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अफजल या फिर फांसी पर किसी के महज सवाल उठा देने से वह देशद्रोही नहीं हो जाता

लोकतंत्र इतना कमजोर नहीं
एक शैक्षणिक परिसर में चार लोग जुटकर देश के खिलाफ नारा लगा दिए। हमारा राष्ट्र और उसका लोकतंत्र इतना कमजोर नहीं है कि उससे डर जाए।
अनायास ही नहीं बीजेपी सेठों, साहूकारों और कारोबारियों की चहेती पार्टी बनी हुई है, क्योंकि उसके पास ही वह हथियार है जो उन्हें किसी संकट से उबार सकता है। कारोबारी घरानों के सवा लाख करोड़ के कर्ज माफी की खबर क्या फैली सत्ताधारी लोगों के हाथ पांव फूल गए। भक्तों तक की बोलती बंद हो गई थी।
मोदी साहब भी माहिर खिलाड़ी हैं। मुद्दे को कैसे बदलना है कोई उनसे सीखे। दो दिन भी नहीं बीता कि नागपुरी जादू के पिटारे से तीन-तीन मुद्दे बाहर आ गए। अब आप तय करिए किसको आगे बढ़ाना है। जेएनयू के ‘राष्ट्रद्रोह’ को या फिर

हेडली के इशरत प्रकरण को या प्रेस क्लब की घटना को। फिर पूरे भक्त मीडियातंत्र को इस काम में लगा दिया गया।
किसी एक शैक्षणिक परिसर में चार लोग जुटकर देश के खिलाफ नारा लगा दिए। हमारा राष्ट्र और उसका लोकतंत्र इतना कमजोर नहीं है कि उससे डर जाए। या फिर उसको कोई खतरा महसूस होने लगे। यह देश तो उस समय नहीं डरा जब पूरा पंजाब आतंकवाद की आग में जल रहा था। खालिस्तान के नाम पर सेना में विद्रोह तक की नौबत आ गई थी। मुल्क उस वक्त भी नहीं डिगा जब पूरा उत्तर-पूर्व देश का हिस्सा ही नहीं लगता था। शायद ही कोई सूबा ऐसा हो जो घुसपैठ और अलगवावादी समस्या की चपेट में ना रहा हो। या नासूर बन चुकी कश्मीर की समस्या भी इसके हौसले को नहीं तोड़ सकी। एलटीटीई जैसे उग्रवादी संगठन के हमले का भी इसने मुंहतोड़ जवाब दिया। इमरजेंसी का काला साया भी इसका बाल बांका नहीं कर सका। ऐसे में चार लोगों के नारे से अगर सत्ता प्रतिष्ठान और उससे जुड़े लोग डर जा रहे हैं तो यह जरूर चिंता का विषय है। दरअसल इस देश को खतरा इन छोटे-मोटे आंदोलनों से नहीं बल्कि उनसे है जो देश को धार्मिक-जातीय और क्षेत्रीय आधार पर बांटने की कोशिश कर रहे हैं। किसी भी परिवार की ताकत उसकी अपनी एकता होती है। लेकिन एकता में आई दरार उसको सबसे ज्यादा कमजोर करती है। जिसकी भरपाई सालों में नहीं हो पाती। क्योंकि यह समाज और देश को अंदर से तोड़ती है। ऐसे में अगर कोई देश को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा है तो वह सांप्रदायिक-फांसीवादी ताकतें जिनका एकसूत्रीय कार्यक्रम देश में भाईचारे के माहौल को बिगाड़ना है। यह विभाजन कहीं हिंदू-मुस्लिम का होगा तो कहीं ब्राह्मणवाद के बर्चस्व और दलित उत्पड़ीन के तौर पर दिखेगा। या फिर किसी दूसरे गैर जरूरी मुद्दों पर ध्रुवीकरण के रूप में।
अफजल या फिर फांसी पर किसी के महज सवाल उठा देने से वह देशद्रोही नहीं हो जाता
जेएनयू या फिर देश में कहीं भी भारत विरोधी नारे का कोई नासमझ ही समर्थन कर सकता है। जेएनयू में अगर चंद लोगों ने यह काम किया है तो इसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए। रही अभिव्यक्ति की आजादी की बात तो वह किसी का भी बुनियादी संवैधानिक अधिकार है। उससे उसको वंचित नहीं किया जा सकता है। अफजल या फिर फांसी पर किसी के महज सवाल उठा देने से वह देशद्रोही नहीं हो जाता। पूरा नागरिक समाज इस पर बहस करता रहा है। तो क्या सब देशद्रोही हैं? दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने अफजल और याकूब की फांसी को राजनीति से प्रेरित बताया है। तो क्या फिर जस्टिस एपी शाह देशद्रोही हो गए। अगर देशद्रोह के पैमाने इसी तरह तय किए जाते रहे तो फिर इस मुल्क में देशद्रोही ही बचेंगे। क्योंकि अभी लोग मरे नहीं हैं और न ही लोगों की संवेदना खत्म हुई है। और इन सबसे ऊपर सबने हार नहीं स्वीकार की है। गलत और अन्याय के खिलाफ आवाज उठेगी।
हमें किसी उच्च शिक्षण संस्था के स्वरूप और उसकी जरूरत को भी समझना होगा। देश-विदेश में जितने आंदोलन और प्रवृत्तियां चल रहीं होतीं हैं उन पर विचार और शोध का काम इन्हीं संस्थाओं में होता है। इसमें कुछ उन प्रवृत्तियों के वाहक भी हो सकते हैं। और उनके वैचारिक प्रतिनिधि के तौर पर काम भी कर सकते हैं। चूंकि शैक्षणिक संस्थाएं सोचने समझने वालों और संवेदनशील लोगों का केंद्र होती हैं। लिहाजा उनमें इनका पाया जाना स्वाभाविक है। अगर कहीं नहीं मिलती हैं तब इन संस्थाओं की जीवंतता पर सवाल जरूर उठेगा। लिहाजा परिसरों को किसी खांचे में नहीं बांधा जा सकता है। ऐसा करने का मतलब होगा उन्हें स्वतंत्र और मुक्त चिंतन से रोकना। और फिर एक प्रक्रिया में उनकी आत्मा को मार देना। ऐसे में शिक्षण संस्थाएं किसी सृजन के केंद्र की जगह श्मशान घाट में तब्दील हो जाएंगी। यह एक फ़ासिस्ट सोच के तहत ही हो सकता है। जो हर चीज की सीमा तय कर उसे अपने बनाए जैकेटों में बांध देना चाहती है । लेकिन इसका यह मतलब कत्तई नहीं है कि किसी अलगावादी या विघटनकारी नारे या फिर आंदोलन का समर्थन कर देना। ऐसे लोग संघ, बीजेपी या फिर किसी दूसरी प्रतिक्रियावदी ताकत के ही पक्ष को और मजबूत कर रहे होते हैं। इस मामले में एक उदाहरण ही काफी होगा। नॉम चोम्स्की अमेरिकी नागरिक हैं और वह अमरीका को आतंकी राष्ट्र करार देते हैं। बावजूद इसके वह उस देश में पूरी शान और सम्मान के साथ रहते हैं। उन्हें कोई देशद्रोही नहीं कहता, बल्कि लोग उन पर गर्व करते हैं और पूरी दुनिया में वो जहां भी जाते हैं हजारों हजार की संख्या में लोग उन्हें सुनने के लिए आते हैं।
मोदी और उनके समर्थक जिस आतंकवाद को देश के सबसे बड़े खतरे के तौर पर पेश कर रहे हैं। उसकी सच्चाई क्या है। मोदी साहब और उनकी खुफिया एजेंसियां पूरे देश में आतंकियों की तलाश के नाम पर जगह-जगह नौजवानों की गिरफ्तारियां कर रही हैं, लेकिन जब यूएई के राजकुमार भारत आते हैं तो प्रधानमंत्री सारे प्रोटोकाल तोड़कर उनका स्वागत करने एयरपोर्ट पहुंच जाते हैं। लेकिन यूएई की सच्चाई क्या है? जिस आईएसआईएस ने पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी है। उसे यूएई समेत तमाम अरब मुल्कों ने मिलकर अमेरिका के सहयोग से पैदा किया, पाला पोसा और फिर खड़ा किया है। एक तरफ आप आईएस के आकाओं से दोस्ती करिए और घर में उससे लड़ने की बात करिए। यह पाखंड नहीं तो और क्या है? यह कुछ संघ और मुस्लिम लीग की एकता जैसा नहीं है।
सरकार का यह पाखंड इसी क्षेत्र तक सीमित नहीं है। एक पाखंड हेडली के तौर पर भी सामने आया है। बजाय इसके कि हेडली को अमेरिका से भारत ले आया जाता और जरूरी कानूनों के तहत उस पर मुकदमा चलाया जाता। लेकिन उसे अभयदान देकर अमेरिका में छोड़ दिया गया है। उसके एवज में उससे रोज नये-नये शिगूफे छुड़वाए जा रहे हैं। और उसका अपने पक्ष में जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। हेडली के बयानों की गंगा में मोदी, सीआईए और अमेरिका सब डुबकी लगाकर पवित्र हो जाना चाहते हैं। नहीं तो क्या अपनी अदालतों और जांच एजेंसियों से बड़ा भरोसेमंद आज एक डबल एजेंट (अमेरिका, आईएसआई और एलईटी ) आतंकी हो गया है? क्या उस शख्स की दलीलों पर विश्वास किया जा सकता है ? जिसका इतिहास ही तस्करी, अपराध और लोगों का धोखा देने का रहा हो । जिसने अपनी पत्नी और बच्चे तक से वफादारी नहीं निभाई। लेकिन हमारी सरकार और एजेंसियों के लिए वही सबसे ज्यादा भरोसेमंद हो गया है। सरकार के इस प्रायोजित नाटक में बहुत छेद है। शायद यही वजह है कि गुजरात सरकार के पूर्व डीजीपी आर बी श्रीकुमार तक ने इसकी बगैर जांच किए भरोसा न करने की सलाह दी है।

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