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असंवैधानिक और विध्वंसक नोट नीति-मोदी सरकार सभ्यता और लोकतंत्र की सभी सीमाएँ लांघ चुकी है

मोदी सरकार सभ्यता और लोकतंत्र की सभी सीमाएँ लांघ चुकी है
मोदी सरकार की असंवैधानिक और विध्वंसक नोट नीति
जगदीश्वर चतुर्वेदी

पीएम नरेन्द्र मोदी डर के मारे संसद में नहीं बोल रहे, डर के मारे बैंक पीड़ितों से नहीं मिल रहे, आत्महत्या कर रहे किसानों से नहीं मिल रहे। उनके अंदर का डर इस कदर हावी है कि रिजर्व बैंक को स्वायत्त ढंग से काम नहीं करने दे रहे। इसके विपरीत राहुल गांधी एकदम निडर और निस्संकोच आम जनता में जाकर मिल रहे हैं, बैंक और एटीएम की लाइन में लगे लोगों से मिल रहे हैं, कर्ज से पीड़ित किसानों से मिल रहे हैं। आंदोलनकारी पूर्व सैनिकों से मिल रहे हैं।
लोकतंत्र में तानाशाह और लोकतांत्रिक नेता का अंतर देखना हो तो डर के पैमाने से देखो।
डरा नेता जनता से दूर रहता है, हिटलर की तरह हमेशा सभा मंच पर नजर आता है जनता से दूर रहता है, जबकि लोकतांत्रिक नेता हमेशा जनता में नजर आता है।
जिस तरह आपातकाल ने उत्तर भारत में कांग्रेस की कमर तोड़ी थी वैसे ही नोटबंदी ने भाजपा की पूरे देश में रीढ़ तोड़ दी है।

आपातकाल के लाभ विपक्ष ने उठाए उसी तरह नोटबंदी से पैदा हुई तबाही का लाभ विपक्ष को मिलना तय है।
नोटबंदी के मायने हैं “नो अपील नो वकील और नो दलील”। यही आपातकाल का मोटो था। जिसे सुप्रीम कोर्ट में उस जमाने के महान्यायवादी ने व्यक्त किया था।
पी एम नरेन्द्र मोदी लगातार झूठ बोल रहे हैं, वे कह रहे हैं नोट बंदी का कुछ दिन तक ही बुरा असर रहेगा। सच यह है इसका बहुत ज्यादा दिनों, कई महिने और कई साल तक बुरा असर रहेगा। भारत की सारी दुनिया में इससे मट्टी पलीत हुई है। अब विदेशी पूंजी निवेश कम से कम भारत में निकट भविष्य में नहीं आएगा।

सारी दुनिया जान गयी है भारत में इस समय ऐसा पीएम है जिसके पास स्नातक स्तर के ज्ञानधारी देशभक्त और नौकरशाह हैं।
सारी दुनिया में जितने पीएम हैं वे बेहतरीन शिक्षितों से विभिन्न पहलुओं पर सलाह करके नीति बनाते हैं, लेकिन मोदी ज्ञानी और विद्वानों से कोसों दूर रहते हैं, उनके पास नौकरशाह सलाहकार हैं, ये नौकरशाह सलाहकार अधिक से अधिक स्नातक हैं और इनकी कोई विशेष योग्यता नहीं है।
इसके अलावा यह भी पता चला है कि नोट नीति बनाते समय कुछ ही लोगों से सलाह करके फैसला लिया गया। ये कुछ लोग कौन हैं यह भी सामने आना बाकी है। उनके काम करने की पद्धति वही है जो आपातकाल में श्रीमती गांधी की थी। वे चंडाल चौकड़ी से घिरी हुई थीं, सारे फैसले चंडाल चौकड़ी लेती थी, मंत्रिमंडल कागजी था, संविधान फालतू था।
मोदी भी चंडाल चौकड़ी से घिरे हैं और वही देश को संचालित कर रही है।
नोट बंदी का फैसला इसी चंडाल चौकड़ी ने लिया है।

अखबारों में अभी जो नाम आ रहे हैं वे सब गलत हैं। असली नाम कुछ और हैं।
नोट बंदी का फैसला न तो रिजर्व बैंक ने लिया है और न मंत्रिमंडल ने विस्तार से बहस करके लिया है। यह फैसला मूलतःपीएम का है और उसे सारे देश पर थोप दिया गया है।
नियमानुसार यह फैसला संसद और रिजर्व बैंक को लेना था, लेकिन संसद को ठेंगे पर रखा गया है, रिजर्व बैंक को रबड़ स्टैम्प की तरह इस्तेमाल किया गया है। इस सबको नाम दिया गया सीक्रेसी का।
जो नीति सारे देश पर लागू होनी है उस पर सीक्रेसी की क्या जरूरत, यह बात हमारी समझ में नहीं आती।
यह कैसी नीति है जिस पर रिजर्व बैंक बहस न करे, संसद बहस न करे, मंत्रीमंडल में बहस न हो, देश में बहस न हो और देश से कह दिया जाए कि तुम नीति का पालन करो। यही तो अधिनायकवाद है।

      नोट नीति के जरिए पीएम मोदी की जनता में पहली बार प्रशासनिक दक्षता परीक्षा हुई और वे इसमें बुरी तरह फेल हुए हैं। जबकि वे प्रशासनिक दक्षता और ईमानदारी के दावे पर वे लोकसभा का चुनाव जीतकर आए थे। 
इस नीति के पहले उनकी नीतिगत तौर पर जनता में कोई परीक्षा नहीं हुई थी, यहां तक कि जिन जनधन खाता धारकों के करोड़ों खाते खुलवाने का वे दावा करते हैं उसमें बैंक कर्मचारियों की बड़ी भूमिका थी, इसमें मोदीजी की प्रशासनिक क्षमता नजर नहीं आती। जिस तरह वे खाते खुले हैं, सारा देश जानता है। उनकी अक्षमता,मूर्खता और जनविरोधी भावनाओं को आम जनता में नंगा करके रख दिया है।

कल राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विमुद्रीकरण की नीति को सटीक आलोचना करते हुए तबाही के जिस मंजर का खाका पेश किया है वह हम सबके लिए चिन्ता की बात है।
इसके विपरीत कल वित्तमंत्री अरूण जेटली की पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर हमला करने वाली प्रेस कॉंफ़्रेंस देखकर यह विश्वास हो गया है कि मोदी सरकार सभ्यता और लोकतंत्र की सभी सीमाएँ लांघ चुकी है और असहिष्णुता के शिखर पर बैठी है।
जेटली के बयान का मर्म यह था कि मनमोहन सिंह को बोलने का कोई हक नहीं है, क्योंकि उनके शासन में कालाधन आया, सबसे ज्यादा घोटाले हुए, वे महान पापी हैं! जो महान पापी हैं उनको मोदी जैसे चरित्रवान,ईमानदार, बेदाग़ नए कपड़े पहने वाले नेता की नीति की आलोचना करने का कोई हक नहीं है। मोदी जी इतने महान हैं कि विगत सत्तर साल में इस तरह का चरित्रवान और पुण्यात्मा कोई पीएम नहीं बना है! सच तो यह है उनसे बेहतर कोई पीएम न तो सोच सकता है और न बोल ही सकता है!!
मोदी महान हैं! क्योंकि वे संविधान के बंधनों से मुक्त हैं! हमेशा 125 करोड़ लोगों के बंधन में बँधे रहते हैं। 125 करोड लोगों की तरह ही सोचते हैं, हँसते हैं, गाते हैं ,खाते हैं, रोते हैं!! उनके मन और तन में 125 करोड़ मनुष्य वास करते हैं! करोड़ों जीव-जन्तु-पशु-पक्षी उनके हृदय में निवास करते हैं !
उनका मन मंदिर है और हृदय जंगल है। वे इस जंगल के बेताज बादशाह हैं। वे वैसे ही अक्लमंद हैं जैसे जंगल में पशु -पक्षी अक्लमंद होते हैं। जिस तरह 125 करोड़ जनता कभी किसी अर्थशास्त्री से राय नहीं लेती, जो मन में आए काम करती है मोदी भी ठीक वैसे ही काम करते हैं। यही वजह है मोदी महान हैं!
मोदी की आलोचना वही कर सकता है जो उनके जैसा महान हो ! मनमोहन चूँकि मोदी जैसे महान नहीं हैं इसलिए उनकी बातों को गंभीरता से दरकिनार करने की जरूरत है।
रही बात संसद की तो संसद नक्षत्रों से भरी है उसमें मोदी जैसा सूर्य मिसफ़िट है। यही वजह मोदी जैसा सूर्य हमेशा संसद के बाहर ही चमकता है, आज पंजाब में दिखाई दिए।

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