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अनूठी है मिजोरम की चुनावी तस्वीर-यहां चुनाव तो होते हैं, प्रचार नहीं

रीता तिवारी

आइजल। सुदूर पूर्वोत्तर में बांग्लादेश और म्यामांर की सीमा पर बसे मिजोरम में चुनावी तस्वीर देश के दूसरे हिस्सों से एकदम उलट है। यहां चुनाव तो होते हैं, प्रचार नहीं। इसलिए राजधानी आइजल की सड़कों पर घूमते हुए कहीं से नहीं लगता कि चुनाव हो रहे हैं। राज्य की इकलौती सीट पर अबकी सत्तारुढ़ कांग्रेस, आठ विपक्षी दलों के गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों के बीच तिकोना मुकाबला है।
इस सीट के लिए नौ अप्रैल को वोट पड़ेंगे। पिछली बार राज्य में सत्तारुढ़ कांग्रेस ने यह सीट जीती थी। उसने इस बार भी निवर्तमान सांसद सी.एल. रुआला को टिकट दिया है। यूडीएफ की ओर से राबर्ट रोमाविया रायते मैदान में हैं तो आप की ओर से एक सेवानिवृत्त आईएसअधिकारी एम. लालमनजुआला। आठ विपक्षी दलों के हाथ मिलाने से अबकी कांग्रेस की राह मुश्किल हो गई है। यूडीएफ की अगुवाई राज्य में 1998 से 2008 तक राज करने वाला मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) कर रहा है।
कभी लालदेंगा की अगुवाई में दो दशकों तक चले उग्रवादी आंदोलन के लिए देश-विदेश में सुर्खियां बटोरने वाले मिजोरम की गिनती अब पूर्वोत्तर के सबसे शांत राज्यों में होती है। जनादेश की इस संवाददाता ने कई इलाकों का जायजा लिया ताकि राजनैतिक तस्वीर साफ़ हो। खास बात यह है कि राजधानी आइजोल में नीली लुसाई पहाड़ियों के पीछे से सूर्य सुबह साढ़े चार बजे के आसपास ही जगमगाने लगता है। अंधेरा जल्दी होने की वजह से दुकानें और बाजार तो शाम चार बजे के बाद बंद हो जाते हैं। लेकिन शहर उसके बाद भी देर तक जगा रहता है। घड़ी नहीं हो तो यह पता लगना मुश्किल है कि शाम हुई है या आधी रात। राजधानी आइजोल एक आधुनिक व साफ-सुथरा लेकिन महंगा शहर है। तमाम दुकानदार स्थानीय ही हैं। स्थानीय आदिवासी कानूनों के मुताबिक कोई बाहरी व्यक्ति यहां जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकता। पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों की तरह मिजो महिलाएं बेहद कर्मठ हैं और पुरुष आलसी। लगभग हर दुकान पर महिलाएं ही बैठी नजर आती हैं।
ललथनहौला की अगुवाई में राज्य में कांग्रेस की सरकार है। लेकिन विपक्ष ने उस पर भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और विकास की दिशा में कोई काम नहीं करने का आरोप है। दूसरी ओर, कांग्रेस उम्मीदवार रुआला पिछले पांच वर्षों के दौरान किए गए विकास कार्यों का हवाला देकर वोट मांग रहे हैं। इन चुनावों में भी विकास और वर्षों से त्रिपुरा के शिविरों में रह रहे हजारों ब्रू शरणार्थी ही सबसे बड़ा मुद्दा हैं। अपनी लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा की वजह से मिजोरम का रणनीतिक महत्व है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां कोई भी पार्टी जब चाहे प्रचार नहीं कर सकती। उसे बाकयादा सामाजिक संगठन यंग मिजो एसोसिएश से अनुमति लेकर सभाएं करनी पड़ती है। राजधानी में चुनावी सभाओं के लिए जगह तय है। इस ईसाई-बहुल राज्य में चर्च की भूमिका काफी अहम है। उसके समर्थन से ही उममीदवारों का भाग्य तय होता है।
सबसे धनी और सबसे गरीब
मिजोरम में सत्तारुढ़ कांग्रेस के निवर्तमान सांसद और उम्मीदवार सी.एल.रुआला सबसे गरीब उम्मीदवार हैं। उनके पास लगभग तीन करोड़ की संपति और पांच लाख नकद हैं। यूडीएफ के राबर्ट 34.49 करोड़ की संपत्ति के साथ इस सूची में सबसे ऊपर हैं। आप उम्मीवार लामनजुआला के पास भी कोई सात करोड़ की संपत्ति है। पहले एक निर्दलीय उम्मीवार वानलालगइया भी मैदान में थे। लेकिन बाद में उन्होंने नामांकन वापस ले लिया।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क

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