digital media) से इंकार नहीं किया जा सकता मगर सुधार की आड़ लेकर या सुधार के नाम पर डिजिटल मीडिया पर अंकुश लगाना पूरी तरह असंवैधानिक व अनैतिक ही कहा जाएगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया किसी भी लोकतंत्र की पहचान होता है। हमेशा तानशाही व फासीवादी ताकतें ही मीडिया पर अंकुश लगाने और नियंत्रित करने के सभी हथकंडे अपनाती है। जनभावनाओं और विचारों को दबाने के लिए सरकार तमाम तरह के अनैतिक व असंवैधानिक तरीके अपनाने से भी नहीं हिचक रही है। इसके मूल में सरकार का भय, असफलता और खीज ही है।

सुदर्शन चैनल के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में जारी मुकदमे का सहारा लेकर सरकार आम जन की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन चुके डिजिटल मीडिया पर अंकुश लगाने और अपना नियंत्रण स्थापित करने का दुष्प्रयास कर रही है। अभिव्यक्ति के सशक्त व जनसुलभ माध्यम पर अपनी क्षूद्र राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और निज हितों को साधने के नाम पर अंकुश लगाने या सत्ता द्वारा नियंत्रित करने के हर प्रयास की भरपूर भर्त्सना व सामूहिक विरोध किया जाना आवश्यक है।

जीवेश चौबे

जीवेश चौबे का यह लेख मूलतः देशबन्धु पर प्रकाशित हुआ है, उक्त लेख का संपादित रूप साभार

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