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अंततः कॉरपोरेट हिंसा ही है माओवादी हिंसा

विकल्प जो हम चुनने लगे, सारा देश गुजरात और इस गुजरात देश में संस्कृति सलवा जुड़ुम!
पलाश विश्वास
इस आलेख के शुरु में ही यह साफ कर देना चाहिए कि हम चुनाव के प्रहसन के खिलाफ जरुर हैं, जनादेश के कॉरपोरेट हस्तक्षेप के भी विरुद्ध हैं हम, लेकिन हम जितना विरोध कॉरपोरेट नरसंहार और वैदिकी हिंसा का करते हैं, उससे भी ज्यादा विरोध हमारा माओवादी हिंसा से है।
हमारी आदरणीया लेखिका अरुंधति राय के राष्ट्र के सैन्यीकरण, कॉरपोरेट साम्राज्यवाद संबंधी विचारों को अद्यतन समाज वास्तव को समझने के लिए हम जरुरी भी मानते हैं और हम यह भी जरुरी मानते हैं कि लोग बाबासाहेब के जातिभेद उच्छेद पर उनकी सामयिक प्रस्तावना को अवश्य पढ़ें।
हम उनके हालिया इंटरव्यू से कल से सहमत है कि इस चुनाव में हम यह तय करने जा रहे हैं कि देश का राज अंबानी चलायेंगे या टाटा। अमेरिकी पत्रिका स्ट्रेट को दिये गये उनके इंटरव्यू से भी हम सहमत है कि जनादेश निर्माण की प्रक्रिया में हम दरअसल तय यह कर रहे हैं कि निःशस्त्र जनता के विरुद्ध युद्ध के लिए सेना उतारने का आदेश कौन जारी करें।
इसी बीच आनंद तेलतुंबड़े ने साफ-साफ अरुंधति के अंध अंबेडकर वाद पर सवालिया निशान दागते हुए पूछा है कि अंबेडकर की हमें जरुरत तो है लेकिन किस अंबेडकर की। हमने भी इस पर लिखा है।
माओवादी आंदोलन को अरुंधति क्रांतिकारी आंदोलन मानती हैं हालांकि वह भी माओवादी हिंसा की निंदा करती हैं।
हम शुरु से कहते रहे हैं कि दरअसल माओवादी हिंसा अंततः कॉरपोरेट हिंसा ही है।
हमने सिर्फ लिखा ही नहीं, दंडकारण्य में माओवादी इलाकों में खुली सभाओं में बार-बार ऐसा कहा है और यह भी कहा है कि माओवादी हिंसा का शिकार कॉरपोरेट हित कभी नहीं हुआ।
नौकरी में लगे बहुजनों के जिगर के टुकड़े काट दिये जायें, राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाये, इससे कॉरपोरेट हितों पर कोई असर होता नहीं है। सेना और अर्धसैनिक बलों के जवान तो शतरंज के मोहरे हैं। उनके जीने मरने पर न भारत सरकार या राज्य सरकारों पर काबिज लोगों और न कॉरपोरेट घरानों को कुछ आता जाता है।
बंगाल में भी सत्तर के दशक में कॉरपोरेट और पूंजी के ठिकानों पर एक पटाखा भी फूटने का कोई इतिहास नहीं है, जबकि बंगाल में सत्तर के दशक में नक्सली आंदोलन सर्वव्यापी था और उसका असर इतना व्यापक था कि बांग्लादेश की सरजमीं पर भारतीय सेना पाकसेना और रजाकारों के खिलाफ लड़ रही थी, तो अपने ही देश में नक्सलियों के खिलाफ।
हकीकत में बांग्लादेश में भारत के सैन्य हस्तक्षेप में देरी इसी वजह से हुई, सैन्यदस्तावेज इसकी पुष्टि करते हैं।
आपको बता दें कि आदिवासी इलाकों में न भारत का संविधान लागू है, न कानून का कोई शासन है। कानून ताक पर कॉरपोरेट योजनाएं अबाधित तौर पर चलाने के लिए बेदखली जरूर अविराम है।
भूमि अधिग्रहण कानून, खनन अधिनियम, पर्यावरण कानून, समुद्रतट सुरक्षा कानून, संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार, पांचवीं और छठी अनुसूचियों, पेसा के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी वहां लागू नहीं होते।
राजनीति वहां सिर्फ वोट मांगने चुनाव मौसम में दस्तक देती है और लोकतंत्र में आदिवासियों की कोई हिस्सेदारी है ही नहीं।
देशभर में ज्यादातर आदिवासी गांव राजस्व गांव बतौर पंजीकृत नहीं है। एक बार अपने गांव से हटने पर वे वहां वापस नहीं जा सकते। विकास परियोजनाओं के नाम पर कॉरपोरेट हितों में आदिवासियों के इन गांवों को मिटाने का सबसे भारी कार्यभार है सैन्य राष्ट्रवाद का।
अब माओवादी हिंसा के बाद माओवादी गुरिल्ले मुठभेड़ में मारे न जाये तो उन्हें पकड़ना मुश्किल है। वे मौके से फौरन नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। लेकिन प्रतिक्रिया में जो सघन सैन्य अभियान आदिवासी इलाकों में जारी रहता है, उसके चलते एकमुश्त बीसियों गांव खाली हो जाते हैं और कारोपोरेट गुलशन का कारोबार यूं ही आसान हो जाता है।
सारे माओवादी इलाकों में यह खेल साल भर चलता रहता है।
छत्तीसगढ़ और दूसरे आदिवासी इलाकों इस चुनावी माहौल में आदिवासी जनता की बेदखली का यह खूनी खेल फिर जारी है।
माओवाद से निपटने में सिरे से नाकाम राष्ट्र निरपराध आदिवासियों को माओवादी तमगा लगाकर समूची आदिवासी जनता के खिलाफ निरंतर दमन चक्र चला रही है ,जिसे बाकी देश आर्थिक सुधार और विकास समझते हैं लेकिन वह आदिवासियों का चौतरफा सत्यानाश है।
बहुजनों में आदिवासियों को शामिल करने की डींग हांककर अपनी अपनी दुकानें चलाने वाले अंबेडकरी मसीहा संप्रदाय को इन आदिवासियों के जीने मरने से कोई लेना देना नहीं है।
अंबेडकर जयंती है। ढोल ताशे का शोर बहुत है। सरकारी अवकाश है और फूलों की बहार है। अंबेडकर जयंती के मौके पर आज बंबई शेयर बाजार,  नैशनल स्टाक एक्सचेंज, मुद्रा विनिमय बाजार और ऋण बाजार बंद हैं।
जो है नहीं, वह है अंबेडकरी आंदोलन। जो है वह है, भारतीय कृषि समाज और जाति व्यवस्था में बंटे कृषि समाज का नख शिख भगवाकरण।
 जारी…..

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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