Home » अभी भी सम्भावनाओं से भरपूर है “आप”

अभी भी सम्भावनाओं से भरपूर है “आप”

सुन्दर लोहिया
उन्चास दिन तक दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान अरविन्द केजरीवाल एक बार फिर भ्रष्ट पार्टियों के तानों और व्यंग्यबाणों के निशाने पर आ गये हे। इस बार भाषा कुछ ज़्यादा आक्रामक और अन्दाजे़ बयां उल्लसित लग रहा है। क्योंकि अब केजरीवाल दिल्ली के मुख्य मन्त्री नहीं, पूर्व मुख्यमन्त्री हो गये हैं इसलिए मीडिया के तेवर भी बदले बदले से नज़र आने लगे हैं। जो लोग विरोधी पार्टियों के भेदिये के रूप में घुस आये थे, वे सत्ता में चोंच मारने के अवसर न मिलने के कारण अलग हो गये थे। उनके बाहर निकलने से आप को चिन्ता नहीं हुई थी मगर जो लोग सत्ता से अलग हो जाने के बाद पार्टी में घुस रहे हैं, वे चिन्ता का कारण बन सकते हैं क्योंकि ये उस समय जुड़ रहे हैं जब पार्टी संसदीय चुनाव में उतरने की तैय्यारी कर रही है। लेकिन मेधा पाटेकर और सोरी सोरी जैसी जुझारू महिलाओं द्वारा चुनाव में उतरने की स्वीकृति इसकी विश्वसनीयता को बनाये रखने में मदद कर रही है।
इस सब के बावजूद मैं समझता हूँ कि आप पार्टी को नया काम हाथ में लेने के बजाय अधूरा छोड़ा गया काम पूरा करने की ओर खास ध्यान देना चाहिए। अधूरे छोड़े गये कामों के बारे में मेरी राय है कि बिजली कम्पनियों का महालेखाकार द्वारा ऑडिट और अंबानी कम्पनियों के साथ कांग्रेस की सांठगांठ को उजागर करते हुए इन मुद्दों को तर्कसंगत परिणति तक पहुँचाने के बाद यह पार्टी भारतीय जनता में अपनी विश्वसनीयता को बहुत गहराई तक पहुँचाने में सफल हो सकती है।
संसदीय चुनाव में इसकी तब तक कोई भूमिका बन नहीं पायेगी जब तक जनता में इसकी नीयत पर विश्वास करने के समुचित कारण विद्यमान न हों। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपनी मुहिम को सुदृढ़ बनाते हुए केवल दिल्ली तथा आसपास के संसदीय क्षेत्रों से जांचे परखे उम्मीदवारों को उतारें।
वामपंथी नेताओं को उधार लेने के बजाये उनके विरुद्ध अपने उम्मीदवार न उतार कर उनकी जीत को सुनिश्चित करें तो आपकी नेकनीयत का कुछ पता चलेगा अन्यथा आप पार्टी की जनता में छवि दूसरी पार्टियों जैसी ही हो जायेगी जहां सत्ता हथियाने के लिए भाजपा और कांग्रेस से असंतुष्ठ नेता अपना जनाधार तलाशते हुए घुस आयेंगे।
हिमाचल प्रदेश में पार्टी ने जिस तरह प्रदेश संयोजक को दरकिनार करते हुए भाजपा से अनुशासनहीनता के आरोप के कारण निष्कासित नेता को पैराशूट उम्मीदवार बनाया है उससे पार्टी के भीतर लोकतन्त्र की कमी जगजाहिर हुई है और पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। एक सुगठित सांगठनिक ढांचे के अभाव में ऐसी ग़लतियां और भी हो सकती है इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम को सुदृढ़ करने के लिए संगठन को सुदृढ़ बनाने की ज़रुरत है। हाल ही के घटनाक्रम में आप की राजनीतिक अधकचरेपन के कुछ उदाहरण सामने आये हैं, मसलन गुजरात में केजरीवार को रोकने के रोष में दिल्ली स्थित भाजपा के कार्यालय का घेराव करते हुए आक्रामक हो जाना जिसके फलस्वरूप केजरीवाल को मुआफी मांगनी पड़ी। आप के लिए पार्टी का शिथिल ढांचा खतरनाक साबित हो सकता है। ऐसे खुले दरवाजे में से असामाजिक तत्व और चुनावी माहौल में विदेशी गुप्तचर एजेंसियों के लोग पार्टी के नाम पर हिंसा और उपद्रव की कारवाइयां करके इसकी छवि को ध्वस्त कर सकते हैं। इससे अमेरिकी सरकार की पंसद का प्रधानमन्त्री की जीत की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं। अतः दिल्ली के बाद लखनऊ तथा कुछ अन्य शहरों में जो कुछ घटित हुआ उस पर पार्टी को गम्भीर चिन्तन करने की आवश्यकता है।
    कुछ लोगों को मेरे इस विचार में विरोधाभास नज़र आ सकता है कि मैं एक ओर तो आप को संसदीय चुनाव मे सीमित सीटों पर चुनाव लड़ने का सुझाव दे रहा हूँ और दूसरी तरफ अपनी मुहिम सुदृढ़ करने का आग्रह कर रहा हूँ। मेरा सविनय निवेदन है कि इस पार्टी के बारे में मेरा आकलन समय समय पर बदलता रहा है। क्योंकि यह पार्टी भारतीय राजनीति में एक नये कोरे कागज़ों का महाकाव्य ( बकौल नाटककार मोहन राकेश) लिखने जा रही है। इसके नेता सत्ता की राजनीति के नौसिखिया खिलाड़ी हैं। दिल्ली की सत्ता पर आने से पहले इस पार्टी का कोई राजनीतिक इतिहास नहीं था। इसलिए उसके पास खोने के लिए भी कुछ नहीं था। अब उन्चास दिन की सरकार चलाने के बाद इसने कुछ नये किस्म के राजनीतिक छन्द रचे हैं उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। हमारी व्यवस्था जिस कदर जड़ हो चुकी है उससे हमारी संसदीय चेतना भी निष्क्रिय और लगभग अचेतन हो चुकी है। इस जड़ता को दिल्ली के सामूहिक बलात्कार की गैर राजनीतिक घठना ने तोड़ा जिससे जनता को अपनी संगठित आवाज़ की ताकत का अहसास हुआ जिसे अन्ना हज़ारे के आन्दोलन ने पुष्ट किया और आप पार्टी के तौर पर इस जनशक्ति को अभिव्यक्ति का कारगर ढांचा मिला। इस ढांचे को बचाये रखना अब बचे हुए जनतन्त्र की सेहत के लिए संजीवनी की तरह लाभदायक सिद्ध हो सकता है।
केजरीवाल ने जनता को अपनी बात खुलकर कहने का साहस जुटाया है। कहने को तो भाकपा के गुरुदास गुप्ता ने भी अंबानी बन्धुओं के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर रखी थी लेकिन जनता को उसका पता तो आप की मुहिम के वक्त चला। साफ जा़हिर है कि इस व्यवस्था में अंबानी जैसे लोगों के खिलाफ कानूनी कारवाई तब तक प्रभावशाली नहीं होती जब तक कोई दुस्साहसी व्यक्ति उसे ऊंचे स्वरों में जनता को सुनाने का जोखिम नहीं उठाता। नरेन्द्र मोदी की आलोचना करने वालों की संख्या कम नहीं है लेकिन मोदी को उसके घर में घुसकर विरोधियों का सफाया करके सुशासन का ढिंढोरा पीटने वाला किसी ने नहीं कहा था। किसी ने नहीं कहा कि नरेन्द्र मोदी किसान विरोधी और सही मायने में प्रापर्टी डीलर है। वह भ्रष्टाचार को पनाह देने वाला है क्योंकि उसके मन्त्रियों मे भ्रष्ट शामिल हैं।  किसी ने उसके चौबीस घण्टों बिजली देने के दावे को झूठा सिद्ध नहीं किया सिवाय इस सिरफिरे नेता अरविन्द केजरीवाल के।
इसलिए कई बार सोचता हूँ कि इस जड़ हो चुकी व्यवस्था को झकझोरने की हिमाकत कोई सरफिरा ही कर सकता है और इस समय भारतीय राजनीति में अरविन्द केजरीवाल ही वह सिरफिरा नेता है। इसलिए केजरीवाल की तारीफ़ इस नैतिक साहस को सलाम करता हूँ।

About the author

सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: