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असंवैधानिक सत्ता केन्द्रों के प्रतिनिधि नरेंद्र मोदी

फासीवाद में लोग भूखे नहीं मरते लेकिन सवाल करने वाला भूखा मरता है।
ओमेर अनस
पहले ये माना जाता था कि भारतीय जनता पार्टी एक संगठन है जो परिवारवाद की पकड़ से पूरी तरह से मुक्त है और इस परिवारवाद को लम्बे समय तक एक गाली की तरह भाजपा ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य पार्टियों के खिलाफ प्रयोग किया है। परिवारवाद की कल्पना भी ऐसे की गई थी की भाजपा खुद उसके पकड़ में ना आने पाए। किसी हद तक भाजपा परिवारवाद से मुक्त रही है। नरेंद्र मोदी भी कह रहे हैं कि उनके आगे पीछे कोई नहीं है इसलिए वो भ्रष्ट नहीं हो सकते। मोदी की बात सही है लेकिन उसव क्त जब हम ये मानें कि मोदी केवल एक व्यक्ति हैं। अगर मोदी किसी जंगल में बैठ कर तपस्या कर रहे होते तो उनकी बात पर किसी को भी विश्वास हो सकता था। मोदी अपने व्यक्तित्व पर वोट बटोरना चाहते हैं। वो ये समझा रहे हैं कि वो एक पिछड़ी जाति के हैं। वो चाय बेचने वाले हैं वो जमीन से उठकर आये हैं। मोदी बिलकुल उसी तरह से वोटरों को सम्मोहित कर रहे हैं जैसे उर्दू में कई सारे इस्लामी नॉवेल एक आम मुस्लिम पाठक को सम्मोहित करते हैं। मोदी की मजबूरी और मोदी की मजबूती दोनों एक ही जगह हैं और खुद बीजेपी को नहीं मालूम कि मोदी की सम्मोहन कला किया गुल खिलायेगी, मोदी के कई सारे मिथकों से बने इस सम्मोहन को देखना ज़रूरी है

व्यक्तित्व के तौर पर शायद मनमोहन सिंह से शालीन व्यक्तित्व किसी प्रधानमंत्री का नहीं रहा होगा। किसी का व्यक्तिगत तौर पर उन्होंने आज तक कुछ नहीं बिगाड़ा। वीपी सिंह बुरे नहीं थे। लोहिया के ज़माने के एक साहब ने बताया कि लोहिया कहते थे कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने से एक फायदा हुआ कि रोजाना सुबह एक खूबसूरत सी लड़की मुख्यपेज पर देखने को मिल जाती है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी एक व्यवस्था का नाम है जो हिटलर की तरह या किसी भी तानाशाह की तरह पूरी व्यवस्था को अपने अधीन कर लेने की कोशश कर रहा है। कोई बताये कि नरेंद्र मोदी रोजाना कह रहे हैं की नियमों और नीति में परिवर्तन नहीं बल्कि गुड गवर्नेंस की जरूरत है। किस बूते पर उनके समर्थक और कॉर्पोरेट घराने कह रहे हैं कि मोदी के आते ही गुड गवर्नेंस चालू हो जायगा। बिलकुल हो जायगा क्योंकि नरेंद्र मोदी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपने इशारों पर काम करने वाला बना लेंगे। सड़कें और पुल और अस्पताल महीनों नहीं हफ़्तों में बन कर खड़े हो सकते हैं लेकिन उसी वक्त जब रास्ते के सभी लोकतान्त्रिक प्रक्रीयाओं को एक ही खिड़की में जमा कर दिया जाय। संविधान के अनुसार जिस लोकतान्त्रिक व्यवस्था के हर व्यक्ति को मालूम होना चाहिए कि अम्बानी और टाटा की फाइलें कैसे धड़ाधड़ पास हो जाती हैं। जिस व्यवथा को एक तानाशाही आदेश के कोड़े मार-मार कर दौड़ाया जाय उसे फासीवाद कहते हैं। फासीवाद में लोग भूखे नहीं मरते लेकिन सवाल करने वाला भूखा मरता है। मोदी के हाथ में व्यवस्था को डराने धमकाने का कोड़ा है। उनके राज्य में अफसरों और नौकरशाहों की औकात तो छोड़ दीजिये, किसी को ये भी नहीं मालूम है कि गुजरात में मोदी के अलावा कोई दूसरा नेता भी रहता है। मोदी का गुजरात एक भयभीत गुजरात की तस्वीर देता है।

दूसरी बात परिवारवाद की, सिर्फ बेटा और बेटी होना ही परिवारवाद है तो बीजेपी में लोकसभा के 67 टिकट बेटों को दिये गये हैं। ये सही है कि कांग्रेस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी एक परिवार हैं लेकिन दोनों चुने हुए नेता हैं, पार्टी में भी और संसद में भी। मोदी और भाजपा के उस परिवार का किया जिसे न तो जनता ने चुना है और न ही पार्टी ने। भाजपा में तमाम नीतिगत और महत्वपूर्ण पदों पर संघ परिवार द्वारा नियुक्ति होती है। भाजपा को अपने एक एक फैसलों की जानकारी और एक एक फैसले की मंजूरी संघ परिवार से लेनी पड़ती है। संघ परिवार का भाजपा के राजनीतिक कार्यक्रम में दखलंदाजी जगजाहिर है। संघ परिवार का भाजपा को कठपुतली की तरह चलाना ज्यादा खतरनाक है या गांधी परिवार द्वारा कांग्रेस का विधिसम्मत नेतृत्व करना है।

अब तो बीजेपी की हालत तो और ख़राब है क्योंकि पहले ये माना जाता था की बीजेपी में गैर संघ परिवार की पृष्ठभूमि वाले नेताओं के लिए आगे बढ़ने के कोई अवसर नहीं हैं। गैर संघ से आने वाले नेताओं के लिए एक निर्धारित सीमा है, जहाँ सुषमा स्वराज को रोक दिया गया है। अब संघ परिवार में भी एक और परिवार पैदा हो गया है जो अपनी पसंद के फैसलों के लिए पूरी पार्टी को हाइजैक कर चुका है। नरेंद्र मोदी परिवार के अन्दर परिवार वाली एक ऐसी व्यवस्था का चेहरा हैं।

कौन नहीं जानता कि पार्टी में अमित शाह नरेंद्र मोदी के आदेशों को छल कपट प्रपंच से लागू करने वाले एक कुशल सहायक हैं जिनकी जवाबदेही पार्टी अध्यक्ष को नहीं बल्कि सीधे नरेंद्र मोदी को है। लखनऊ और इलाहाबाद में पार्टी के नेताओं की बेचारेपन के चर्चे अब सड़कों पर हैं। भाजपा नाम की पार्टी का वजूद मोदी के वजूद के आगे फीका कर दिया गया है। पार्टी के अन्दर लड़ कर संघर्ष करके आने वाले युवा नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी के प्रति निष्ठा नहीं बल्कि मोदी के प्रति निष्ठा चेक की जा रही है।

अब आखरी सवाल ये है कि इतनी बड़ी पार्टी को दांव पर लगा कर सत्ता की प्राप्ति का आइडिया किसका है ? कौन चाहता है कि पार्टी रहे न रहे, बस मोदी प्रधानमंत्री बन जाएं ? क्या संघ परिवार चाहता है कि देश में नरेंद्र मोदी किसी भी कीमत पर आ जाएं? क्या पार्टी चाहती है कि पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र को कुचलते हुए एक व्यक्ति को इतने अधिकार दे दिए जाएँ कि ‘मोदी ही भाजपा और भाजपा ही मोदी’ हो जाए?

मुझे लगता है की नरेंद्र मोदी को जिस तरह से भाजपा पर थोपा गया है, उससे पार्टी का लोकतंत्र तो ख़तम हो ही गया है लेकिन उससे बढ़ कर one man show वाली भाजपा में जोशी, अडवानी सुषमा और दूसरे दिग्गज नेताओं के लिए बड़ी असहज स्थित पैदा हो चुकी है। भाजपा एक न नज़र आने वाले परिवार के हाथों का खिलौना बन चुकी है। गौरतलब है कि मोदी के उदय के साथ जिस तरह स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय मजदूर संघ सक्रीय आन्दोलन से गायब हो चुके हैं उससे ये समझना मुश्किल नहीं है कि नरेंद्र मोदी के लिए खुद अगर अपनी पार्टी और अपने परिवार के पुराने आंदोलनों से खुद को दूर कर रहे हैं तो ये सिर्फ इत्तेफाक की बात नहीं है बल्कि ये मजदूरों और पिछड़े वर्ग के लोगों को दूर रखने का राजनितिक जरुरत है। ये समझना मुश्किल नहीं है कि कॉर्पोरेट जगत और चमकदार मीडिया के लिए पार्टी लोकतंत्र का बाकी रहना क्यों बेकार की बात है। क्यों लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अन्दर मौजूद सारे रास्तों से अपनी फाइलों को बचा कर सिर्फ एक विंडो से मंज़ूर कराना चाहते हैं? क्यों नरेंद्र मोदी की भारत की कल्पना में छात्रों का आन्दोलन, दलित आन्दोलन, स्त्री अधिकार, महिला सशक्तिकरण के सारे मुद्दों के लिए सिर्फ एक ही चाभी है, गुड गवर्नेंस!! सदियों की सामाजिक व्यवस्था का शिकार दलित अचानक सामाजिक स्तर पर बराबर हो जायगा, जो काम अम्बेडकर पूरा नहीं कर पाए उसे नरेंद्र मोदी एक चाभी लगा कर ठीक कर देंगे, अभी तक मोदी की तकरीरों में सामजिक सरोकारों पर, समाजिक न्याय, अल्पसंख्यक, मजदूर, छोटे कामगारों के लिए कौन वादा किया गया है, आखिर गुड गवर्नेंस ऐसा कौनसा रामबाण है चलाकर मोदी इन समस्याओं को हल कर देंगे, चाहे समस्या गुड गवर्नेंस की हो या न हो, मोदी हर समस्या को एक ही चाभी से ठीक करने का वादा कर रहे हैं, गुड गवर्नेंस की नकली चाभी बेचने वाले नरेंद्र मोदी को लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर अगर ज़रा भी विश्वास है तो सबसे पहले एक नागरिक को उसके बुनियादी अधिकारों के लिए, भारत के संविधान में लिखे बुनियादी अधिकारों की गारंटी देनी होगी, अपने प्रदेश में आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याएं रुकवाएं, निजी क्षेत्रों में मजदूर अधिकारों पर उनकी ख़ामोशी, हत्याओं, एनकाउंटर, पर उनकी चुप्पी सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं है बल्कि उनकी मजबूरी है। रोटी खाना जितना ज़रूरी है उससे ज्यादा ज़रूरी ये है कि ये रोटी अधिकार की हो, इज्ज़त की हो। जो नेता अपनी ही पार्टी के अन्दर लोकतंत्र को तोड़कर कर सत्ता पर आसीन होने का दांवपेंच खेल रहा हो वो देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का कितना सम्मान करेगा? जो नेता खुद अपनी पार्टी पर संघ परिवार के असंवैधानिक दखल और कॉर्पोरेट घरानों की लॉबिंग से अपनी राजनीति चमका रहा हो वो क्या देश के कमजोरों और वंचितों के लिए व्यवस्था के दरवाज़े कभी खोलेगा??

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ओमेर अनस, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।  जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में शोधार्थी हैं।

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