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अर्थव्यवस्था मजबूत है तो शेयर बाजार धड़ाम-धड़ाम क्यों है ?

अर्थव्यवस्था मजबूत है तो शेयर बाजार धड़ाम-धड़ाम क्यों है ?

यूनान का संकट कुल मिलाकर भारत का संकट भी है
नैनीताल के उस खूबसूरत माहौल और मौसम की शुक्रिया।
प्रणाम हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी जी को जो आज भी हमारे कान उमेठने से परहेज नहीं करते और लिखने में आज भी वे उतने ही सक्रिय हैं जितने हम।
हम यूनान को भली भांति जाने हैं और इसीलिए बगुला अर्थशास्त्रियों के मनुस्मृति मुक्तबाजारी अर्थशास्त्र के मुकाबले हमारी भैंसोलाजी कहीं बेहतर है।
हम उत्पादकों और उत्पादन प्रणाली की अर्थ व्यवस्था और उत्पदक संबंधों के जरिये बनते समता और सामाजिक न्याय के वर्गविहीन वर्णविहीन समाज की बात करते हैं।
वे लंपट महाजनी सभ्यता के कारिंदे हैं।
उनकी पूंजी कोई उत्पादक पूंजी नहीं है और न इससे उत्पादन प्रणाली और उत्पादकों का भला होना है।
उनकी पूंजी निवेशकों की पूंजी है। महाजनी पूंजी है लंपट और उनकी आस्था और उनकी वफा निवेशकों की मर्जी है।
वे तमाम लोग मुहब्बत के खिलाफ हैं।
वे नफरत के कारोबारी हैं।
वे दुनियाभर में हत्याएं और बलात्कार कर रहे हैं।
वे आवाम को कंबंध बनाये हुए हैं।

उनकी अर्थव्यवस्था मुनाफा वसूली की है।
वे यूनान के संकट पर दहाड़े मारकर चीख रहे हैं क्योंकि उनके बाप महतारी डालर मइया की शामत है।
फिरभा उनका दावा है कि भारत को कोई खतरा नहीं है।
चीन की दीवारों तक पहुंचे यूनानी मानसून मूसलाधार देखकर हैजे के मरीज जैसे वे दीक्खे हैं।

अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है तो शेयर बाजार इतना धड़ाम धड़ाम क्यों है, ये नहीं बता रहे हैं।
उत्पादन प्रणाली को तहसनहस करके,  उत्पादकों के थोक कत्लेआम के बंदोबस्त के तहत दुनियाभर के हत्यारों माफियाओं, उठाईगिरों, जेबतकरों और जरायमपेशा गिरोह के साथ लामबंद वे जनता को बेशर्म झूठ बता रहे हैं कि निवेशक तनिको घबड़ाये हैं और बाकीर हमारी अर्थव्यवस्था विकास के बुलेट एक्स्पेस स्मार्च वे पर फटाफट दौड़े हैं।
इस दौड़ से कहां कहां कितनी खून की नदियां बहायी जा रही है, ऐसा वे कभी नहीं बताने वाले हैं।
शुक्र है कि हमने सुकरात, अरस्तू और प्लेटो की मूल रचनाओं के अनुवाद पढ़े नैनीताल में तो ग्लेडिएटर्स की लड़ाई भी देखते रहे हम। हमने बाहैसियत साहित्य के छात्र और रंगकर्मी ग्रीक त्रासदी को खूब पढ़ा है।
हमारे मुताबिक यह ग्रीक त्रासदी डालर के धंधे के लिए है। हर देश के सत्ता वर्ग के लिए है, शेयर बाजारों के लिए है। आम जनता के लिए यह डालर वर्चस्व और विश्वबैंकीय, मुद्राकोषीय, अमेरिकी इजरायली सुधार कार्यक्रमों के खिलाफ खुली बगावत है।
पहले जान लीजिये कि ग्रीत जनादेश का आशय क्या है जो छुपाया जा रहा है।
पहले जान लीजिये कि मुक्तबाजारी सुधारों की अनिवार्य शर्तों के खिलाफ और जायनी विश्वव्यवस्था के खिलाफ है यह ग्रीक जनादेश।
क्योंकि आर्थिक सुधारों के मुक्तबाजारी बंदोबस्त में सामाजिक सुरक्षा और लोककल्याण के सारे कार्यक्रमों के सफाये के वैस्विक इशारों को मानने से साफ इंकार कर दिया है यूनान की जनता ने।
होश में आइये दोस्तों, 2008 की महामंदी ने भारतीय जनता का कुछ उखाड़ा नहीं है जो कृषि संकट है वह हरित क्रांति, अविराम बेदखली अभियान और सुधार अश्वमेधों का विशुद्ध कर्मफल है।
होश में आइये दोस्तों, 2008 की महामंदी ने भारतीय जनता का कुछ उखाड़ा नहीं है क्योंकि सेनसेक्स और निफ्टी की अर्थव्यवस्था से आम जनता का कोई सरोकार तब नहीं था
इसलिए लातिन अमेरिका और खासतौर पर अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्थाओं के मुक्त बाजारी नियति के बारे में कोई खास चर्चा नहीं हुई।
यूनान का संकट कुल मिलाकर भारत का संकट भी है कि रेटिंग एजंसियों, विदेशी निवेशकों, विदेशी हितों और विश्वव्यवस्था के वित्तीयसंस्थानों विश्वबैंक, मुद्राकोष, विश्वव्यापर संगठन वगैरह वगैरह की शर्तों के मुताबिक कारपोरेट वकीलों के हवाले भारत में भी वे शर्तें अनिवार्य है, जो लातिन अमेरिका में लगायी गयी और सारे यूरोप में लगायी जा रही है और जिससे अफ्रिका में भुखमरी है।
सबकुछ डिजीटल इसलिए है कि सबकुछ शेयर बाजार से जोड़कर मुकम्मल महाजनी सभ्यता बहाल हो और मध्ययुगीन तालिबान राजकाज के मार्फत विशुद्धता के सौ फीसद मजहबी दंगों से रंगभेदी नस्ली जनसंहार का सिलसिला जारी रहे ताकि देश के सारे संसाधन विदेशी पूंजी और विदेशी हितों के हवाले हो और पूंजी की अवैध संतानों का सत्तावर्ग बिलियनर मिलियनर का वर्चस्व कायम रहे। कुल मिलाकर मुनाफावसूली का मतलबो यही है।
फ्रांस, जर्मनी और कुछ हद तक इंग्लैंड को छोड़कर महाजनी पूंजी का किय  धरा सारे लातिन अमेरिका, सारे अफ्रीका के बाद सारे यूरोप को अपने शिकंजे में कस चुका है।
यूनान की हालत जितनी बुरी है, उससे बेहतर नहीं है स्पेन, इटली और यूनान के देश जो पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित जर्मनी का कर्ज माफ करते रहे हैं।
महाजनी पूंजी का कर्जा वही है जो सुखीलाला का राज है और मदर इंडिया को सचमुत अब फिर वहीं जहर पीना है।
गौर करें कि विकसित देश यूनान में अनिवार्य आर्थिक सुधारों के बाद भुखमरी की हालत है।
गौर करें कि विकसित देश यूनान में पेंशन आधी से कम कर दी गयी है। जिसे सिरे से खत्म करने का यूरोपीय समुदाय का और विश्व व्यवस्था का दबाव है।
गौर करें कि विकसित देश  यूनान में  तमाम कायदे कानून के साथ साथ मेहनतकशों के हक हकूक भी तमाम करने के मुक्तबाजीरी फतवे हैं और उत्पादन इकाइयों में छंटनी की बहार है।
गौर करें कि विकसित देश  यूनान में  सामाजिक सुरक्षा और लोक कल्याण बाजार के हवाले है।
खींसें में पैसे हों तो मौज करों, पेरिस हिल्टन के साथ सेल्फी दागो, व्यापमं से नौकरियां खरीदो और चियारियों चियारिनों के कैसिनों में मजे लूटो और पैसे न हो तो मरो।
मरने के अलावा मुक्तबाजार में कोई विकल्प नहीं हैै।
मुक्तबाजार के तालिबानी फतवे के खिलाफ यूनानी यह जनादेश है, जिसे यूनान का संकट बताया जा रहा है जो दरअसल महाजनी पूंजी और उसके कारिंदों का संकट है, जनता का संकट यकीनन नहीं। जिससे विस्वव्यवस्था की चूलें हिल गयी है।
हमारी असली लड़ाई तो इस नरमेध अभियान के खिलाफ है।
यूनान की राह पर अगर चल पड़े अफ्रीका , लातिन अमेरिका और यूरोप के देश तमाम तो बंधुआ उपनिवेशों में भी मुक्तबाजारी डालर वर्चस्व तेल कुंओं की आग में स्वाहा हो जाना है।
यूनान और यूरोप के अनुभवों के आइने में देखें तो फासिज्म के हिंदू राष्ट्र में भी हूबहू वही हो रहा है जो अर्जेंटीना,  यूनान,  स्पेन,  इटली, पुर्तगाल के अलावा तमाम विकासशील अविकसित देशों में हो चुका है।
पलाश विश्वास

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