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अमेरिका संग रास रचायेंगे, शाही कबाब बनवाएंगे

अब तेलकुओं की आग भी केसरिया हुआ रे भाया।
गब्बर पूछै बैंकिंग सेक्टर से, अब कालिया, तेरा क्या होगा रे
पलाश विश्वास
वैश्विक इशारों में तो फिर कयामत की आहट है।
गृहयुद्ध से छिन्न भिन्न इराक में फिर वहीं तेलयुद्ध का नजारा।
अमेरिकी अगुवाई में नाटो युद्धक विमानों की चांदमारी और तेलकुंओं मे लगी अनंत ज्वालामुखी।
दूसरी ओर अमेरिकी सैन्य राजनयिक मदद से इजराइल का विश्व जनमत को हिरोशिमा नागासाकी बनाकर गाजापट्टी में इंसानी शिक कबाब की बेलगाम दावत।
डालरनत्थी भारतीय अरबपतियों करोड़पतियों, अब भी वक्त है, डालर पर मत इतराइयो।
मुम्मु बेबी से काका ने कभी गा गा कहकर कहा था,गोरा रंग ढल जायेगा।
खैर, पहले सुपरस्टार काका तो अल्लाह को प्यारे हो गये। एंग्री यंगमैन अब भी थोक भाव से अरबपति बनाने वाली मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था में करोड़पति बानाने की कवायद कर रहे हैं और अबकि दफा करोड़पतिया बाबा के योगाभ्यास शिविर में कहकहे लगवाकर अरबपति बने ताजातरीन हंसोड़ बादशाह भी नत्थी है।
बेमौत मारे जाने वाली कौम की संजीवनी कामेडी कम लाटरी है।
डालर पर घनघर संकट बदरिया छायो रे। सद्दाम की आत्मा जाग्यो री।
पुतिनबाबा ने पश्चिमी देशों से आयात पर बंदिश लगा दी है और साइबेरिया उड़ान क्षेत्र भी निषिद्ध होने वाला है।
1989 का वह संक्रमणकाल याद करो रे भाया।
ब्लू स्टार से बहुमती बाहुबलि सरकार ने श्रीलंका में शांति सेना भी भेज दी थी तब।
फिर इलेक्शन में अमेरिकापरस्त भ्रष्टाचार विरोधी जनजागरण की फसल बतौर दो संतानें एकमुश्त एकदम फिल्मी, कमंडल बनाम मंडल।
आरक्षण युद्ध का कायकल्प बाबरी विध्वंस तक और इसीके मध्य चंद्रशेखरी भुगतान संतुलन संकट और खाड़ी युद्ध।
तत्पश्चात नरसिंह अवतार और मनमोहनी अवतरण।
नवउदारवाद का वह पहला चरण वह।
अबकी दफा अमेरिका इजराइल के साथ नत्थी डालर इकोनामिक्स, पारमाणविक सैन्य गठजोड़,गाजापट्टी विध्वंस,केसरियाकारपोरेट नमोनमोमय भारत और तेलकुंओं की आग अपन यूपी में जहां हर जनपद अब इराक है,बस अमेरिकी बमवर्षकों की कसर बाकी है।
ऊपर से सरकार पर भारी कारपोरेट शाहसवारी।
फिर अकाली राजनीति प्रबल उसी तरह और आपरेशन ब्लू स्टार परिदृश्य घनघटा गगन घटा घहरानी अस्सी का दशक अस्सी गंगा तीरे तो ब्रह्मपुत्र में भंवर प्रबल कि उल्फा युद्धघोषणा हो गयो रे।
नवउदारवाद का दूसरा चरण यह।
तब बाबा बुश थे।
अब बाबा बाराक हुसैन ओबामा।
तब यूरो प्रवक्ता सद्दाम यूरो सहयोगे महिषासुर।
अबकी दफा पुतिन महिषासुर।
दुर्गाअवतार की झांकी अभी बाकी है।
इसी पृष्ठभूमि में विदेशी निवेशकों की अटल आस्था डगमगाने लगी है।
अब जैसे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मार्कमानक का हुआ, वैसा किसी गणितीय त्रिकोणमिति चमत्कार से असंभव अमेरिकी पराभव से मसलन यूरो के पुनरूत्थान चमत्कार से हो गया तो इस अरबपति करोड़पति जमात का क्या होगा रे।
इसी के मध्य खैनी मसलते गब्बे बोल्या, अबे बैंक कित्ते ठैरे।
अभी गिनती मुश्किल है। जवाब।
का विवनिवेश विनिवेश चीख्यो, सभै सही सलामत कैसे रे। गब्बर बोल्यो।
एसबीआई को मार दो।
एसबीआई कांपे बुखार लागा हो जैसे।
क्या होगा रे तेरा। बहुत नमक खायो जनता ने सर गब्बर भाया।
मलाई चाट्यो कौन ससुरै। एसबीआई की बोलती बंद।
नमक खायो जनता ने। मलाई चाट्यो जनता ने।
तू अब गोली खा।
इस मकम्मल मुक्तबाजारी कायाकल्प के दूसरे चरण की उड़ान के ठीक पहले के क्षण गाजा इराक यूपी त्रिभुजमध्ये फंसा है सार्वजनिक क्षेत्र का बैंकिग सेक्टर।
जब तक ये बैंक असुर रहेंगे ससुरे, कोई सुधारो पोसिबिल नहीं।
सारे के सारे पढ़ेलिक्खे दीखै।
मुसीबतो है।
सबै चाल बूझ लियो तो विपदा घनघोर।
इन सारन को धूल चटादो दो कुरुक्षेत्र फतह।
सर को खींच्यो तो कान नाक आंख सबैं हाथोंहाथ।
विनिवेश का सारा बोझ बैंकिंग सेक्टर पर।
एसबीआई और एलआईसी हिस्सेदारी खरीद में साझेदार।
सारी राजनीतिक घोषणाओं, सामाजिक योजनाओं से बंटाधार वहीं एसबीआई का।
बैड लोन की भारी शिकायत है।
बैड लोन आखिर है क्या बला।
बैंक वाले इतने भी गधे नहीं कि कारोबार समझते नहीं।
कारपोरेट को बैंकलोन का फैसला राजनीतिक दबाव से होता है।
एक फीसद दो फीसद ब्याज दर कौन तय करता है।
विजय माल्या का किंगफिशर हो या भूषण स्टटील, बैड लोन का आखिरी फैसला किसका होता है, इसकी कभी सीबीआई जांच नहीं होगी।
वित्तमंत्री जो है वहीं फिर रक्षा मंत्री है।
अमेरिकी सरकार पधारो म्हारा देश।
अमेरिका संग रास रचायेंगे।
सौ फीसद,सौ फीसद डीफेंस एफडीआई
इस पर तुर्रा बीमा एफडीआई
उस पर भी तुर्रा रिटेल में विदेशी बहार
इन सबसे ऊपर बीस ताले पर बैठो विपक्ष और क्षत्रप सारे।
पार्टी वहीं जिसकी मय्या महतारी रिमोटधर्यो।
बेट्टा डोलत हुंकारे।
बिटिया रानी नाच नचाओ।
दामाद जी कैश धर्यो गिरधारी महाराज।
औरतें नाइट शिप्ट में कमाई के कातिर बाहर न निकले नमो महाराज।
अप्रेटिंस को भी जाब मिलना चाहिए।
इतना सा राइडर है भायो। बाकी फैक्ट्री एक्ट बदल दो।
ससुरे लेबर कमीशन को हिजड़ा बना दो। सारे कर्मचारियों का गला काट दो।
जो भी कुछ है सरकारी चाहो तो इस सरकार का भी विनिवेश कर दो।
श्रम कानून तो क्या चीज है, सारे कानून का हाल यही होना है।
संविधान को फेंक देना है।
न खाता न बही। जो शाहज्यू कहें, वही सही।
घर घर गाजा।
घर घर इराक।
घर घर यूपी।
जय जय जय बाराक बाबा की जय हो।
जयजयजय हो।
जय जयजय शाहज्यू महारजा की जयहो।
पांव लाग्यो रहै महाराज।
न अगवाड़े की सोच्यो।
नि पिछवाड़े की सोच्यो।
दसो दिशायें केसरिया है।
अब तेलकुओं की आग भी केसरिया हुआ रे भाया।

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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