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अमित शाह अपने साहेब की कुर्सी पर कभी न कभी आने की इच्‍छा ज़रूर पालेंगे

बीजेपी के कांग्रेसीकरण की दिशा में एक और कदम
अभिषेक श्रीवास्तव

प्रधानजी के कल के भाषण के साथ कांग्रेसमुक्‍त भारत की दिशा में एक और कदम। इसका मतलब यह भी बनता है कि बीजेपी के कांग्रेसीकरण की दिशा में एक और कदम।

याद करें, अरुण शौरी ने क्‍या कहा था : कांग्रेस+गाय=बीजेपी। इसका मतलब है बीजेपी-गाय=कांग्रेस। संघ को बुरा तो लगा होगा।
अब गुजरात पर आएं।
नितिन पटेल छांट दिए गए, विजय रूपानी को कुर्सी मिल गई। प्रधानजी को बुरा लगा होगा।

बुरा लगना भारतीयों का जन्‍मसिद्ध अधिकार है। प्रधानजी को बुरा लगा, तो उन्‍होंने ऐसा बयान दिया कि गौरक्षक बुरा मान गए। रात के अपराधी बुरा मान गए। रात के अपराधियों का सरगना कौन? गेस करिए।

आज वर्मा जी कह रहे थे कि उन्‍हें गट फीलिंग है कि अमित शाह अपने साहेब की कुर्सी पर कभी न कभी आने की इच्‍छा ज़रूर पालेंगे। मुझे ‘अजूबा’ जैसी एकाध पुरानी फिल्‍में याद हो आईं जिसमें बादशाह के साथ उसका वज़ीर धोखा करता है। रूमानी ही सही, ख़याल अच्‍छा है। साहेब कौन नहीं बनना चाहता।

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