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असगर अली इंजीनियर होने के मायने

तुम बिन एक बरस……..!
बड़े शौक़ से सुन रहा था ज़माना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते कहते……!
जुलैख़ा जबीं
’’हमारा संघर्ष यही होना चाहिए कि दुनिया में सामाजिक न्याय हो, भेदभाव खत्म हो, सबके साथ इंसाफ हो, सबकी जरूरतें पूरी हों। और हमें इस लड़ाई को लड़ते रहना है, सभी के साथ मिलकर, लगातार। ऐसा नहीं कि मैं सिर्फ इस्लाम के नाम पर लडूं, आप सिर्फ हिंदू धर्म के नाम पर लड़ें, कोई बौद्ध धर्म के नाम पर लड़े- नहीं हम सबको साथ आना चाहिए। क्योंकि हम, आप और बाक़ी बहुत सारे यही कह रहे हैं कि सामाजिक न्याय हो, बराबरी हो, गैर बराबरी खत्म हो, जो इस गैर बराबरी को बढ़ावा देने वाले हैं उन सभी के खिलाफ हमें एकजुट होकर लड़ना होगा। यही देश भक्ति है और सबसे बड़ी इबादत भी।’’ (डा. इंजीनियर)
दुनिया में कट्टरपन के खिलाफ सदभावना के लिए, मजहबी नफरत के खिलाफ अमन के लिए, सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ बहनापे और भाइचारे के लिए, सामाजिक अन्याय के खिलाफ इंसाफ के लिए आजीवन संघर्षरत डॉ. असगर अली इंजीनियर पिछले एक बरस से हमारे बीच नहीं रहे। मगर इंसानी समाज में इंसानियत की स्थापना के लिए, मोहब्बत की जो मशाल उन्होंने जलाई है वो रहती दुनिया तक क़ायम और रौशन रहेगी। हर तरह के कट्टरपन और सामंतवाद के खिलाफ डॉ. इंजीनियर ने अपनी आवाज बुलंद की है। अपनी कलम के जरिए, शिक्षण और प्रशिक्षण के जरिए, सभाओं, गोष्ठियों, सेमीनार, कार्यशालाओं के जरिए, आम जनता के नजदीक पहुंचने के हर संभव तरीकों और माध्यमों का इस्तेमाल वे अपने आखिरी दम तक करते रहे हैं।
जातिवादी नफ़रत के खिलाफ उनकी कलम की धार पीड़ितों के पक्ष में हमेशा तेज रही। डॉ. इंजीनियर हिंदोस्तानी गंगा-जमनी तहज़ीब, संप्रभुता और विविधता में एकता के जबरदस्त हामी रहे हैं। वे हमेशा कहा करते थे “बेशक आस्था जरूरी है मगर जब आस्था अंध विश्वास की शक्ल ओढ़ लेती है तब वह इंसानी समाज के लिए खतरनाक हो जाती है।” और यहीं से शुरू होती है वो जंग जिसका रास्ता और तरीक़ा डॉ. असगर अली इंजीनियर ने हम सबको दिखाया  है।
सेंटर फार स्टडी आफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के अध्यक्ष और इस्लामिक विषयों के प्रख्यात विदवान डॉ. असगर अली इंजीनियर की पहचान मजहबी कट्टरवाद के खिलाफ लगातार लड़ने वाले योद्धा के तौर पे मानी जाती रहेगी। डॉ. इंजीनियर मानना था कि दुनियां में जहां पर भी इस्लाम के मानने वालों पर जुल्म हुआ है, वहां के लोग लड़ाई के लिए उठ खडे हुए हैं। वे मानते हैं कि ’’कट्टरपंथ मजहब से नहीं सोसायटी से पैदा होता है’’ उनकी राय में ’’भारतीय मुसलमान इसीलिए अतीतजीवी हैं क्योंकि यहां के 90 फीसदी से ज्यादा मुसलमान पिछड़े हुए हैं और उनका सारा संघर्ष दो जून की रोटी के लिए है इसलिए उनके भीतर भविष्य को लेकर कोई ललक नहीं है’’। यही नहीं, हिंदू कट्टरपंथ की वजह बताते हुए वे कहते है कि ’’जब दलितों, पिछड़ों व आदिवासियों ने अपने हक मांगने शुरू किए तो ब्राहमणों को अपना पावर खतरे में नजर आया और उन्होंने मजहब का सहारा लिया, ताकि धर्म के नाम पर सबको साथ जोड़ लें, लेकिन ये सोच कामयाब होती नजर नहीं आ रही है इसलिए उनका कट्टरपंथ और तेजी से बढ़ता जा रहा है। ताकि वह जरूरी मुददों से लोगों का ध्यान हटाएं और हिंदू धर्म के नाम पर सबको एक करने की कोशिश करें। और यही इसकी बुनियादी वजह है’’।
जब दुनिया में इस्लामी आतंकवाद का प्रोपेगंडा अपने चरम पे था, हमारे मुल्क के अंदर भी मुसलमानों को लेकर शक-ओ-शुबहा बढ़ने से बेगुनाहों पर सरकारी जुल्म बढ़ने लगे और सांप्रदायिक दंगों में जानो माल का इकतरफा नुकसान, बेकुसूर नौजवानों की गिरफतारी, झूठे मुकदमे, फर्जी एनकाउंटर बढ़ने लगे, समाज में आपसी नफरत बढ़ने लगी और मुस्लिम समाज दहशत की वजह से खुद अपने में सिमटने लगा, और कुछ स्वार्थी राजनैतिक तत्वों के जरिए, सुनियोजित तरीके से फैलाई जा रही नफरत से निपटने के लिए, शिक्षण प्रशिक्षण के ज़रिए, समाज में समरसता, बहनापा, भाईचारा क़ायम करने डॉ. इंजीनियर ने आल इंडिया सेक्युलर फोरम (AISF) की शुरूआत की। जिसमें उनके अलावा देश की कई जानी पहचानी सेक्यूलर हस्तियां शामिल हुईं। इसके साथ ही देश में किए जा रहे सांप्रदायिक दंगों के पीछे की असलियत जानने के लिए उन्होंने खुद ही जांच दल गठित कर, घटनास्थलों में जाकर तफतीश की, रिपोर्ट तैयार की और संबंधित विभागों, राज्यपालों व केंद्र और राज्य सरकारों को सौंपी। मुल्क में बढ़ती जा रही मजहबी कट्टरता पे उनका स्पष्ट मानना रहा है कि कट्टरपंथ मजहब से पैदा नहीं होता वह मौजूदा समाज से पैदा होता है। बड़ी बेतकल्लुफ़ी से वे बताते हैं, आज से क़़रीब 70 बरस पहले देश में मुस्लिम लीग की मज़़बूती के पीछे भी यही वजहें थीं। क्योंकि उस वक्त जो मुस्लिम एलीट वर्ग यूपी, बिहार वगैरह का था, उसको लगा कि आज़़ाद हिंदोस्तान में उसके हाथ से सत्ता पावर निकल जाएगा। इसलिए वे मुस्लिम लीग में गए उन्हें लगा कि लीग उन्हें और उनके प्रभुत्व को बचा लेगी। और लीग ने पाकिस्तान बनवा डाला और यहां का एलीट क्लास ये सोचकर पाकिस्तान चला गया कि वहां उनका भविष्य महफूज़़ रहेगा। मगर वहां की हक़़ीक़़त आज हमारे सामने है कि धार्मिक कट्टरपंथ के एवज़ बने किसी देश का भविष्य कितना अंधकारमय होता है। यही हिंदू कट्टरपंथियों के साथ हो रहा है। वे सोचते हैं कि अगर वे हिंदू धर्म का सहारा नहीं लेंगे तो ये दलित, पिछड़े, आदिवासी सब सत्ता में आ जाएंगे और इसीलिए इन सबको सत्ता के पावर से दूर रखने के लिए हिंदू धर्म की बात करते हैं। वे कट्टरपंथ की बात मजहब का नाम लेकर करते हैं ताकि बहुसंख्यक जन उनके साथ जुड़ जाए।
डॉ. इंजीनियर लोकतंत्र में अटूट विश्वास रखने वालों में रहे हैं। वे कहते हैं “चूंकि यहां लोकतंत्र है और दलित, पिछड़े भी इसे समझ रहे हैं कि वे लोकतांत्रिक तरीके से ही इसका मुकाबला कर सकते हैं। अगर आज लोकतंत्र न रहे और इस तरह की राजनीति बेखौफ बढती रहे तो वे सबको जेल में डाल देंगे, फांसी चढ़ा देंगे, गोली मार देंगे, और फिर सब चुप हो जाएंगे तब तक के लिए, जब तक फिर से लोकतंत्र नहीं आ जाता।।“
डॉ. इंजीनियर ने औरतों खासकर मुस्लिम औरतों के आर्थिक सामाजिक हालात सुधारने के लिए बहुत काम किया है। उन्होंने अपनी क़लम से मजहब के उन स्वयंभू ठेकेदारों के खिलाफ आवाज बुलंद की है जिन्होंने मुस्लिम औरतों के कुदरती, इंसानी हक़ मजहब के नाम पर दबा रखे हैं। इसके लिए उन्होंने ’’ क़ुरआन में औरतों के हक़’’ नाम से एक किताब भी लिखी साथ ही इस विषय पे बाकायदा प्रशिक्षण शिविरों का भी आयोजन पूरे मुल्क में किया। डॉ. साहब चाहते थे कि मुस्लिम समुदाय में से ही उच्च शिक्षित खातून आगे बढ़ें और अरबी का ज्ञान हासिल करें ताकि क़ुरआन में दिए गए अपने हक़ूक़ मर्दवादी समाज से हासिल कर सकें। बतौर भाषा अरबी सीखने और सिखाने के लिए अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी का प्राइमर भी तैयार कर चुके थे और इसका इंतेजाम उन्होंने बांबे स्थित अपने आफिस में कर भी रखा था। ताकि बाहर से आई हुई कुछ चुनिंदा खातून इसमें महारत हासिल कर सकें। लेखिका को भी आपने अपनी मंशा से न सिर्फ अवगत कराया था बल्कि उनके पास रहकर अरबी की पढ़ाई पूरी करने का आफर भी दिया था। उनका ख्वाब था कि कुछ हिंदोस्तानी ख्वातीन सामाजिक न्याय, बराबरी और औरतों के हक़ुक़ से संबंधित कुरआन के रौशन पहलू को तर्जुमे के साथ आमजन तक पहुंचाने का जिम्मा उठाएं।।
वे कहते हैं कि ’’जब समाज हमेशा एक सा नहीं रह सकता बदल जाता है, तो उसके क़वानीन (क़ानून) एक से कैसे रहेंगे ? उन्हें भी समाज में होने वाले बदलाव के साथ बदलना ही होगा’’।
बेशक डॉ. इंजीनियर आज हमारे बीच नहीं रहे मगर इंसानी दुनिया से नफरत, गैर बराबरी और बेइंसाफी मिटाने के लिए, किए गए उनके तमाम काम और काविशों का बोलबाला कायम रखने के लिए, उनके छेडे़ गए जेहाद के बिगुल को सांस देने की जरूरत है। यही डा़ असग़र अली इंजीनियर को सच्ची ख़िराजे अक़ीदत (श्रद्धांजलि)होगी।

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