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Anna Hazare Arvind Kejriwal

अन्ना जी लोकतंत्र इतना सस्ता नहीं है

Questions are being raised against India against corruption and its doer Arvind Kejriwal

संसद में सरकार द्वारा लोकपाल बिल पेश कर दिए जाने के बाद देश में अजब तनातनी का माहौल बनता जा रहा है। गांधी जी के दूसरे अवतार (Gandhi’s second avatar) घोषित किए जा रहे अन्ना हजारे सरकारी लोकपाल बिल की प्रतियां जलाकर ऐलान कर रहे हैं कि वह तो 16 अगस्त से आमरण अनशन पर बैठेंगे, उधर सरकार की भी जिद है कि इस बार अन्ना के नखरे नहीं सहेंगे। इस सबके बीच अन्ना के आंदोलन को हवा पानी दे रही संस्था इंडिया अगेंस्ट करप्शन (India against corruption) और इसके कर्ता-धर्ता अरविंद केजरीवाल पर सवाल उठ रहे हैं।

Late Prabhash Joshi questioned the RTI Awards of Kejriwal’s organization

हालांकि यह पहला मौका नहीं हैं जब केजरीवाल की संस्था पर उंगलियां उठी हैं। याद है पिछले लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद स्वर्गीय प्रभाष जोशी ने केजरीवाल की संस्था के आरटीआई अवार्ड्स पर सवाल उठाए थे। उनका सवाल था कि आरटीआई जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर ऐसे अखबार के संपादक और मालिक किस तरह ज्यूरी में शामिल हो गए, जिन्होंने चुनाव में पैसा लेकर खबरें छापीं और काला धन बनाया?

प्रभाष जोशी के शब्दों को यथावत् उद्धृत करना ठीक रहेगा-

”वे जब सूचना के जन अधिकार अभियान के कार्यकर्ता हुआ करते थे तो अरविंद केजरीवाल से मिलना जुलना होता था। फिर जब सूचना के अधिकार का कानून बन गया तो केजरीवाल ने दिल्ली जैसे महानगर में काम करने के लिए “परिवर्तन” नाम की संस्था बनाई। गांवों में काम करने वाले लोगों से सीधे मिलने और बात की बात से प्रचार करके काम चला सकते हैं। महानगर में मीडिया की सहायता के बिना लोगों तक पहुंचा नहीं जा सकता। केजरीवाल ने इसलिए दिल्ली के मीडिया से संबंध बनाए और उससे मिले सहयोग के कारण उनके काम का असर भी हुआ। भले लोगों की सिफारिश पर उन्हें मेग्सेसे भी मिल गया। अब वे सूचना के अधिकार आंदोलन के नेता हो गये। अब वे पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन के जरिये सूचना के अधिकार को बढ़ाने वाले लोगों को राष्ट्रीय पुरस्कार देने वाले हैं।

अच्छा है। लेकिन इससे अपने को उत्तेजित होने की जरूरत नहीं थी। यह कागद कारे इसलिए लिख रहा हूं कि अरविंद केजरीवाल ने यह पुरस्कार तय करने के लिए जो समिति बनाई है, उसमें ऐसे अखबार और उसके मालिक संपादक को भी रखा है, जिसने इस लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार किया। भ्रष्टाचार तो हिंदी इलाके के और भी बल्कि देश भर के अखबारों ने किया। पैसे लेकर उम्मीदवारों के प्रचार को खबर बनाकर छापा और पाठकों को बताया तक नहीं कि ये खबरें उनकी नहीं, उम्मीदवार के प्रचार के विज्ञापन हैं। उम्मीदवारों को अपना खर्च सीमा में रखने और काले पैसे से मनचाहा प्रचार पाने की सुविधा हुई। चुनाव कवरेज के लिए हिंदी इलाके में घूमने वाले समझदार और जानकार पत्रकारों का अंदाज है कि उत्तर प्रदेश के इस अखबार ने इस चुनाव में कोई दो सौ करोड़ रुपये का काला धन बनाया है।“

जोशी जी का कहना था कि उत्तर प्रदेश के इस अखबार ने इस चुनाव में कोई दो सौ करोड़ रुपये का काला धन बनाया था। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि केजरीवाल की संस्था इंडिया अगेंस्ट करप्शन पर भी जनलोकपाल को लेकर उंगलियां उठ रही हैं। ऐसे में कैसे यह भरोसा कर लिया जाए कि अन्ना मंडली पूरी तरह ईमानदार है?

जब आरटीआई के अवार्ड्स घोषित करने वाली ज्यूरी में काला धन बनाने वाले अखबारों के मालिक और संपादक शामिल हो सकते हैं तब यह भरोसा कैसे कर लिया जाए कि अन्ना दूसरे गांधी हैं और जनलोकपाल ईमानदार पहल?

अन्ना के कह देने भर से उनकी टीम पर भरोसा कैसे कर लिया जाए? क्या उनके सहयोगियों का सरकारी नौकरी का कार्यकाल पूरी तरह ईमानदार और निःस्वार्थ रहा है?

हैरानी इस बात की भी है कि जो अरविन्द केजरीवाल यूपीए सरकार पार्ट वन के साथ बैठकर सूचना का अधिकार कानून बना रहे थे उन्हें अब सारे नेता बेईमान नज़र आने लगे हैं और अन्ना दूसरे गांधी!

हालांकि न तो अन्ना दूसरे गांधी हैं और न दूसरे जेपी। अन्ना को जेपी या गांधी साबित करना गांधी और जयप्रकाश के अरमानों उनके सपनों और बलिदानों की हत्या है। अन्ना का रास्ता गांधी और जेपी का रास्ता नहीं है।

गांधी ने आजादी के आंदोलन को जनान्दोलन बनाया। उनकी लड़ाई में समाज का हर वर्ग उनके साथ था, वह स्वतःफूर्त आन्दोलन था उसके लिए न एसएमएस किए जाते थे और न पोस्टर छापे जाते थे और जिस लोकतंत्र को अन्ना मंडली गालियां देते नहीं थक रही वह लोकतंत्र निश्चित रूप से बहुत बलिदानों के बाद मिला है।

इसी तरह जेपी का आंदोलन भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए था न कि लोकतंत्र की हत्या के लिए। उनका आंदोलन खड़ा ही इंदिरा गांधी की उन नीतियों के खिलाफ हुआ था जो लोकतत्र का गला घोट रही थीं।

सत्ता और व्यवस्था में बदलाव राजनीतिक आंदोलनों से ही आते हैं। गैर राजनीतिक आंदोलन भी कहीं न कहीं राजनीति ही करते हैं। इस देश में आजादी के बाद दो बड़े आंदोलन हुए जिन्होंने सत्ता को पलट दिया। दोनों ही आंदोलन राजनीतिक आंदोलन थे। पहला जेपी का संपूर्ण क्रांति, भले ही वह अधूरी ही रही और दूसरा वीपी सिंह का बोफोर्स तोप सौदों के खिलाफ आंदोलन। स्वयं गांधी जी भी भले ही कपास कातते रहे हों और रघुपति राघव राजाराम गाते रहे हों लेकिन आजादी की लड़ाई भी राजनीतिक आंदोलन ही था। क्योंकि जिस राष्ट्र और देशभक्ति का हम नारा लगाते हैं उस राष्ट्र और देश की सीमाएं भी राजनीति ही तय करती है।

यह भी ध्यान रखना होगा कि जिस देश में राजनीतिक दल और लोकतंत्र कमजोर होते हैं वहां तानाशाही और अराजकता पैदा होती है। हमारे पड़ोस में इसके उदाहरण मौजूद हैं।

अन्ना दूसरे गांधी इसलिए भी नहीं हैं कि उनके साथ आम भारतीय नागरिक नहीं है, हां उनके साथ कॉरपोरेट घराने हैं, दिल्ली में शाम को इंडिया गेट पर आइसक्रीम खाने वाला खाया पीया अघाया उच्च मध्यम वर्ग है, देश में भ्रष्टाचार को वैध बनाने वाले एनजीओ हैं, व्यापारी हैं लेकिन आम मजदूर किसान गरीब नहीं हैं। कमोबेश जो वर्ग अन्ना के साथ नहीं है उस वर्ग की आबादी इस देश में 60 फीसदी से ज्यादा है।

हां अन्ना मीडियावीर हैं, नवधनाढ्य वर्ग के चहेते पूंजीवादी मीडिया और साइबर जगत की उपज हैं लेकिन इस मीडिया की एक सीमा है, वह तात्कालिक है उससे आम आदमी का हीरो नहीं बना जा सकता।

अन्ना मंडली भले ही राजनीति और राजनेताओं को कोस रही हो और लाख दावे कर रही हो कि उसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है लेकिन उसकी अभी तक की सारी हरकतें बाबा रामदेव की तरह राजनीति के पिछले दरवाजे से सत्ता पर हावी होने की ही हैं।

अन्ना मंडली का दावा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सारा देश उनके साथ खड़ा है। अगर ऐसा ही है तो अन्ना के अनशन ड्रामा के बाद भी केरल, पं बंगाल और असम में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सरकार क्यों बन गई?

हमारी अन्ना के जनलोकपाल से सहमति न बन पाने के कई कारण हैं। कानून बनाना संसद का विशेषाधिकार है। तथाकथित नागरिक समाज किसी कानून की रूपरेखा बना प्रस्ताव के तौर पर किसी सांसद को तो दे सकता है किसी राजनीतिक दल को दे सकता है और सरकार से भी मांग कर सकता है लेकिन यह जिद नहीं की जा सकती कि हमें भी कानून बनाने में शामिल करो, यह संसद के विशेषाधिकार का हनन है।

अब जब सरकार ने संसद् में लोकपाल बिल पेश कर ही दिया है तब अन्ना मंडली इतनी आक्रामक, हिंसक और उतावली क्यों हो रही है? अन्ना मंडली के लोग लगातार अशिष्ट भाषा का प्रयोग कर रहे हैं और उनकी स्थिति ”गाते-गाते चिल्लाने लगे हैं“ वाली हो रही है। क्या इस मंडली को इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान में यकीन नहीं रह गया है?

निश्चित रूप से अन्ना मंडली इस देश के लोकतांत्रिक संविधान की विरोधी है, उसकी न देश में आस्था है न संविधान में और न लोकतंत्र में। यह सिर्फ हमारा आरोप नहीं है बल्कि इसके लिए अन्ना मंडली की वेब साइट पर पड़ी सामग्री को देख लीजिए बात साबित हो जाएगी।

”सत्ता के शब्दजाल और लोकपाल“ शीर्षक से एक लेख में कहा गया है- ”अन्ना की बात को अनसुना कर सारी बहस को सिर्फ तीन शब्दों में अटका दिया जा रहा है – प्रधानमंत्री, संसद और जज। दुन्हाई दी जा रही है कि संसद की महिमा, प्रधानमंत्री की गरिमा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। यह सत्ता का शब्दजाल है। 63 साल से लोकतंत्र के नाम पर जनता को छलने का काम इसी तरह के शब्दजालों के सहारे हुआ है।“

यानी पिछले 63 सालों में सिर्फ देश की जनता को छलने का ही काम किया गया है। लेकिन इस भाषा का प्रयोग करते समय अन्ना मंडली भूल गई कि इन 63 सालों में ही सरदार पटेल, डॉ. अंबेडकर, रफी अहमद किदवई, जयप्रकाशनारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, ईएमएस नंबूदरीपाद और कर्पूरी ठाकुर, भी हुए हैं, जिन पर यह 63 साला लोकतंत्र नाज़ करता है।

इतना ही नहीं अन्ना मंडली इस देश के संघीय ढांचे और सत्ता के विकेंद्रीकरण की भी विरोधी है। अन्ना द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र में इस मंडली की यह भावना साफ जाहिर होती है। एक तरफ जब मांग उठती रही है कि संविधान की धारा 356 का दुरूपयोग रोका जाए और राज्यों को और अधिक अधिकार दिए जाएं ऐसे में अन्ना जी फरमाते हैं- ”हमारा कहना है कि केंद्रीय कर्मचारियों पर निगरानी रखने के लिए लोकपाल बनाया जाये और इसी कानून के तहत हर राज्य में लोकायुक्त बनाया जाए। प्रणव मुखर्जी साहब ने मीटिंग में कहा कि राज्यों के मुख्यमंत्री इसके लिए तैयार नहीं हैं। पहली बात तो कि राज्यों के मुख्यमंत्रियों से पूछने की जरूरत ही नहीं थी।“

इसी तरह http://lokpal&hindi-blogspot-com/2011_07_01_archive-html  लिंक पर अन्ना मंडली का उद्गार देखिए ” हमें समझ में नहीं आता कि सरकार एक ही कानून के जरिए लोकपाल और लोकायुक्त बनाने में क्यों हिचक रही है? क्या राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार से निजात पाने के लिए जनता को अभी और कई सालों तक इंतजार करना पड़ेगा।“

अब अन्ना मंडली के पास इसका क्या उत्तर है कि राज्यों के मुख्यमंत्रियों से तो पूछने की जरूरत ही नहीं है जिन्हें इस देश की जनता ने चुना है लेकिन कॉरपोरेट घरानों के पिट्ठुओं की जिद पर कानून बना दिया जाए?

हमारा न अन्ना से और न उनकी टीम से कोई व्यक्तिगत मतभेद है और न अन्ना के विरोध में होने का मतलब भ्रष्टाचार का समर्थक होना या कांग्रेसी होना है। भ्रष्टाचार से त्रस्त आम आदमी है, टीम अन्ना नहीं। इसलिए बिना भावनाओं में बहे अन्ना मंडली के खतरनाक मंसूबों को समझना बहुत जरूरी है। हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि 250 सालों के संघर्ष के बाद हमें आजादी और लोकतंत्र हासिल हुए हैं, इसे किन्हीं कॉरपोरट शुभचिंतकों के बहकावे में हम गिरवी नहीं रख देंगे।

अमलेन्दु उपाध्याय

About the author

अमलेन्दु उपाध्याय: लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं। http://hastakshep.com/oldold के संपादक हैं. संपर्क-amalendu.upadhyay(at)gmail.com

About अमलेन्दु उपाध्याय

अमलेन्दु उपाध्याय, लेखक वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक व टीवी पैनलिस्ट हैं। वे hastakshep.com के संस्थापक/ संपादक हैं।

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