अनुवाद किया रेयाज ने आउटलुक ने छाप दिया दिव्यशिखा के नाम से… गजब

हिंदी आउटलुक पत्रिका के संपादक (Editor of hindi outlook magazine) नीलाभ मिश्रा ने प्रो. जीएन साईबाबा पर अरुंधति रॉय के लिखे निबंध (Pro. Arundhati Roy’s essay on GN Saibaba,) का यह जो अनुवाद http://www.outlookhindi.com/view/arundhati-roy-special-essay-professor-pow-2065 अपनी वेबसाइट पर छापा है, उसमें अनुवादक का नाम ”दिव्‍यशिखा” लिखा है। मूल लेख के पाठक जानते हैं कि दो दिन पहले रेयाजुल हक ने इसका हिंदी में अनुवाद किया था जिसे ”हाशिया” ब्‍लॉग पर पढ़ा जा सकता है। { http://hashiya.blogspot.in/2015/05/blog-post_10.html?m=1 }

आउटलुक हिंदी की वेबसाइट (Outlook hindi website) पर छपे अनुवाद के शीर्षक से लेकर एक-एक पंक्ति रेयाज़ुल की है। ध्‍यान से मिलान करें तो पाएंगे कि कुछेक शब्‍दों में कहीं-कहीं हेर-फेर किया गया है। ऐसा करने वाला व्‍यक्ति पर्याप्‍त मूर्ख भी है क्‍योंकि एकाध जगहों पर नकल मारने में अर्थ का अनर्थ हो गया है। अगर अरुंधती रॉय का अनुवाद छापने का इतना ही मन है, तो मूल अनुवादक को क्रेडिट दिया जाना चाहिए था, वो भी पारिश्रमिक के साथ। अगर ऐसा नहीं करना था तो अपनी काबिल टीम से नीलाभजी को इसका अलग से अनुवाद करवाना चाहिए था। अगर टीम इसके काबिल नहीं है, तो पिछले दिनों इस वेबसाइट के लिए रखे गए काबिल आदमी को वहां बनाए रखना चाहिए था।

अच्‍छा कंटेंट चाहिए तो पैसे खर्च करिए, कायदे के लोग रखिए। सरोकारी फ्रीलांसरों का अनुवाद चुराकर आप कितने दिन अपनी दुकान चला पाएंगे? और ये ”दिव्‍यशिखा” कौन है, इसका भी पता लगना चाहिए, जिसको कायदे से नकल मारना भी नहीं आता। अगर वास्‍तव में उसने ही अनुवाद किया है और शीर्षक से लेकर एक-एक वाक्‍य का समान होना महज संयोग है, तो इसे भी बताया जाना चाहिए।

मुझे उम्‍मीद है कि हमारे मित्र  कुमार पंकज और भाषा सिंह इस प्रत्‍यक्ष घपले पर पाठकों का ज्ञानवर्द्धन करेंगे। वेबसाइट से कुछ दिन पहले तक जुड़े रहे भूपेन भाई अगर इस मसले पर विशेष प्रकाश डाल सकें, तो हमारे जैसे फ्रीलांसरों की बड़ी मदद होगी। नीलाभ जी, संभव हो तो अपना स्‍पष्‍टीकरण दे दीजिए। बेमतलब में एक कर्मचारी की चोरी के चलते आपकी छवि पर सवाल उठ रहा है।

अभिषेक श्रीवास्तव