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अदानी पर ही क्यों है, मोदी सरकार की सारी मेहरबानी

बीते लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में घूम-घूमकर देशवासियों से अच्छे दिन लाने का वादा किया था। राजग सरकार को केन्द्र की सत्ता संभाले छह महीने से भी ज्यादा बीत गए, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार के करीबी माने जाने वाले उद्योगपतियों के लिए ही अच्छे दिन आए हैं। देश के बाकी लोगों के लिए अच्छे दिनों का इंतजार, अभी और लंबा है। राजग सरकार की सारी मेहरबानी हाल-फिलहाल प्रधानमंत्री के सबसे चहेते और करीबी माने जाने वाले उद्योगपति गौतम अदानी के ऊपर ही है। उन पर यह मेहरबानियां कई तरह से हो रही हैं। कभी प्रत्यक्ष रूप से तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से। अब अदानी पर ये मेहरबानी, उनको एक बड़े ऋण दिलवाने को लेकर हुई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाल ही में हुए ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान जो बड़े कारोबारी समझौते हुए उसमें से एक बड़ा समझौता अदानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदानी ने किया। इस समझौते के मुताबिक अदानी अब ऑस्ट्रेलिया के क्लेरमांट शहर में कारमाइकल कोयला खान से कोयला निकालेंगे। जाहिर है कोई भारतीय यदि अपने देश के बाहर व्यापार करे, इस पर भला किसे एतराज हो सकता है। यह सचमुच खुशी की बात होती है कि भारतीय उद्योगपति, विदेशों में भी अपना कारोबार फैला रहे हैं। लेकिन एतराज की वजह, दूसरी है। ऑस्ट्रेलिया में कोयला खनन परियोजना के लिए अदानी को एक बड़े कर्ज की जरूरत थी। और कर्ज भी कोई छोटा-मोटा नहीं, बल्कि एक अरब डॉलर, जो रुपयों में तकरीबन 6,000 करोड़ रूपए बैठता है। इस कर्ज को देने के लिए आगे आया, देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया।
ऐसे समय में जब दुनिया के छह बड़े बैंकों ने अदानी समूह को लोन देने से साफ-साफ इंकार कर दिया था, तब एसबीआई द्वारा एक अरब डॉलर रुपये का भारी-भरकम कर्ज दिया जाना, कई सवाल खड़े करता है। पहला सवाल, किस आधार पर देश के लोगों के खून-पसीने की कमाई से सिर्फ एक उद्योगपति की मदद की जा रही है। एक निजी कंपनी के हितों को बढ़ावा देने के लिए क्यों एक राष्ट्रीयकृत बैंक और आम नागरिकों की जमा पूंजी का इस्तेमाल किया जा रहा है ? सामान्यतः बैंक किसी को भी कर्ज देने का फैसला, इंटरेस्ट कवरेज रेशियो पर लेते हैं। यानी आमदनी और कर्ज चुकाने के लिए जरूरी रकम का अनुपात। अदानी के मामले में जिस 1.5 इंटरेस्ट कवरेज रेशियो की बात हो रही है, वो असल में एक मानक है, जिसके आधार पर बैंक लोन देते हैं। 1.5 या डेढ़ गुना के ब्याज रेशियो को मोटे तौर पर इस तरह से समझा जा सकता है कि अगर किसी को कर्ज पर 100 रुपये का ब्याज चुकाना हो, तो उस का मुनाफा कम-से-कम डेढ़ गुना यानी 150 रुपये से ज्यादा होना चाहिए। नहीं तो बैंक लोन नहीं देते। क्योंकि सामान्य सी बात है, जब किसी के पास ब्याज चुकाने के ही पैसे न हों, तो कोई व्यापार कैसे करेगा और मूल कैसे चुकाएगा ? तमाम आर्थिक विश्लेषकों के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल में अदानी की कंपनी का मुनाफा रहा लगभग 9,000 करोड़ रुपये। जिसमें उन्होंने कर्ज पर ब्याज चुकाया लगभग 5,700 करोड़ रुपये। यानी ब्याज रेशियो बैठा 1.57 जो 1.5 से कोई बहुत ज्यादा नहीं। अदानी की कंपनी को मुनाफे में से हर 100 रुपये ब्याज चुकाने के बाद 57 रुपये ही बचते हैं।
जिसमें यह भी सिर्फ एक साल का आंकड़ा है। हाल के दिनों में उनकी कंपनी पर ब्याज का बोझ और बढ़ता जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक जुलाई, अगस्त और सितंबर के तीन महीनों में कंपनी का इंटरेस्ट कवरेज रेशियो गिरकर 1.12 पर आ गया है। यानी मुनाफे में से हर 100 रुपये ब्याज चुकाने पर कंपनी के पास सिर्फ 12 रुपये ही बच रहे हैं। सच बात तो यह है कि सितम्बर, 2014 के अंत तक अदानी ग्रुप पर कुल 72,000 करोड़ रूपए की देनदारी है। और यह देनदारी, ज्यादातर राष्ट्रीयकृत बैंकों की है। सरकारी बैंकों का करोड़ों रूपया अदानी की कंपनी को देना हैं। जाहिर है कंपनी की आर्थिक स्थिति कोई ज्यादा ठीक नहीं है। बावजूद इसके भारतीय स्टेट बैंक ने कंपनी को कर्ज देने में जो दरियादिली दिखाई, उसके पीछे आधार क्या था ? क्या उस पर अदानी समूह को कर्ज देने का कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई दवाब था ? यह ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब देने से वह लाख चाहे, लेकिन बच नहीं सकती। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा अपनी कंपनी को कर्ज दिए जाने को अदानी यह कहकर जायज ठहराते हैं कि इस रकम से देश के लिए कोयले की आपूर्ति होगी और बिजली बनाने में मदद मिलेगी। लेकिन उनकी यह दलील, केन्द्रीय बिजली मंत्री पीयूष गोयल के एक दावे से पूरी तरह खारिज होती है। पिछले दिनों उन्होंने दावा किया था कि देश में कोयले की कोई कमी नहीं है और भारत अगले दो साल में कोयले का आयात बंद कर देगा। कोयला मंगाने से देश का पैसा विदेशों में जा रहा है। जाहिर है जब देश में कोयले की कमी नहीं है, तो अदानी को विदेश में कोयला खान चलाने के लिए देश के सरकारी बैंक की बड़ी रकम को क्यों फंसाया जा रहा है ? बैंक उन पर इस कदर क्यों मेहरबान है ?
सवाल कर्ज देने के समय पर भी हैं। यह कर्ज ऐसे समय मंजूर किया गया, जबकि कंपनी के मालिक और एसबीआई के प्रमुख, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान उनके प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे। यह मामला देश के सामने उजागर ही नहीं होता, यदि इसकी खबर एक समाचार पत्र में प्रकाशित नहीं होती। खबर के प्रकाशित होते ही मोदी सरकार, विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आ गई। जब मामले ने सियासी रंग लेना शुरू कर दिया, तो सरकार ने अपने बचाव के लिए एसबीआई को आगे कर दिया। अब एसबीआई इस मामले की यह कहकर पर्देदारी कर रही है कि उसने तो अदानी ग्रुप के साथ केवल शुरूआती ‘सहमति पत्र’ पर हस्ताक्षर किए हैं और ऋण तो पूरी ‘जांच-परख’ के बाद ही दिया जाएगा। जाहिर है एसबीआई ने अपने बयान में इस बात से इंकार नहीं किया है कि इस तरह का कोई करार नहीं हुआ। सच बात तो यह है कि बैंक द्वारा अदानी ग्रुप को कर्ज देने का फैसला पूरी तरह से कर लिया गया है। बस उस पर आखिरी मोहर लगनी बाकी है। सरकार और बैंक दोनों ही जानते हैं कि कुछ दिन इस बात पर हंगामा मचेगा और उसके बाद सब भूल जाएंगे। इसी के साथ मामला रफा-दफा।
 यह पहली बार नहीं है जब अदानी ग्रुप सवालों के घेरे में आया है, बल्कि इससे पहले भी वह कई मामलों में जांच के कठघरे में है। गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए अदानी ग्रुप पर नरेन्द्र मोदी की मेहरबानी के कई किस्से देश के सामने आ चुके हैं। गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार पर यहां तक इल्जाम है कि उसने राज्य की सैंकड़ों एकड़ जमीन कौंडि़यों के दाम अदानी को बेच दी। एक तरफ मोदी सरकार की अदानी समूह पर लगातार मेहरबानियां जारी हैं, तो दूसरी तरफ देश के छोटे उद्यमी परेशान हैं कि बैंक उन्हें कर्ज नहीं देते। सूक्ष्म, लघु एवं मझौले उपक्रम मंत्री कलराज मिश्र ने हाल ही में यह बात खुद एक कार्यक्रम में स्वीकारी थी कि बैंक इस क्षेत्र के उद्योगपतियों को कर्ज देने में हिचकते हैं। उन्हें बैंकों से कर्ज लेने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इस संबंध में बैंक, रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हैं। छोटे उद्यमियों की यह शिकायत वाजिब भी है। छोटे और मझोले उद्योग चलाने वाले बैंकों के चक्कर लगा-लगा कर थक जाते हैं और उन्हें मनमाफिक कर्ज नहीं मिल पाता है। जबकि बड़े उद्योगपतियों के पास बैंक खुद चल कर जाते हैं और कर्ज मंजूर करने के साथ उनका आभार भी जताते हैं।
बैंक, लोगों को कर्ज बांटे इस बात से भला कौन इंकार करेगा ? क्योंकि बैंको का काम भी यही है, पैसे जमा करना और कर्ज बांटना। लेकिन एसबीआई हो या फिर देश का कोई दूसरा बड़ा बैंक, उसे ऋण तथा व्यवहार्यता दोनों की अच्छी तरह से जांच-पड़ताल के बाद ही किसी उद्योगपति या समूह को कर्ज देना चाहिए। बैंक, कर्ज देते समय यह ध्यान रखे कि उसका पैसा सही समय पर वापिस आ भी जाएगा या नहीं। जिस तरह से एसबीआई ने अदानी ग्रुप को चुटकियों में करोेड़ों रूपए का ऋण दिया है, वह तरीका पहली ही नजर में संदिग्ध दिखलाई देता है। एक ग्रुप जिस पर सरकारी बैंको की पहले से ही बड़ी देनदारी है, उस पर बार-बार मेहरबानी क्यों ? 6,000 करोड़ रूपए कोई छोटा-मोटा कर्ज नहीं, बल्कि एक बड़ा कर्ज है। जिसे देते वक्त एसबीआई को पहले अच्छी तरह से जांच-पड़ताल करनी चाहिए थी, फिर इस पर आगे बढ़ना चाहिए था। लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सभी नियमों और कानूनों को ताक पर रखकर अदानी गु्रप को पलक झपकते ही कर्ज मंजूर कर दिया गया। मामले की गंभीरता को समझते हुए भारतीय रिजर्व बैंक को तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए। निश्चित तौर पर रिजर्व बैंक के पास इस तरह के संदिग्ध ऋण की समीक्षा का अधिकार भी है। उसे अपने इस अधिकार का इस्तेमाल कर यह देखना चाहिए कि अदानी ग्रुप को ऋण देने में कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं हुआ। यदि वास्तव में ऐसा हुआ है, तो रिजर्व बैंक को बिना किसी हिचकिचाहट के एसबीआई को इस करार को रद्द करने के निर्देश देने में देरी नहीं करना चाहिए। यही देश के हक में होगा।
O-जाहिद खान

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जाहिद खान, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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